प्रयागराज में गंगा तट पर वैदिक रीति से श्रावणी उपाकर्म, क्या है महत्व, जानिए
श्रावणी उपाकर्म आत्मा, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन साधने का जीवंत माध्यम माना जाता है.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : August 28, 2026 at 1:54 PM IST
प्रयागराज: भारतीय सनातन संस्कृति में ऋतु परिवर्तन और आध्यात्मिक साधना का संबंध अत्यंत गहरा है. श्रावण पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रयागराज में गंगा के तट पर श्रावणी उपाकर्म का अनुष्ठान पूरी श्रद्धा, नियम और वैदिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ.
यह पर्व केवल एक धार्मिक कर्मकांड भर नहीं है, बल्कि जीवन में शुचिता, स्वाध्याय और संस्कारों के नवीनीकरण का एक पवित्र संकल्प है. गंगा की अविरल धारा और वैदिक ऋचाओं की गूंज के बीच यह आयोजन संस्कृति और प्रकृति के अटूट रिश्ते को सजीव करता है.
दशविधि स्नान और प्राकृतिक शुद्धि श्रावणी उपाकर्म की शुरुआत पारंपरिक 'दशविधि स्नान' से होती है. प्रयागराज के घाटों पर एकत्र वैदिक आचार्यों और साधकों ने दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर (पंचगव्य), दुर्वा, भस्म और मृत्तिका जैसे दस प्राकृतिक द्रव्यों से विधिवत स्नान किया. यह स्नान बाह्य शरीर को शुद्ध करने के साथ-साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है.
यज्ञोपवीत परिवर्तन और प्रायश्चित का संकल्प स्नान और सूर्य तर्पण के पश्चात वर्ष भर में मन, वचन और कर्म से जाने-अनजाने हुए दोषों का प्रायश्चित किया गया. इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुराना यज्ञोपवीत उतारकर नया जनेऊ धारण किया गया. यज्ञोपवीत के तीन सूत्र व्यक्ति को देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण की याद दिलाते हैं. यह अनुष्ठान मनुष्य को उसके कर्तव्यों, नैतिक सीमाओं और ज्ञानार्जन के पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है.
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य दृष्टिकोण: इस अनुष्ठान का केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि स्पष्ट वैज्ञानिक आधार भी है. श्रावण का महीना वर्षा ऋतु का चरम समय होता है, जब वातावरण में नमी बढ़ने से बैक्टीरिया और मौसमी संक्रमण तेजी से पनपते हैं. दशविधि स्नान में उपयोग होने वाले तत्व—जैसे गोबर, भस्म और दुर्वा-प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और शोधक गुणों से भरपूर होते हैं.
यह औषधीय स्नान त्वचा को संक्रमण से बचाता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को संतुलित कर शरीर में नई ऊर्जा का संचार करता है.
श्रावणी उपाकर्म आत्मा, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन साधने का एक जीवंत माध्यम है. प्रयागराज की पावन भूमि पर आयोजित यह पर्व आधुनिक समाज को यह संदेश देता है कि जब प्राचीन संस्कार और प्राकृतिक विज्ञान एक साथ चलते हैं, तभी मनुष्य मानसिक शांति और शारीरिक आरोग्य दोनों प्राप्त कर सकता है.
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