मेरठ का सबसे बड़ा अस्पताल 'बीमार'; न डॉक्टर, ना दवाई, 'संविदा' पर चल रहा काम
हर बुधवार को संविदा पर डॉक्टर्स की नियुक्ति के लिए इंटरव्यू लिया जाता है. पर्याप्त डॉक्टर के नहीं होने से मरीज परेशान रहते हैं.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : February 27, 2026 at 5:25 PM IST
|Updated : February 27, 2026 at 6:00 PM IST
मेरठ : स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सरकार बड़े-बड़े वादे करती है. लेकिन हालात बिल्कूल उलट है. लाला लाजपत राय स्मारक मेडिकल कॉलेज (LLRMC) मेडिकल स्टाफ की कमी से जूझ रहा है. तीन दशक से पर्याप्त मेडिकल स्टाफ तक नहीं है. मरीजों की बात करें तो हर दिन औसतन चार हजार से ज्यादा मरीज यहां उपचार के लिए पहुंचते हैं.
मेडिकल कॉलेज की शुरुआत 60 के दशक में हुई थी. 90 के दशक से मेडिकल कॉलेज में स्टाफ का टोटा है. बीते 30 साल में यूपी से लेकर दिल्ली तक तमाम गठबंधन हुए. बहुत कुछ बदला, लेकिन मेडिकल कॉलेज की तस्वीर नहीं बदली. पर्याप्त स्टाफ नहीं होने के कारण संविदा डॉक्टर ही यहां कमान संभालते हैं.
डॉक्टरों के हैं 239 पद : मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य आरसी गुप्ता बताते हैं, 1966 से मेडिकल कॉलेज संचालित है, सबसे पहला बैच 1966 में यहां आया था, वर्तमान समय में 239 डॉक्टर के पद यहां के लिए हैं, क्योंकि पहले डॉक्टर भी कम थे, डॉक्टर कम ही बनते थे इसलिए यहां संख्या हमेशा ही कम ही रही है. बीते कुछ वर्षों में मेडिकल कॉलेज को यह अनुमति दी गई है कि हम कुछ डॉक्टर को अप्वॉइंट कर सकते हैं.
97 डॉक्टर संविदा पर : प्राचार्य आरसी गुप्ता ने बताया, नियमित डॉक्टर बहुत कम हैं, ऐसे में 97 डॉक्टर संविदा पर रखे हुए हैं, 239 में से सिर्फ 82 डॉक्टर ही नियमित हैं. उनमें से भी चार डॉक्टर ऐसे हैं सेवा से दूर हैं. बाकि सभी पोस्ट खाली हैं. हर बुधवार को संविदा पर डॉक्टर्स नियुक्ति के लिए इंटरव्यू करते हैं, जो सफल होते हैं, उन्हें रखते हैं. 60 डॉक्टरों का यहां टोटा है.

881 नर्स की जगह 237 कर रहीं काम : मेडिकल कॉलेज में 881 पद नर्स के लिए हैं, जबकि यहां पर 237 नर्स वर्तमान में हैं. प्राचार्य आरसी गुप्ता ने बताया, नर्सों का चयन लोकसेवा आयोग के माध्यम से होता है, ऐसे में सरकारी प्रक्रिया होने की वजह से इस प्रक्रिया में भी समय लगता है. ऐसे में कुछ नर्स को संविदा पर रखा गया है. इसी प्रकार क्लास -3 टेक्निशियन स्टाफ और मिनिस्ट्रीयल स्टाफ, क्लास -4 स्टाफ की भी कमी है. 1986 से 2006 के बीच यहां कोई भर्ती नहीं हुई थी.
हर दिन औसतन 4000 मरीज आते हैं : प्राचार्य आरसी गुप्ता ने बताया, धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है, पीजी की सीटें और यूजी की सीटें भी बढ़ गई हैं, तो ऐसे में उम्मीद है कि अगले 5 से 10 साल में यह समस्याएं भी कम होंगी. जो मेडिकल स्टाफ की कमी बनी हुई है वह हो सकता है कि कम हो जाए. मेरठ मेडिकल कॉलेज में हर दिन 4000 के लगभग ओपीडी रहती है. कई बार यह संख्या बढ़कर 5000 प्रतिदिन तक भी हो जाती है.

1200 बेड का है मेडिकल कॉलेज : मेडिकल कॉलेज 1200 बेड का है, ऐसे में लगभग 1000 बेड हमेशा भरे हुए रहते हैं, मरीज के यहां आने की संख्या को अगर कैलकुलेट करें तो उनके साथ क्योंकि कई तिमादार भी होते हैं, ऐसे में औसतन 20 हजार लोग हर दिन मेडिकल कॉलेज के कैंपस में यहां होते हैं.
साफ सफाई रखना बड़ी चुनौती : मेडिकल कॉलेज को साफ रखना, कैंपस में साफ सफाई का ध्यान रखना एक चुनौती है, लेकिन कोशिश जारी है. पूरी तरह से कोशिश की जाती है कि किसी को कोई परेशानी ना हो और साफ सफाई भी रहे. जो भी डॉक्टर और कर्मचारी हैं सभी प्रयास करते हैं कि जो भी सेवाएं दी जा सके वह आने वाले मरीजों को इसका लाभ मिले और उन्हें राहत भी मिल सके.

समय-समय पर किया जाता है पत्राचार : प्राचार्य आरसी गुप्ता ने बताया, शासन से तमाम पदों के रिक्त होने की जानकारी के बारे में बार-बार रिपोर्ट साझा की जाती है, पत्राचार किया जाता है. शासन स्तर पर यह प्रक्रिया काफी लंबी होती है, क्योंकि सरकारी सिस्टम है और उस प्रक्रिया को बाईपास नहीं कर सकते. इसीलिए शासन ने संविदा पर रखने की शक्ति भी दी है, लेकिन ये भी सिर्फ शैक्षणिक संवर्ग के लिए है. गैर शैक्षणिक संपर्क के लिए नहीं है, जिस कारण भी समस्याओं का हल नहीं हो पा रहा.
निजी हॉस्पिटल देते हैं डॉक्टरों को अधिक पैसा : प्राचार्य आरसी गुप्ता बताते हैं, आज के समय में डॉक्टर पैसे को ज्यादा तवज्जो देते हैं. सरकारी सेवा में मिलने वाली सुविधाओं की तुलना में निजी अस्पताल में ज्यादा पैसा मिलता है. कुछ ब्रांच ऐसी हैं जहां पर बाहर पैसा ज्यादा मिलता है, जबकि सरकारी सेवा में उतना नहीं मिलता है. जो लोग पीएचडी करके आते हैं उन्हें बाहर लगभग चार लाख रुपये प्रतिमाह मिलता है, जबकि मेडिकल कॉलेज में उन्हें लगभग एक लाख 20 हजार रुपए ही संविदा पर मिलता है, इस तरह ही सुपर स्पेशियलिटी ब्रांच में भी यही समस्या है.

सरकार को देना चाहिए ध्यान : मेडिकल कॉलेज में बेटी का उपचार करा रहीं जीनत कहती हैं, बेटी को मानसिक परेशानी है. यहां मरीजों को एडमिट कराने में काफी परेशानी होती है. सरकार को ध्यान देना चाहिए. कमरजहां ने कहा, सरकार सुविधा दे रही है तो डॉक्टर का भी तो पर्याप्त इंतजाम करे. डॉक्टर जो दवाइयां मरीज के लिए लिख कर देते हैं, अधिकांश बाहर से ही खरीदनी पड़ती हैं.
जनप्रतिनिधि भी नहीं लेते दिलचस्पी : बता दें, मेरठ के सांसद अरुण गोविल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे राज्यसभा सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी यहां सुविधा बढ़ जाएं इसको लेकर प्रयास कई बार करते रहते हैं. बागपत सांसद डॉ. राजकुमार सांगवान भी मेरठ शहर में ही रहते हैं. ऊर्जा राज्य मंत्री विधायक डॉ. सोमेंद्र तोमर भी मेरठ में ही रहते हैं, विधायक दिनेश खटीक भी सरकार में जल शक्ति राज्य मंत्री हैं, मेरठ कैंट से बीजेपी के विधायक अमित अग्रवाल, भाजपा से एमएलसी अश्वनी त्यागी और एमएलसी धर्मेंद्र भारद्वाज भी मेरठ शहर में ही रहते हैं.
इनके अलावा विपक्ष के भी तीन विधायक मेरठ शहर में हैं, जिनमें किठौर विधानसभा से सपा विधायक शाहिद मंजूर, मेरठ शहर से सपा के विधायक रफीक अंसारी और सरधना से विधायक अतुल प्रधान, इनके अलावा कई दर्जा प्राप्त मंत्री के अलावा आयोग की दो सदस्य भी मेरठ शहर में ही रहते हैं, लेकिन हैरानी की बात ये है कि या तो इतने जनप्रतिनिधियों को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि उनके शहर का मेडिकल कॉलेज ही बीमार है या फिर वे इस विषय को लेकर दिलचस्पी नहीं लेते.
प्रभारी मंत्री को प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टरों से आस : मेरठ जिले के प्रभारी मंत्री और प्रदेश सरकार में पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा, सभी सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का अभाव है. डीएम से कहा गया है कि जो अच्छे निजी मेडिकल संस्थान हैं, अच्छे नर्सिंग कॉलेज हैं, वहां के अच्छे डॉक्टर्स को एक या दो घंटे के लिए सरकारी अस्पतालों में जहां रोग विशेषज्ञ नहीं हैं वहां व्यवस्थित कर दिया जाए, जिससे कि मरीजों को राहत मिल सके.
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