लाठी नहीं, मेहनत का सहारा: सरस मेले में बुजुर्गों ने दिखाया 'आत्मनिर्भर हिमाचल'
शिमला के सरस मेले के उस स्टाल की कहानी, जहां बुजुर्गों ने दिखाया कि मेहनत के बल पर 'आत्मनिर्भर' कैसे बना जाता है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : December 20, 2025 at 10:12 AM IST
शिमला: शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर सजे सरस मेले में हर ओर हस्तशिल्प, पारंपरिक पकवान और स्थानीय उत्पादों की रौनक है. लेकिन इसी भीड़ के बीच एक ऐसा स्टाल भी है, जहां लोग सिर्फ खरीदारी के लिए नहीं, बल्कि वहां बैठे बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने और उनकी संघर्षभरी कहानी सुनने के लिए रुक रहे हैं. यह स्टाल है 'खंड वृद्धजन फेडरेशन, चौपाल (नेरवा)' का. यह स्टाल केवल उत्पादों की बिक्री का केंद्र नहीं है, बल्कि हिमाचल के उन बुजुर्गों के स्वाभिमान की कहानी है, जिन्होंने उम्र को कभी कमजोरी नहीं बनने दिया और बुढ़ापे की लाठी को किनारे रख उद्यमिता का हाथ थाम लिया.
60 से 90 वर्ष तक की उम्र के बुजुर्ग यहां पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने हाथों से बने उत्पाद बेच रहे हैं. उनके चेहरों पर थकान नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने का गर्व साफ दिखाई देता है.
2014 से शुरू हुआ आत्मनिर्भरता का सफर
खंड वृद्धजन फेडरेशन की शुरुआत वर्ष 2014 के आसपास हेल्पएज इंडिया और हिमाचल प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (HPSRLM) के संयुक्त प्रयास से हुई थी. चौपाल ब्लॉक के 57 गांवों में 80 स्वयं सहायता समूह बनाए गए, जिनसे करीब 1000 बुजुर्ग जुड़े हुए हैं. इन सभी समूहों को मिलाकर इस फेडरेशन का गठन किया गया.
फेडरेशन का मुख्यालय और मुख्य प्रोसेसिंग यूनिट नेरवा में स्थित है. यहां आधुनिक मशीनों की मदद से स्थानीय उत्पादों की प्रोसेसिंग की जाती है. उत्पादन से लेकर पैकेजिंग और मार्केटिंग तक की पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी मोर सिंह संभालते हैं, जो इस फेडरेशन के मैनेजर हैं.
अनुभव, मेहनत और जिम्मेदारी का अनोखा संगम
इस फेडरेशन की सबसे बड़ी खासियत इसकी संरचना है. इसमें 60 साल से लेकर 90 साल तक के बुजुर्ग शामिल हैं. उद्देश्य साफ है कि इस उम्र में कोई भी खुद को बोझ या असहाय न समझे. यहाँ बुजुर्ग अपने अनुभव, मेहनत और अनुशासन से दोबारा खुद को समाज के लिए उपयोगी साबित कर रहे हैं.

फेडरेशन में कई रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी, शिक्षक और पूर्व सैनिक भी शामिल हैं. ये बुजुर्ग प्रबंधन, लेखा-जोखा और मार्केटिंग की जिम्मेदारी संभालते हैं. वहीं किसान वर्ग से जुड़े बुजुर्ग अपनी जमीन पर उगाए जाने वाले सेब, बुरांश, अदरक, लहसुन और मिर्च जैसी फसलों की शुद्धता सुनिश्चित करते हैं.
'देव भूमि फार्म फ्रेश' ब्रांड बना पहचान
नेरवा स्थित यूनिट में तैयार किए गए उत्पादों को ‘देव भूमि फार्म फ्रेश’ ब्रांड नाम से बाजार में उतारा जाता है. इनमें शुद्ध सेब का जूस और सेब का सिरका, पारंपरिक पहाड़ी अचार जिसमें अदरक, लहसुन और मिर्च का अचार शामिल है, बुरांश का शरबत, सूखी सब्जियां और पारंपरिक पहाड़ी अनाज जैसे कौणी, चीणा, कोदा, फाफरा और माश की दाल शामिल हैं.
बुरांश का शरबत बना सरस मेले का स्टार
सरस मेले में बुरांश का शरबत सबसे ज्यादा बिकने वाला उत्पाद बना हुआ है. इसे हृदय रोगों के लिए लाभकारी माना जाता है. बिना किसी प्रिजर्वेटिव के तैयार ये उत्पाद अपनी शुद्धता के कारण लोगों का भरोसा जीत रहे हैं.
कमाई से बढ़ा बुजुर्गों का आत्मसम्मान
इन उत्पादों की बिक्री से होने वाला मुनाफा सीधे बुजुर्गों के बैंक खातों में जाता है. इससे वे अपनी दवाइयों, यात्रा और निजी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहते. कई बुजुर्ग इस कमाई से अपने पोते-पोतियों की पढ़ाई में भी सहयोग कर रहे हैं.

युवाओं के लिए बुजुर्गों का संदेश
मेले में स्टाल पर बैठे बुजुर्ग युवाओं को साफ संदेश देते हैं कि मेहनत की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती. उनका कहना है कि जब वे 70 साल की उम्र में भी सुबह 6 बजे उठकर खेतों और प्रोसेसिंग यूनिट में मेहनत कर सकते हैं, तो युवा नशे और बेरोजगारी का बहाना क्यों बनाएं. हिमाचल की आबोहवा और संसाधनों में स्वरोजगार के अनगिनत अवसर मौजूद हैं.
अकेलेपन से लड़ने का भी जरिया बना फेडरेशन
यह फेडरेशन केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं है, बल्कि बुजुर्गों के अकेलेपन से लड़ने का भी एक मजबूत माध्यम बन चुका है. नियमित बैठकों के बहाने गाँवों के बुजुर्ग आपस में मिलते हैं, अपने सुख-दुख साझा करते हैं, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है.
डिजिटल बाजार तक पहुंचे बुजुर्गों के उत्पाद
इन बुजुर्गों के हाथों से बने उत्पाद अब सिर्फ स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं हैं. हिमाचल सरकार के 'Him Ira' ब्रांड के तहत ये उत्पाद Amazon India जैसे बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी बिक्री के लिए उपलब्ध हैं. यह बुजुर्गों की मेहनत और आत्मनिर्भरता को मिली सबसे बड़ी पहचान है.
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