शिमला MSME फेस्ट 2026: प्रदर्शनी में नजर आई महिलाओं की आर्थिक आजादी और सामाजिक सम्मान की कहानियां
MSME फेस्ट 2026 में लगी प्रदर्शनियों ने बता दिया है कि पहाड़ की महिलाएं घर की आर्थिकी सुदृढ़ करने में अहम योगदान दे रही हैं.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : January 5, 2026 at 1:54 PM IST
शिमला: शिमला कहानियों का शहर है, पहाड़ों पर बसे इस शहर ने अब तक अपनी अनेकों कहानियों से इतिहास को सजीव किया है. वहीं, अब पर्यटन नगरी में उद्यमिता का महोत्सव सजा है. यहां न केवल हस्तकला के बेहतरीन उत्पादों की प्रदर्शनी सजी है. बल्कि, ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक रूप से मजबूत बनने की प्रेरणादायक कहानियों के स्टॉल लगे हैं. शिमला में 3 जनवरी से 5 जनवरी तक आयोजित किए MSME फेस्ट 2026 के दौरान महिलाओं की आर्थिक मजबूती और सामाजिक पहचान की कुछ बेहतरीन कहानियां सामने आई हैं.
एक कमरे से शुरू हुआ इश्लीन का सफ़र, आज USA-UAE तक मशहूर
इश्लीन कौर ने साल 2021 में सेल्स और मार्केटिंग के क्षेत्र में फ्रीलांसर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. आय का साधन खुला, मगर यहां स्थिर हो जाना गवारा नहीं था. नई पहचान बनाने की चाह और स्थिरता की खोज ने इश्लीन को एक नया रास्ता दिखाया. इसी राह पर जन्मा 'द एपेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग एंड डेवलपमेंट'. इस पहल का उद्देश्य था बिज़नेस ओनर्स, फाउंडर्स और प्रोफेशनल्स को एक सुव्यवस्थित सिस्टम देना. जो इन बिखरे हुए प्रयासों को आगे बढ़ने में मदद करे. द एपेक्स इंस्टीट्यूट छह सदस्यों की मज़बूत टीम के साथ आगे बढ़ रहा है. स्टार्टअप का वार्षिक टर्नओवर करीब ₹25 लाख तक पहुंच चुका है.

आज भारत के साथ-साथ USA, UAE और ऑस्ट्रेलिया तक अपनी पहुंच बना चुका है. इश्लीन अब फाउंडर्स और सर्विस बिजनेस ओनर्स को कंसल्टिंग देकर उनके व्यवसाय को तेज़ी से आगे बढ़ाने में योगदान दे रही हैं. इश्लीन कहती हैं, "फ्रीलांसर से बिजनेस ओनर बनने का सफर आसान नहीं था, लेकिन यही यात्रा आज मेरी सबसे बड़ी पहचान है."
अंबोटा गांव से आज देश भर में फैल रही निशु लता के अचार-मुरब्बे की खुशबू
एक छोटे से अंबोटा गांव से साल 1998 में रसोई घर से आचार-मुरब्बे बनाने की शुरुआत आज एक प्रेरित करने वाली कहानी बन गई है. निशु लता सूद ने सीमित संसाधनों और पहुंच के दौर में अपने अचार, चटनी, मुरब्बा और घरेलू स्नैक्स का स्वाद लोगों तक पहुंचाने की शुरुआत की. 21वीं सदी की शुरुआत से पहले ग्रामीण क्षेत्र से ऐसी शुरुआत अपने आप में एक साहसी कदम था. आज निशु लता की पारंपरिक अचार और चटनियों की खुशबू देशभर के बाजारों तक पहुंच रही है.

बढ़ते व्यापार के साथ क्वालिटी बनाए रखना अपने आप में एक चुनौती है. इसे निशु लता ने अपनी यूनिक रेसिपी से बनाए रखा. यही वजह रही कि, घर से शुरू हुआ यह काम एक मान्यता प्राप्त ब्रांड में बदल गया, जिसके उत्पाद आज रिटेल, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और अन्य ब्रांड्स तक पहुंच रहे हैं. निशु लता सूद एक मास्टर ट्रेनर के रूप मे भी काम कर रही हैं. अब तक हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पंजाब में सैकड़ों महिलाओं को फूड प्रोसेसिंग और उद्यमिता का प्रशिक्षण दे चुकी हैं. निशु लता बताती हैं, "मेरी यात्रा यह दिखाती है कि जुनून, धैर्य और सही सहयोग के साथ महिलाएं अपने सपनों को हकीकत में बदल सकती हैं."
प्राकृतिक उत्पादों को लोगों तक पहुंचा रहा है 'माउंटेन बाउंटीज़'
कुल्लू की वादियों में शुरू हुई एक पहल माउंटेन बाउंटीज आज एक ब्रांड के रूप पहाड़ों की खुशबू को ऑनलाइन बाजार तक पहुंचा रही है. इस पहल की सूत्रधार हैं ममता चंदर. कुल्लू घाटी में जन्मे इस आइडिया ने न केवल पहाड़ों की धरती पर एक ब्रांड को जन्म दिया बल्कि स्थानीय महिलाओं को स्थानीय संसाधनों से वैकल्पिक और टिकाऊ रोजगार भी दिया.

ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ इसने ईंधन के लिए वनों पर निर्भरता को कम करने के लिए शुरुआत हुई जागृति एनजीओ और सहकारी मॉडल की. महिलाओं के सुझावों से खुबानी और आडू के तेल जैसे उत्पाद सामने आए, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा. आगे बढ़ते हुए बिच्छू बूटी (नेटल) और खुबानी जैसे जंगली वनस्पतियों को मूल्य वर्धित उत्पादों में बदलकर आज माउंटेन बाउंटीज उपभोक्ताओं तक पहुंचा रहा है.
धरती को रसायन मुक्त रख कर स्वास्थ्य का खजाना उगा रहीं रीवा सूद
हिमाचल के ऊना जिले के छोटे से गांव बेहर-बिठाल की रीवा सूद ने दिखा दिया कि प्रकृति का साथ लेकर भी एक सशक्त ब्रांड बनाया जा सकता है. साल 2022 में एग्रीवा नेचुरली की नींव रखी गई. इसी के साथ स्वस्थ जीवन के लिए रसायन मुक्त कृषि उत्पादों को उगाने के एक नए सफर की शुरुआत हुई. एग्रीवा नेचुरली आज रसायन मुक्त और पोषण से भरपूर फसलें लोगों तक पहुंचा रहे हैं.
हिमाचल प्रदेश में अपेक्षाकृत नए माने जाने वाले कृषि उत्पाद जैसे ड्रैगन फ्रूट, अंजीर, अश्वगंधा और स्टीविया लोगों को स्वास्थ्य का आशीर्वाद दे रहे हैं. जैविक खाद, मौसमी चक्रों के सम्मान और मिट्टी संरक्षण पर आधारित खेती से न केवल भूमि की सेहत बची रही, बल्कि प्राकृतिक पोषण से भरपूर उपज उपभोक्ताओं का भी स्वास्थ्य वर्धन कर रही है. यही वजह है कि एग्रीवा नेचुरली आज सिर्फ एक फार्म नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और वेलनेस का भरोसेमंद नाम बनता जा रहा है.
'उमंग' से 50 महिलाओं के जीवन ने भरी आर्थिक आजादी की उड़ान
'उमंग' सामूहिक शक्ति और सामाजिक बदलाव की एक कहानी का नाम है. इस पहल की अगुवाई कर रही हैं रीना चंदेल. उमंग आज हिमाचल के पहाड़ों में महिलाओं की मेहनत और हुनर को पहचान दिलाने का काम कर रहा है. शैक्षणिक योग्यताओं के बाद नौकरी के पेशे में जाने से इतर रीना चंदेल ने उद्यमिता की राह चुनी. साल 2016 में उन्होंने एक सेल्फ हेल्प ग्रुप की स्थापना की. इस सेल्फ हेल्प ग्रुप ने स्थानीय फलों को उपयोग में लाकर पपीता पेड़ा और आंवला बर्फी जैसे अनोखे उत्पाद तैयार किए. आज 'उमंग' के पास 10 से अधिक खाद्य उत्पादों की श्रृंखला है, जिसमें अचार, जैम और चटनी भी शामिल हैं. 'उमंग से जुड़ी 50 महिलाएं हर महीने ₹8,000 से ₹10,000 की स्थिर आय अर्जित कर रही हैं. 'उमंग' के उत्पाद न केवल स्थानीय बाजारों में, बल्कि राज्य के बाहर भी अपनी पहचान बना चुके हैं.
क्रिएटिव दस्तकारी और फैशन की समझ ने परंपरा को बनाया लग्जरी ब्रांड
हिमालयी हस्तकला को अंतरराष्ट्रीय फैशन मंचों तक पहुंचने के सफर का नाम है आर्निका. जो आज परंपरा और आधुनिकता के खूबसूरत संगम की पहचान है. साल 2015 में शौक़ के तौर पर शुरू हुई क्रोशिया की कलाकारी जल्द ही एक लग्जरी ब्रांड में बदल गई. इसकी शुरुआत दुबई में एक सफल प्रोफेशनल करियर छोड़ कर सेल्फ़न के भारत लौटने से हुई. छोटी से शुरुआत आज आर्निका नाम के एक फैशन ब्रांड के रूप में काम कर रही है.
आर्निका ने आज ग्रामीण कारीगर और अंतरराष्ट्रीय फैशन के बीच की दूरी को अपने उत्पादों से शून्य कर दिया है. लंदन और दुबई जैसे फैशन हब्स में प्रदर्शनों और वर्कशॉप्स के जरिए आर्निका ने वैश्विक पहचान बना ली है. इस सफल की प्रयोग की सूत्रधार हैं सेल्फ़न. जिन्हें कौशल और गुणवत्ता के लिए वस्त्र मंत्रालय 'मास्टर क्राफ्ट्सपर्सन' के सम्मान से नवाज चुका है.
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