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सुप्रीम कोर्ट से बागवानों को मिली बड़ी राहत, लेकिन आगे की स्थित स्पष्ट नहीं: टिकेंद्र सिंह पंवार

प्रदेश में 1 लाख से ज्यादा लोगों के पास वन भूमि है, जिसमें ज्यादातर के पास 5 से 10 बिस्वा ही वन भूमि है.

SUPREME COURT ON APPLE TREE CUTTING
वन भूमि से नहीं कटेंगे सेब के पौधे. (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : December 20, 2025 at 4:56 PM IST

5 Min Read
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शिमला: 16 दिसंबर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए हिमाचल उच्च न्यायालय के आदेशों को खारिज कर दिया. उच्च न्यायालय अतिक्रमण वाली वन भूमि से फलदार बागों को हटाने के आदेश दिए थे. अब मामले में याचिकाकर्ता शिमला नगर निगम के पूर्व उप महापौर टिकेंद्र सिंह पंवार ने SC केंद्रीय का स्वागत किया है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को बड़ी राहत बताया है. उन्होंने कहा कि इस फैसले के बाद राज्य में एक बार फिर बड़े स्तर पर भूमि वितरण को लेकर चर्चा की जा सकती है.

HC का फलों से लदे पेड़ काटने का आदेश जल्दबाजी में दिया गया: टिकेंद्र सिंह

शिमला नगर निगम के पूर्व उप महापौर और मामले में याचिकाकर्ता टिकेंद्र सिंह पंवार ने कहा कि, "लंबे समय से हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में अतिक्रमण को लेकर मामला चल रहा था. उच्च न्यायालय की ओर से ऐसे समय में अतिक्रमण वाली भूमि से सब के पेड़ काटने के आदेश दे दिए गए, जब पेड़ फलों से लगे हुए थे. हिमाचल उच्च न्यायालय ने मामले में जल्दबाजी में फैसला सुनाया. इसे हमने उच्चतम अदालत में चुनौती दी थी."

शिमला नगर निगम के पूर्व उप महापौर टिकेंद्र सिंह पंवार (ETV Bharat)

सेब के पेड़ काटने का आदेश पर्यावरण और रोजी-रोटी के खिलाफ

टिकेंद्र सिंह पंवार ने कहा कि, सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका के मुख्य तीन बिंदु थे. याचिका में कहा गया है कि पेड़ काटने के आदेश क्षेत्र की इकोलॉजी यानी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला है. स्थानीय लोगों ने सेब के बगीचे तैयार करने में पूंजी का निवेश किया है. इसके अलावा यह उनकी आय का भी साधन है. याचिका में मांग की गई थी कि इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए न्यायालय अपना फैसला सुनाए.

'SC से मिली बड़ी राहत लेकिन, आगे की स्थित फिलहाल स्पष्ट नहीं'

टिकेंद्र सिंह पंवार ने कहा कि, "सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से सेब पेड़ों के काटने पर रोक लग गई है. यह एक बड़ी राहत है. लेकिन, इन आदेशों से अतिक्रमित भूमि पर बागवानों का अधिकार स्वीकार नहीं होता है. राज्य सरकार की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर नीति बनाने को लेकर कोई पक्ष नहीं रखा गया है. लिहाजा हम इस मामले पर कुछ नहीं कह सकते."

समुदायों को सौंपी जाए सैकड़ों बीघा में अतिक्रमित की गई भूमि- टिकेंद्र

राज्य में लगातार इस बात को लेकर भी बहस जारी है कि कुछ इलाकों में बागवानों ने सैकड़ों बीघा वन भूमि पर अतिक्रमण किया है. अब ऐसे मामलों को किस तरह से तर्कसंगत माना जाए. इसको लेकर टिकेंद्र सिंह पंवार ने कहा कि, प्रदेश में कुछ बागवानों के पास 150 बीघा तक वन भूमि है. हालांकि, इनकी संख्या केवल सैकड़ों में है. राज्य में 1 लाख से ज्यादा लोगों के पास वन भूमि है, जिसमें ज्यादातर के पास 5 से 10 बिस्वा ही वन भूमि है. उन्होंने कहा कि, किसान सभा लगातार जीवन यापन के लिए कम से कम पांच बीघा जमीन देने की वकालत करता रहा है. वहीं, जिन लोगों के पास 100 से 150 बीघा वन भूमि है उसे भी सरकार को नहीं दिया जाना चाहिए. टिकेंद्र पवार ने कहा कि, इस भूमि को समुदायों को दिया जा सकता है. मंदिर प्रदेश में जमीनों का रखरखाव करते आए हैं लिहाजा उन्हें भी जमीन दी जा सकती है.

HC ने वन भूमि से अतिक्रमण हटा कर वन प्रजातियों के पौधे लगाने के दिए थे सख्त आदेश

हिमाचल प्रदेश में लंबे समय से वन भूमि पर अतिक्रमण कर सेब के पेड़ लगाने का मामला न्यायालय में चल रहा था. उच्च न्यायालय ने 2 जुलाई के अपने आदेश में वन विभाग को सेब के बाग हटाने के सख्त आदेश दिए थे. उच्च न्यायालय ने सेब के पेड़ों के स्थान पर वन्य प्रजातियों के पौधे लगाने के भी निर्देश दिए थे. इसके अलावा अतिक्रमणकारियों से लागत को भूमि राजस्व के बकाया के रूप में वसूलने का आदेश दिया था.

हिमाचल उच्च न्यायालय के आदेशों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

हिमाचल उच्च न्यायालय के आदेशों के बाद पूर्व उप महापौर टिकेंद्र सिंह पंवार और कार्यकर्ता राजीव राय की याचिका पर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 28 जुलाई को शीर्ष अदालत ने पंवार और राय की याचिका पर उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी. याचिका में कहा गया था, 'यह आदेश मनमाना, असंगत और संवैधानिक, वैधानिक तथा पर्यावरणीय सिद्धांतों का उल्लंघन है, जिसके चलते पारिस्थितिक रूप से नाजुक हिमाचल प्रदेश में अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक क्षति को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप आवश्यक है.' 16 दिसंबर को मामले पर सुनवाई करते हुए SC में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने हिमाचल उच्च न्यायालय के आदेशों को रद्द कर दिया.

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