बगैर हाथों के पैदा हुईं, आज दुनिया के लिए लकीरें खींच रहीं; जानें भारत की बेटी शीतल की कहानी
जम्मू कश्मीर की शीतल ने 12 साल की उम्र में तीरंदाजी शुरू किया. पैरा एशियाई खेलों की गोल्ड मेडलिस्ट अब ओलंपिक के लिए पसीना बहा रहीं.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : March 3, 2026 at 3:59 PM IST
लखनऊ: शीतल देवी एक ऐसा नाम, जो कि देश की लाखों महिलाओं-युवाओं के लिए प्रेरणा हैं. कहते हैं कि अगर हिम्मत, जज्बा और दिल में कुछ करने की ठान लो, तो जीत आपके दरवाजे पर खुद दस्तक देने आ जाती है. अपनी मेहनत के दम पर जीत का झंडा फहराने वाली शीतल का जीवन आसान नहीं था. पैदा होने के वक्त ही अपने दोनों हाथों को खो देने वाली शीतल आज जानीमानी इंटरनेशनल खिलाड़ी हैं.
बता दें, उनका चयन सामान्य तीरंदाजों के साथ भारतीय टीम में हो गया है. लखनऊ के केडी सिंह बाबू स्टेडियम में नेशनल महिला तीरंदाजी प्रतियोगिता में वह सामान्य तीरंदाजों के साथ शानदार प्रदर्शन कर रही हैं. उनका लक्ष्य तीरंदाजी का एशियाड और ओलंपिक मेडल जीतना है.
दोनों हाथ नहीं, फिर भी किया कमाल : शीतल देवी का जन्म 10 जनवरी 2007 को जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के लोइधर गांव में हुआ था. वह जन्म से ही दोनों हाथों के बिना ही पैदा हुई थीं, लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक कमी को अपनी ताकत बनाया.
शीतल ने तीरंदाजी की शुरुआत 2021 में भारतीय सेना के तरफ से आयोजित एक सामुदायिक कार्यक्रम में किया. इसके बाद उन्होंने तीरंदाजी का प्रशिक्षण लेना शुरू किया और अपने पैरों और पंजों को प्रशिक्षित करते हुए कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते हैं.
अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित: शीतल देवी ने 2023 पैरा एशियाई खेलों में 3 पदक 2 स्वर्ण, 1 रजत जीते. उन्होंने 2024 में अर्जुन पुरस्कार जीता. बता दें कि शीतल अब भारत के लिए स्वर्ण जीतने के उद्देश्य से प्रशिक्षण ले रही हैं. शीतल देवी की उम्र अभी 19 साल है. उन्हें पैरा तीरंदाजी में उनकी उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए 2024 में अर्जुन पुरस्कार मिला.
शीतल देवी का चयन सामान्य तीरंदाजों के साथ भारतीय टीम में होना एक बड़ा मील का पत्थर है. ये न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह भारत में खेलों में समावेशिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है. शीतल देवी की कहानी उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपनी शारीरिक कमियों को अपनी ताकत बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
छोटी सी उम्र में की सीखने की शुरुआत: शीतल ने बताया कि उन्होंने 12 साल की उम्र में तीरंदाजी सीखना शुरू किया था. माता वैष्णो श्राइन बोर्ड के कैंपस में ट्रेनिंग लिया था. उनका कहना है कि 'उन्होंने तीरंदाजी को नहीं चुना था, तीरंदाजी ने उन्हें चुना था'.
उन्होंने बताया, "जब वह तीरंदाजों को देखती थी, तो उन्हें लगता था कि उन्हें भी ये करना, चाहिए मगर वह कर नहीं सकती थीं. इस पर उनके कोच ने उन्हें विदेशी खिलाड़ियों के कुछ वीडियो दिखाए. जिसमें लोग पैर से तीरंदाजी कर रहे थे. उनको देखकर मैंने भी कोशिश की और धीरे-धीरे परफेक्ट होती चली गई."
खिलाड़ी शीतल ने बताया कि "ओलंपिक में सामान्य खिलाड़ियों के साथ रहकर भारत को पदक दिलाना और तिरंगे को ऊपर लहराना ही मेरा लक्ष्य है. मैं ज़रूर उसे पूरा करुंगी.
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