आदिवासियों की लाइफलाइन छींद, पत्ता दिला रहा पैसा, फल पोषण का पिटारा
जंगलों और तालाब किनारे पाए जाने वाला छींद है बहुत उपयोगी, चटाई, झाड़ू बनाने के साथ इसके फलों में पोषक तत्वों की भरमार.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 22, 2026 at 4:16 PM IST
|Updated : February 22, 2026 at 6:48 PM IST
रिपोर्ट: अखिलेश शुक्ला
शहडोल: प्रकृति ने कई सारे ऐसे हमें वरदान दिए हैं, जिनके बारे में जानकर हैरानी होती है. एक ऐसा ही पौधा छींद है. जो आज भी इस 21वीं सदी में भी आदिवासियों की लाइफ लाइन बना हुआ है. इतना ही नहीं इससे बनाए गए हैंडमेड प्रोडक्ट आज भी बाजार में हाथों-हाथ बिकते हैं. इसका फल पोषक तत्वों का पिटारा है और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में टॉनिक का काम करता है, क्योंकि ये मल्टी न्यूट्रिशन वाला फल है. इसके पत्ते आम जन जीवन में ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी काफी ज्यादा इस्तेमाल होते हैं.
आदिवासियों की लाइफ लाइन है छींद
शहडोल जिला मुख्यालय से लगभग 10 से 20 किलोमीटर दूर मिठौरी के जंगलों में हमारी मुलाकात बुल्लू बैगा और ललिया बैगा से हुई. दोनों के सिर पर छींद की पत्तियों की गठरी रखी हुई थी. बड़ी तेजी के साथ वो अपने घर की ओर जा रहे थे, जब उनसे बात करने की कोशिश कर रहे थे, तो उनके मन में एक डर भी था कि आखिर उनसे इतनी पूछताछ क्यों हो रही है? हालांकि उन्होंने बड़ी बेबाकी से हमारे सारे सवालों के जवाब भी दिए. बुल्लू बैगा और ललिया बैगा बताती हैं कि छींद के पत्तों को लेने के लिए वो 5 से 7 किलोमीटर दूर एक दो गांव को पार करते हुए जंगलों में पहुंचे. सुबह से इसे बटोर यानि इकट्ठा कर रहे हैं. तब जाकर इतना छींद जोड़ पाए हैं.
जब हमने उनसे पूछा कि आखिर इनका क्या इस्तेमाल करेंगे तो इसे लेकर वो बताती हैं कि छींद के इन पत्तों को ले जाकर अभी सुखाएंगे. जब यह पत्ते अच्छी तरह सूख जाएंगे, तो फिर इससे हम हैंडमेड झाड़ू तैयार करेंगे और उस झाड़ू को फिर बाजार में लेकर बेचेंगे, जिससे उन्हें चार पैसे मिलेंगे.
कैसे बनती है छींद की झाड़ू, कितनी होती है कमाई
उन्होंने बताया कि छींद की झाड़ू बनाना इतना सरल नहीं होता है. सबसे बड़ी बात तो पहले जंगल दर जंगल जाकर छींद की तलाश करना, जब काफी ज्यादा तादाद में छींद मिल जाती है, तो फिर उसे सुखाते हैं. फिर घर में बैठकर हाथों से ही एक-एक छेद उठाकर छींद की झाड़ू तैयार की जाती है. एक झाड़ू तैयार करने में 2 से 3 दिन का वक्त लग जाता है, ललिया बैगा बताती हैं कि जब झाड़ू तैयार हो जाती है, तो इसे लेकर वो बाजार में बेचने जाते हैं.

कुछ तो आसपास के गांव में ही बिक जाता है और कुछ बाजार में बेचते हैं. कभी 10 रुप, कभी 7 रुपए तो कभी 8 रुपए की एक झाड़ू बिकती है. उनसे जब हमने पूछा कि आखिर कमा कितना लेते हो तो इसे लेकर मुस्कुराते हुए बोलती हैं कि उतना तो नहीं हो पाता, लेकिन नमक तेल उनका जरूर चल जाता है."
कितने सालों से बना रहे झाड़ू
यहां आज भी कई बड़े क्षेत्र में छींद की झाड़ू आदिवासी समाज के लोग बनाते हैं. जब हमने पूछा कि आखिर कितने सालों से झाडू बना रही हैं, क्योंकि उनकी उम्र काफी ज्यादा थी, इसे लेकर वह खुद भी अचरज में पड़ गई कि वो कितने सालों से बना रही हैं. बाजू में खड़ी दूसरी महिला से पूछती हैं कि कितने सालों से वो कर रही है फिर बताती हैं कि कई साल हो गए. बचपन से ही वह झाड़ू बना रही हैं और इसे बनाना भी उन्होंने अपने घर से ही सीखा है. यह एक परंपरा चली आ रही है. घर के बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों को ये कला जरूर देकर जाते हैं, क्योंकि जब कुछ नहीं होता है, तो छींद के झाड़ू से ही उनका घर चलता है.

पोषण का पिटारा है छींद का फल
छींद को लेकर जेटठू कोल बताते हैं कि "ये तो कहीं भी मिल जाता है. तालाब के किनारे, खेतों की मेड़ पर भी मिल जाएगा. कितनी भी बंजर जमीन सालों से पड़ी हुई है, वहां भी मिल जाएगा. जंगलों में तो बहुतायत में छींद मिलता है. छींद की सबसे अच्छी बात यह है कि यह कहीं भी उग जाता है. जेटठू कोल छींद के फल को लेकर कहते हैं कि ये शरीर के लिए फायदेमंद माना जाता है."
आखिर छींद फल कितना पोषक तत्वों का पिटारा होता है? इसे लेकर आयुर्वेद डॉक्टर अंकित नामदेव बताते हैं कि "छींद का जो फल होता है, यह मल्टी न्यूट्रिशन वाला होता है. एक तरह से कह सकते हैं की पोषक तत्वों का पिटारा होता है. छींद मुख्यतः खजूर की ही एक प्रजाति है. ये साइज में थोड़ा सा छोटा होता है. ये बहुतायत में गांव में पाया जाता है. यह वाइल्ड वैरायटी खजूर होने के कारण खेतों के किनारे, तालाब और जंगलों में इसका पेड़ पाया जाता है. इसके रस गुण वीर्य विपाक सभी ऑलमोस्ट खजूर जैसे ही होते हैं. साइज में थोड़ा छोटा होता है, इसकी गुठली बड़ी होती है.

न्यूट्रीशन वैल्यू ऑलमोस्ट इक्विवेलेंट खजूर की तरह होती है, क्योंकि वाइल्ड वैरायटी है, तो इस पर फर्टिलाइजर या इंसेंटिसाइड, पेस्टिसाइड्स का उपयोग नहीं किया जाता है. इसलिए भी ये बहुत शुद्ध और पोषक आहार माना जाता है.
बेस्ट एनर्जी सप्लीमेंट, खून बढ़ाने वाला
आयुर्वेद डॉक्टर बताते हैं कि अपने शरीर को बेहतर रखने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए. मधुर रस, मधुर विपाक और शीत वीर्य होने के कारण इसका वृहण रिजल्ट मिलता है. ये पित्त शमन के लिए और पित्तज बीमारी के लिए इसका बहुत अच्छा उपयोग होता है, त्वरित शक्ति दायक होता है. इसका उपयोग सीधे फल के रूप में भी किया जाता है. इसका शर्बत बनाकर भी पिया जाता है.
यह बहुत अच्छा एनर्जी सप्लीमेंट हो सकता है. ग्रामीण लोग सालों से इसका उपयोग भी कर रहे हैं और यह फायदेमंद होता है. खून का स्तर बढ़ाने के लिए तो ये बहुत ही अच्छा है. इसके पत्ते जो होते हैं, लोग झाड़ू चटाई बनाने आदि में भी उपयोग करते हैं."

मिट्टी बचाने से लेकर हस्तशिल्प और घरेलू उपयोग
कृषि वैज्ञानिक डॉ मृगेंद्र सिंह जो कई सालों से आदिवासी अंचल में और ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, वह बताते हैं कि "जो छींद होती है, यह हमारे मिट्टी को भी बचाती है. इसकी जड़े मिट्टी को मजबूती से पकड़ कर रखती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है. इसके अलावा इसकी कठोर प्रकृति जो होती है, ये कम पानी और पथरीली जमीन पर भी आसानी से जीवित रह सकता है. यही वजह है कि जंगलों में और ऐसी जगह पर भी बड़ी आसानी से मिल जाता है, जहां कभी पानी भी नहीं पहुंचता, वहां भी ये सिर्फ बरसाती पानी से ही जीवित रह जाता है.
इतना ही नहीं इसे कोई लगाता भी नहीं है, ना ही इसका कोई बहुत ज्यादा संरक्षण करता है, फिर भी आज भी छींद उतनी ही तादात में पाया जा रहा है. जबकि इसके पत्तों का उतना ही इस्तेमाल हो रहा है."
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झोपड़ी से लेकर कई जगह पर इस्तेमाल
जेटठू कोल बताते हैं कि पहले के जमाने में छींद के पत्तों से झोपड़ियां बनाई जाती थी. जिसके पास पैसे नहीं होते थे, तो छींद के पत्ते ले आते थे और उसे छत के रूप में इस्तेमाल करते थे. इसकी पत्तियां इतनी घनी होती है कि अंदर पानी तक नहीं जाता है, लेकिन आजकल अब ये कम दिखाई दे रहा है. वजह है कि अब पीएम आवास के जो मकान बन रहे हैं. उससे लोगों को बहुत राहत है. अब लोग छींद की झोपड़ियां से दूरी बना रहे हैं.

इसके अलावा घरों में ग्रामीण अंचलों में आज भी जो सफेद कद्दू की बरी बनाई जाती है, उनको सुखाने के लिए भी छींद की चटाई बनाई जाती है और उसी में सुखाया जाता है. एक तरह से छींद की पत्तियों का रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत ज्यादा उपयोग है. आज भी ग्रामीण अंचल में ये लोगों की लाइफ लाइन है.

