किसानों का दुश्मन गेहूं का मामा, बहरूपिया बन तबाह कर देता है फसल, क्यों कहते हैं गुल्ली डंडा
किसानों के लिए परेशानी है गेहूं का मामा, फसल कर देता है खराब, जानिए क्यों पड़ा ये नाम और कैसे पहुंचाता है नुकसान.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : January 1, 2026 at 1:41 PM IST
रिपोर्ट: अखिलेश शुक्ला
शहडोल: आज 1 जनवरी से नए साल की शुरुआत हो चुकी है. किसानों को लेकर बात करें, तो भी रबी सीजन चल रहा है. गेहूं की फसल भी इन दिनों अपनी हरियाली खेतों में बिखेर रही है. आज बात एक ऐसे ही खरपतवार की करेंगे, जिसे गेहूं की खेती करने वाले किसानों का बड़ा दुश्मन भी मान सकते हैं. साथ ही इसे गेहूं का मामा, गुल्ली डंडा जैसे नाम से भी जाना जाता है.
क्या है गेंहू का मामा ?
कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर बीके प्रजापति बताते हैं कि "गेंहू के खेत में गेहूं के साथ ही उगने वाला ये एक खतरनाक खरपतवार है. जिसे गेहूं का मामा और गुल्ली डंडा भी कहा जाता है. इसके साथ ही मंडूसी, कनकी भी बोला जाता है. गेहूं की फसल के लिए ये एक सबसे खतरनाक खरपतवार है. इसका वैज्ञानिक नाम फैलेरिस माइनर है. अगर समय पर इसका नियंत्रण नहीं किया गया, तो गेहूं की फसल को ये नुकसान भी पहुंचाता है. ये बिल्कुल गेहूं की तरह ही दिखता है, इसलिए इसे पहचानना भी बहुत आसान नहीं होता है.
भारत में कहां से आया ?
गेहूं का मामा जो खरपतवार होता है, इसका ओरिजिन उत्तरी अफ्रीका, यूरोप के देशों में माना जाता है. वहां से जो इसका वितरण हुआ है, अन्य देशों में डिस्ट्रीब्यूशन हुआ है. हमारे देश में जब भारत में हरित क्रांति के पहले अनाज की कमी थी, तो उस समय अमेरिका, मेक्सिको से हमारे यहां अनाज आयात के रूप में आता था. उस समय गेहूं के साथ ये हमारे देश में मेक्सिको से आ चुका था. आज हमारे यहां जिसे हम गंगा का मैदानी क्षेत्र बोलते हैं, जहां पर धान गेहूं प्रणाली सबसे ज्यादा प्रचलित है. इसके अलावा भी जहां पर गेहूं की खेती होती है, वहां पर ये पौधा खरपतवार के रूप में आपको देखने को मिलता है.
गेहूं की तरह दिखने वाला खरपतवार
कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि गेहूं का मामा बिल्कुल गेहूं के समान दिखाई देता है. कई बार किसान इसे पहचान नहीं पाते हैं. जिसके चलते समय पर इसकी निदाई नहीं हो पाती है. इसके पहचान की बात करें तो गेहूं फसल और खरपतवार में अंतर क्या होता है? गेहूं का मामा की जो जड़ें निकली होती हैं और उसकी जड़ों का जो गांठ होता है, वो गुलाबी रंग का होता है. जबकि गेहूं में जो होता है, वो हल्का पीला और हरे रंग का होता है.
गेहूं के मामा की जो पत्तियां होती हैं, वो पतली और हल्की हरे रंग की होती है, बल्कि गेहूं में ज्यादा गहरे रंग की हरी पत्तियां होती है. गेहूं के मामा की जो पत्तियां होती हैं, वो शाखा बनाए हुए बंच के रूप में होती है. जो हमारा गेहूं जो होता है, वो इरेक्ट मतलब ऊपर की ओर खड़ी हुई होती है. वो 10 से 30 हजार तक बीज उत्पन्न कर सकता है, जबकि गेहूं से 60 से 80 दाने प्रति पौधा ही हमें प्राप्त होते हैं."

कितना नुकसान, कैसे करें नियंत्रण
कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि "गेहूं का मामा खरपतवार पर अगर समय पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो ये लगभग 15 से 40% तक गेहूं के उत्पादन को प्रभावित कर देता है. जब भी आप गेहूं की बुवाई करें, तो प्रमाणित बीज का ही उपयोग करें, जो शासकीय संस्था के माध्यम से बीज निगम द्वारा या नेशनल सीड कॉरपोरेशन के माध्यम से मिलेगा. प्रमाणित बीज को ही अपने खेतों में उपयोग करते हैं, तो खरपतवार कम से कम हो पाएगा. किसानों द्वारा जो पुराने गेहूं के फसलों के बीज को इकट्ठा करके बुवाई करते हैं, तो पहले से ही खरपतवार के दाने रहते हैं, तो फिर से वो खेतों में आपको देखने को मिल जाता है.
इसके नियंत्रण का दूसरा तरीका है कि बुवाई के 3 दिनों के अंदर में प्री इमरजेंस जो हैं, खरपतवारनाशी जो होते हैं, उसका उपयोग करिए. उसके बाद जैसे ही आपका गेहूं 20 से 25 दिन का होता है, उसमें पोस्ट इमरजेंस खरपतवार नासी मतलब सकरी पत्तियों को नियंत्रित करने वाले खरपतवार नाशी का उपयोग करते हैं, तो खरपतवार आपका कंट्रोल हो जाएगा और गेहूं की उत्पादकता बढ़ेगी."
गेहूं के लिए खतरनाक है ये खरपतवार
किसान राम सजीवन कचेर बताते हैं कि "यह जो गेहूं का मामा खरपतवार होता है, खेती के लिए बहुत ही खतरनाक है, क्योंकि यह एक तरह से नकलची पौधा है. जो अपने शुरुआती अवस्था में तो बिल्कुल गेहूं के पौधे की तरह ही दिखता है, मतलब शुरुआत में तो इसको पहचान ही नहीं सकते हैं. यह लगभग 1.8 मीटर 6 फीट तक बढ़ सकता है, हालांकि यह गेहूं की फसल से पहले पककर तैयार हो जाता है.

यह बारीक बीज पैदा करता है. जो मिट्टी में कई सालों तक जीवित रह सकते हैं. इसे कंट्रोल करना इसलिए भी जरूरी होता है, क्योंकि यह गेहूं के साथ मिट्टी, खाद पानी, धूप हर मामले में प्रतिस्पर्धा करता है और गेहूं के पौधे से ज्यादा तेजी से हर चीज ग्रहण करता है, जिससे गेहूं के पौधे को नुकसान होता है. इसका उत्पादन पर असर होता है."
कहां किन नामों से जाना जाता है
गेहूं का मामा यह उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में इसे बोला जाता है. इसके अलावा कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में गुल्ली डंडा भी इसे बोला जाता है. हरियाणा पंजाब वाले इलाके में इसे बहुत ज्यादा बोलते हैं. मध्य प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में भी इसे गुल्ली डंडा बोला जाता है. साथ ही पंजाब में इसे कनक दे मामा के नाम से भी बोलते हैं, तराई वाले जो क्षेत्र हैं, वहां इसे गेहूंसा के नाम से जाना जाता है. जितने क्षेत्र वहां के कल्चर के हिसाब से इसके उतने ही नाम है.
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खरपतवार का ऐसा नाम क्यों ?
अब दिलचस्प यह है कि इस गेहूं को मामा क्यों कहा जाता है? इसे लेकर किसान राम सजीवन कचेर कहते हैं कि "हमारे क्षेत्र में आम बोलचाल में इसे गेहूं का मामा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि हमारे क्षेत्र में मामा और भांजे का जो रिश्ता होता है, वह बहुत ही अटूट होता है. बहुत ही फ्रेंडली होता है. गेहूं का जो पौधा होता है, वह जो गेहूं का मामा खरपतवार है, इन दोनों में बहुत सामानता होती है. उनके बीच में फर्क करना मुश्किल होता है, इसीलिए इसे गेहूं का मामा बुलाने लगे हैं.
अब तो ये नाम प्रचलन में भी आ गया है. कुछ जगह पर इसे गुल्ली डंडा भी बोला जाता है. इसकी वजह ये है, इसकी जो बनावट होती है, जो खरपतवार है, इसका तना सीधा, पतला और सख्त होता है. दिखने में बिल्कुल डंडे की तरह होता है, तो वहीं इसका ऊपर का जो हिस्सा है, जो बीच का गुच्छा बनता है, वो छोटा और बेलनाकार होता है, जो कि बिल्कुल गुल्ली की तरह दिखता है. इसीलिए इसे गुल्ली डंडा के नाम से भी ग्रामीण क्षेत्रों में जानते हैं.

