Holi 2026: परकोटे में फिर सजा रांझा-हीर का मंच, सात पीढ़ियों से जीवंत है जयपुर का 'तमाशा'
होली के अवसर पर जयपुर में सैकड़ों साल पुरानी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें भट्ट परिवार लोकनाट्य का मंचन करता है.

Published : March 2, 2026 at 7:49 PM IST
जयपुर: होली की रंगत जब परवान चढ़ती है, तो गुलाल से पहले शास्त्रीय सुरों की गूंज परकोटे की हवाओं में घुलने लगती है. सवाई जयसिंह द्वितीय की बसाई इस नगरी में स्टेट पीरियड से चला आ रहा 'तमाशा' एक बार फिर ब्रह्मपुरी के छोटे अखाड़े में जीवंत हो उठा, जहां सिर्फ एक लोकनाट्य का मंचन नहीं, बल्कि जयपुर की जीवित सांस्कृतिक विरासत और परंपरा की जड़ें और भी गहरी होती दिखी.
इस बार भी शास्त्रीय संगीत की बंदिशों के साथ रांझा-हीर ने प्रस्तुति दी. खास बात ये है कि भट्ट परिवार की सात पीढ़ियां जिस समर्पण से इस परंपरा को निभा रही हैं, उसी तरह दर्शकों की भी सात पीढ़ियां इसे देखने हर साल होली पर यहां जुटती हैं. वहीं इस बार पुराने कलाकारों और पीढ़ियों से इस तमाशा को देख रहे दर्शकों को भी सम्मानित किया गया.
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राजनीति पर कटाक्ष करता रांझा: भगवा वस्त्र, सिर पर कलंगी वाला मुकुट, हाथ में मोर पंख और पैरों में बंधे घुंघरू के साथ जैसे ही रांझा मंच पर आया, ब्रह्मपुरी का छोटा अखाड़ा तालियों से गूंज उठा. रांझा का किरदार निभाने वाले तपन भट्ट ने इस बार भी पूरे वर्ष की राजनीतिक हलचलों, सामाजिक बदलावों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को तमाशा के कटाक्ष लहजे में पिरोया. हारमोनियम और तबले की संगत में उन्होंने अंग्रेजी और देसी लहजे का मिश्रण करते हुए सरकारी काम, फिल्म धुरंधर, ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान, एपस्टिन फाइल और केजरीवाल पर लगे आरोप के बाद बरी होने पर हल्के-फुल्के लेकिन असरदार तंज कसे.

एक जाजम पर तीन पीढियां: आयोजन के दौरान बुजुर्गों से लेकर युवा और बच्चों तक, हर वर्ग के लोग एक ही जाजम पर बैठकर इस परंपरा का आनंद लेते नजर आए. तमाशा के निर्देशक वासुदेव भट्ट ने मंच से पुरानी यादें साझा करते हुए बताया कि पहले बिना माइक के कलाकारों की बुलंद आवाज चौराहों तक गूंजती थी. अब भले ही तकनीक साथ है, लेकिन शास्त्रीय रागों की गहराई और कलाकारों की प्रस्तुति ने वही पुराना दौर फिर जीवंत कर दिया. दर्शकों में कई ऐसे परिवार थे, जो पीढ़ियों से इस तमाशे को देखने आते रहे हैं. कई बुजुर्ग अपने पोते-पोतियों को साथ लेकर पहुंचे और गर्व से बताते हैं कि वे बचपन से ये तमाशा देख रहे हैं.
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मूंछों वाली हीर ने फिर जीता दिल: यहां मूंछों वाली हीर ने इस बार भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. हीर का किरदार निभाने वाले विनीत भट्ट ने भाव-भंगिमाओं और संवाद अदायगी ने सबको चकित कर दिया. दर्शकों ने तालियों ने उनका स्वागत किया. वहीं चितरंगा के रूप में विशाल भट्ट की प्रस्तुति भी सराही गई. कई दर्शक उन्हें उनके असली नाम से कम और 'चितरंगा' के नाम से ज्यादा पुकारते नजर आए.

वहीं, तपन भट्ट ने बताया कि उनका परिवार तेलंगाना से यहां आया. यहां राजाओं ने उन्हें बसाया और स्थानीय लोगों के मनोरंजन की जिम्मेदारी सौंपी. पहले ये 52 स्थान पर हुआ करता था, अब सिमट कर इक्का-दुक्का जगह रह गया है, और इस बार के आयोजन की एक और खास बात रही कि भट्ट परिवार की नई पीढ़ी भी मंच पर उपस्थिति दर्ज कराते हुए परंपरा में नई ऊर्जा भर रही है.
होली का रंग, विरासत का संग: बहरहाल, होली के अवसर पर आयोजित इस तमाशे ने एक बार फिर साबित किया कि जयपुर की सांस्कृतिक विरासत केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी जीवंत है. ब्रह्मपुरी का छोटा अखाड़ा रंग, सुर और व्यंग्य से सराबोर रहा. रंगों के इस पर्व पर रांझा-हीर की प्रस्तुति ने परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम दिखा.
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