हिमाचल निर्माता के स्कूल की दीवारों को बना डाला टीचर, 243 साल पुराने संस्थान का ये यूनिक आइडिया
शमशेर स्कूल की स्थापना 30 अप्रैल 1783 को हुई. बाद में 1925 में इसे पंजाब विश्वविद्यालय के अधीन जिला हाई स्कूल का दर्जा दिया गया.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 21, 2026 at 3:27 PM IST
सिरमौर: देश में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने की बातें अक्सर होती हैं. नीतियां बनती हैं, योजनाएं घोषित होती हैं और सुधार के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश के नाहन में 243 साल पुराना एक ऐतिहासिक स्कूल इन दावों और बहसों से आगे बढ़कर जमीन पर बदलाव की मिसाल पेश कर रहा है.
दरअसल जिला मुख्यालय नाहन के ऐतिहासिक चौगान मैदान के किनारे स्थित शमशेर स्कूल की स्थापना 30 अप्रैल 1783 को हुई थी. बाद में वर्ष 1925 में इसे पंजाब विश्वविद्यालय के अधीन जिला हाई स्कूल का दर्जा दिया गया. वर्ष 1930 में स्कूल का नाम शमशेर हाई स्कूल कर दिया गया. वर्ष 1957 में इसे राजकीय शमशेर हाई स्कूल का दर्जा मिला और वर्ष 1986 में इसे वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के रूप में उन्नत किया गया.
यही वो संस्थान है जिसने डॉ. वाईएस परमार के रूप में हिमाचल प्रदेश को उसका निर्माता और पहला मुख्यमंत्री दिया. अब यही स्कूल एक बार फिर बदलाव की अगुवाई कर रहा है, लेकिन इस बार शिक्षा की 'नॉलेज रिवॉल्यूशन' के साथ. आज ये राजकीय शमशेर सीनियर सेकेंडरी स्कूल (छात्र) नाहन 'ओपन नॉलेज म्यूजियम' के रूप में नई पहचान बना चुका है. यहां शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि दीवारों, गलियारों और पूरे परिसर में जीवंत रूप से दिखाई देती है. इस स्कूल की दीवारें भी बच्चों की पढ़ाती हैं. इन दीवारों को देखकर बच्चे अपने सवालों के हल पाते हैं और कुछ नया सीखते हैं.
दरअसल स्कूल की दीवारों पर गणित, साइंस, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, सामान्य ज्ञान, भूगोल, फिजिक्स, कैमिस्ट्री सहित सभी विषयों के कई सवाल और उनके जवाब दीवारों पर उकेरे गए हैं. दीवारों पर उकेरे चित्रों के माध्यम से भी छात्रों का समझाने का प्रयास किया है. स्कूल का कोना-कोना हर विषय के सवाल और जवाबों से भरा पड़ा है, जहां नजर घुमती है, वहां सवाल और उनके जवाब मिलते हैं.

जब सोच बदली, तो दीवारें बोलने लगीं
साल 2023 में प्रिंसिपल डॉ. राजकुमार ने कार्यभार संभाला तो उनके मन में एक स्पष्ट विचार था कि शिक्षा केवल कक्षा की चारदीवारी में कैद नहीं रहनी चाहिए. उनका मानना था कि यदि स्कूल का वातावरण ही सीखने वाला बन जाए, तो बच्चे बिना दबाव के भी ज्ञान ग्रहण करेंगे. इसी सोच ने स्कूल की दीवारों को ज्ञान का माध्यम बना दिया. दीवारों पर सामाजिक ज्ञान-विज्ञान, साइंस, गणित सहित कई विषयों के चित्र उकेरे गए.
दो बच्चे भी रोज सीख लें, तो प्रयास सफल है
ईटीवी भारत से बातचीत में प्रिंसिपल डॉ. राजकुमार ने कहा कि 'हमारा उद्देश्य सिर्फ रिजल्ट बढ़ाना नहीं है, बल्कि बच्चों को जागरूक नागरिक बनाना है. हम चाहते हैं कि वो आते-जाते इन दीवारों को पढ़ें, समझें और जो सही लगे उसे अपने जीवन में अपनाएं. रोड सेफ्टी हो, चाइल्ड लेबर हो या ड्रग एब्यूज ये सिर्फ किताबों के अध्याय नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविक चुनौतियां हैं. अगर 450 बच्चों में से रोज दो-चार बच्चे भी 2-4 नई बातें सीख लें, तो यही हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है. मॉर्निंग असेंबली और लंच ब्रेक के दौरान बच्चे दीवारों पर लिखी बातों को पढ़ते हैं और कई बार उनसे जुड़े सवाल भी पूछते हैं. इससे उनकी जिज्ञासा बढ़ती है और सीख स्थायी बनती है.'

स्कूल के बाहर: सामाजिक चेतना का संदेश
स्कूल की बाहरी दीवारों पर उकेरी गई ये पेंटिंग्स सिर्फ छात्रों के लिए नहीं हैं. ये आम जनता के लिए भी संदेश देती हैं. सड़क से गुजरने वाला व्यक्ति भी इन्हें पढ़ता है और सोचने पर मजबूर होता है. इस तरह स्कूल अब सामाजिक जागरूकता का भी केंद्र बन गया है. स्कूल की बाहरी दीवारों पर नशा मुक्ति, नशे से होने वाले नुकसान, समय प्रबंधन, आत्मचिंतन के बारे में छात्रों के साथ लोगों को भी जागरूक करने वाले चित्र उकेरे गए हैं, जो दिल और दिमाग पर असर छोड़ने के साथ सोचने पर भी मजबूर करते हैं.
- नो स्मोकिंग और नशा विरोधी संदेश
- सड़क सुरक्षा नियम
- चाइल्ड लेबर के खिलाफ जागरूकता
- स्वास्थ्य संबंधी जानकारी
मॉर्निंग असेंबली के दौरान जब छात्र 20-25 मिनट तक बैठे रहते हैं, तो उनकी नजरें इन दीवारों पर लिखे तथ्यों को पढ़ती हैं. लंच ब्रेक में भी कई बच्चे नक्शों और सामान्य ज्ञान से जुड़े प्रश्नों के सामने खड़े दिखाई देते हैं. दीवारों पर देश के वर्तमान और पूर्व राष्ट्रपति, उपराष्ट्रति, प्रधानमंत्री, लोकसभा और विधानसभा स्पीकर्स के नाम लिखे गए हैं. इसके साथ ही देश की महान हस्तियों के चित्र, विचार उनके समाज के प्रति दिए योगदान का वर्णन किया गया है.
प्रतियोगी तैयारी की नींव
अध्यापक शिशुपाल का मानना है कि 'ये पहल केवल सजावट नहीं, बल्कि सोच-समझकर किया गया शैक्षणिक प्रयोग है. स्कूल के विकास और शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. दीवारों पर जीके, जियोग्राफी और साइंस से जुड़े प्रश्न उकेरे गए हैं. बच्चे फ्री पीरियड में इन्हें पढ़ते हैं और आपस में चर्चा भी करते हैं. ये तरीका उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रहा है. बाहर की दीवारों पर स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी आम जनता के लिए भी उपयोगी है.'

इन चीजों की मिलती है जानकारी
- राष्ट्रीय प्रतीक और संवैधानिक तथ्य
- जनरल साइंस की मूल अवधारणाएं
- गणित और विज्ञान के महत्वपूर्ण फॉर्मूले
- भारत और हिमाचल के मानचित्र
- स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरक गाथाएं–'वीर गाथा कॉर्नर' आदि
छात्रों की नजर में बदली तस्वीर
दसवीं के छात्र अक्षित कुमार का कहना है कि 'स्कूल में बेकार पड़ी वस्तुओं का दोबारा उपयोग कर परिसर को नया रूप दिया गया है. अब स्कूल पहले जैसा नहीं रहा. बाहर नशा मुक्ति और सड़क सुरक्षा के संदेश हैं. अंदर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों, विधानसभा अध्यक्षों और स्वतंत्रता सेनानियों की जानकारी दी गई है. देश और प्रदेश के मानचित्रों से हमें सीमाएं समझने में मदद मिलती है. खाली समय में भी हम कुछ न कुछ सीख लेते हैं.'
वहीं, नवमी के छात्र सौरभ चौहान कहते हैं कि 'पुरानी लकड़ियों और लोहे की पाइपों से जो बेंच बनाए गए हैं, उससे स्कूल का माहौल बदल गया है. दीवारों पर संविधान, गणित और साइंस के फॉर्मूले लिखे हैं. वीर गाथा कॉर्नर हमें प्रेरित करता है. इससे हमें स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानने का अवसर मिला है. अब स्कूल आना अच्छा लगता है. यहां हर कोने में कुछ न कुछ सीखने को मिलता है.'

विरासत से भविष्य तक
243 साल पुराना यह संस्थान केवल इतिहास का अध्याय नहीं है. यह इस बात का उदाहरण है कि इच्छाशक्ति, नवाचार और सकारात्मक सोच के साथ सरकारी स्कूल भी एक शानदार मॉडल बन सकते हैं. राजकीय शमशेर सीनियर सेकेंडरी स्कूल (छात्र) नाहन ने यह साबित किया है कि यदि शिक्षा को वातावरण से जोड़ दिया जाए, तो दीवारें भी शिक्षक बन सकती हैं. देश में सरकारी शिक्षा सुधार की बहस जारी है, लेकिन नाहन का ये ऐतिहासिक स्कूल बहस नहीं, बल्कि जवाब बनकर खड़ा है. जहां दीवारें बोल रही हैं. परिसर सिखा रहा है और हर दिन एक नई पीढ़ी 'नॉलेज रिवॉल्यूशन' के साथ आगे बढ़ रही है.

