1917 का कर्ज आज भी बाकी, सीहोर के सेठ के 35 हजार रुपए लेकर ब्रिटिश सरकार नहीं लौटी
सीहोर के सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने ब्रिटिश हुकूमत को दिए था 35 हजार का कर्ज, सेठ जुम्मा लाल के पोते ने किया खुलासा.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 23, 2026 at 1:50 PM IST
|Updated : February 23, 2026 at 7:52 PM IST
भोपाल: मध्य प्रदेश के सीहोर में रहने वाले विवेक रूठिया ने 109 साल पुराने दस्तावेजों के आधार पर एक दावा किया है. जिसने ब्रिटिश सरकार की आर्थिक लेनदेन की कहानी को चर्चा में ला दिया है. विवेक का कहना है कि साल 1917 में उनके दादा सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपए का कर्ज दिया था. यह कर्ज उस समय ब्रिटिश सरकार ने अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए लिया था, क्योंकि उस दौर में ब्रिटिश सरकार की आर्थिक स्थिति खराब चल रही थी, लेकिन 109 साल बीत जाने के बाद भी यह रकम परिवार को वापस नहीं मिली है.
वर्तमान में डेढ़ से दो करोड़ की कीमत
विवेक रूठिया का कहना है कि "इस लेनदेन से संबंधित गजट नोटिफिकेशन भी प्रकाशित हुआ होगा, जिससे यह साबित होता है कि यह कोई निजी उधारी नहीं बल्कि औपचारिक लेनदेन था. हालांकि 1947 में देश आजाद हुआ और अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए, लेकिन यह कर्ज अधूरा ही रह गया." विवेक रुठिया के बेटे गौतम रूठिया का कहना है कि "साल 1917 में एक रुपए की कीमत आज के 400 रुपए से अधिक रही होगी. इस अनुपात से जोड़े तो 35 हजार रुपए की कीमत आज के समय डेढ़ से दो करोड़ रुपए होगी. इसमें यदि ब्याज जोड़ दिया जाए, तो कर्ज की राशि में और बढ़ोत्तरी हो जाएगी."

इस तरह हुआ 109 साल पुराने कर्ज का खुलासा
रूठिया परिवार का कहना है कि सेठ जुम्मा लाल ने कर्ज देने के लगभग 20 साल बाद यानी 1937 में अंतिम सांस ली. उनके निधन के बाद यह दस्तावेज उनके पुत्र सेठ मानक चंद्र रूठिया के पास सुरक्षित रहे. वर्ष 2013 में उनके निधन के बाद ये कागजात विवेक रूठिया के पास पहुंचे. विवेक बताते हैं कि करीब 22 साल तक ये दस्तावेज घर में ही रखे रहे, लेकिन हाल ही में परिवार के भीतर चर्चा के दौरान यह मामला सामने आया.
कोर्ट के चक्कर काटने में लग जाते हैं सालों
विवेक रूठिया ने कहा कि "हमने कोई भी कानून कार्रवाई नहीं की है, उनका मानना है कि जो इस समय ज्यूडिशियल प्रक्रिया चल रही है, इसमें आदमी कोर्ट के चक्कर लगाता रहता है, फैसला आने में सालों साल लग जाता है. सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने के बाद अगर कोर्ट आदेश देता है, तो उसका पालन कराने की जिम्मेदारी सिविल जज की होती है, फिर इन सब बातों में साल दर साल लग जाते हैं."
वसूली नहीं, इतिहास को जीवंत बनाने की इच्छा
विवेक रूठिया का कहना है कि उनके परिवार की मंशा पैसे वापस लेने की नहीं है. वे न तो भारत सरकार और न ही किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में गए हैं. उनका उद्देश्य केवल इतना है कि यह ऐतिहासिक तथ्य सामने आए और इसे इतिहास में दर्ज किया जाए. उनका यह भी कहना है कि उस दौर में कई व्यापारियों ने ब्रिटिश सरकार को प्रशासनिक जरूरतों के लिए कर्ज दिया था. भले ही वह राशि वापस न लौटी हो, लेकिन उसका पूरा रिकार्ड सरकारी अभिलेखों में होना चाहिए."

रूठिया परिवार के पास नोटिस भेजने का अधिकार
इस मामले में अधिवक्ता धीरज कुमार का कहना है कि "अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कोई भी संप्रभु राष्ट्र पूर्व में लिए गए कर्ज के भुगतान के लिए सैद्धांतिक रूप से जिम्मेदार माना जाता है. इसके लिए रूठिया परिवार को ब्रिटिश सरकार के नाम नोटिस भेजना चाहिए. हालांकि यह देखना भी जरुरी है कि ब्रिटिश सरकार ने जब साल 1917 में रूठिया परिवार से कर्ज लिया था. उस समय कर्ज चुकाने की अवधि कितनी लिखी गई थी. ऐसे में यह मामलों कर्ज की समय सीमा और अनुबंध की शर्तों पर भी निर्भर करेगा.
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रॉल्स रॉयस से चलते थे सेठ जुम्मा लाल
गौतम रूठिया ने बताया कि "सेठ जुम्मा लाल उस समय रॉल्स रॉयस से चला करते थे. अंग्रेज अधिकारी उनकी अदावत के कायल थे. उस समय भोपाल, इंदौर, राजगढ़ और सीहोर समेत आसपास के इलाकों में सेठ जुम्मा लाल का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता था. सेठ जुम्मा लाल बृद्धि और विवेक में जितने कुशल थे, उतना ही प्रेम उनका समाज के प्रति भी था. उनके परिवार को सेठ जुम्मा लाल से जुड़ा एक और दस्तावेज मिला. जिसमें उनके द्वारा बीमार और गरीब परिवारों को राहत देने के लिए 6,446 रुपए की सहायता देने पर ब्रिटिश सरकार द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया है."

