छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्कूल में दर्ज जन्मतिथि को नहीं माना पॉक्सो केस में आधार, आरोपी दोषमुक्त और सजा हुई निरस्त
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पॉस्को से जुड़े मामले में अहम टिप्पणी की है.जिसमें पीड़िता के स्कूल रजिस्टर में दर्ज दाखिल खारिज जन्मतिथि को सिद्ध नहीं माना.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : August 31, 2026 at 12:06 PM IST
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने POCSO से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि सिर्फ स्कूल के प्रवेश रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर किसी पीड़िता की उम्र को निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं माना जा सकता, जब उसकी जन्मतिथि की प्रविष्टि का मूल आधार या स्रोत अभियोजन ने प्रमाणित ना किया हो. इस मामले में मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया. उसे सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया.
अभियोजन पक्ष ने पीड़िता तो बताया था नाबालिग
मामले में अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने नाबालिग पीड़िता को अपने साथ ले जाकर उसके साथ यौन संबंध बनाए. ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 363 ,366 और POCSO Act की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी.अपील पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सबसे पहले यह जांचा कि घटना के समय पीड़िता वास्तव में 18 वर्ष से कम आयु की थी या नहीं. अभियोजन ने उसकी उम्र साबित करने के लिए स्कूल के दाखिल खारिज रजिस्टर और कक्षा आठवीं के मार्कशीट पर दर्ज तारीख जुलाई 2005 में भरोसा किया था.
शिक्षक ने भी माना उन्हें उम्र के बारे में नहीं थी जानकारी
हालांकि, संबंधित सहायक शिक्षक ने जिरह में स्वीकार किया कि जन्मतिथि की संबंधित प्रविष्टि उन्होंने स्वयं नहीं की थी और उन्हें यह जानकारी भी नहीं थी कि उक्त जन्मतिथि किस दस्तावेज या स्रोत के आधार पर स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज की गई थी.कोर्ट ने यह भी पाया कि पीड़िता के माता-पिता उसकी वास्तविक जन्मतिथि से अनभिज्ञ थे.वे केवल उसकी उम्र लगभग 14 वर्ष बता सके.अभियोजन ने कोई जन्म प्रमाण-पत्र या अन्य प्राथमिक और विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया, जिससे स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि का आधार प्रमाणित हो सके.
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का किया उल्लेख
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी दस्तावेज को केवल दिखाना के रूप में स्वीकार कर लेना उसमें दर्ज प्रत्येक तथ्य की सत्यता को स्वतः सिद्ध नहीं करता . स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि की साक्ष्य-संबंधी महत्व उस स्थिति में कम हो जाती है, जब उस प्रविष्टि का मूल स्रोत या आधार प्रमाणित न किया गया हो.
फॉरेंसिक रिपोर्ट भी अपुष्ट
कोर्ट ने मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्यों का भी परीक्षण किया. मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर एवं जननांग क्षेत्र पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली. FSL रिपोर्ट में भी semen stains और human spermatozoa नहीं पाए गए. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नकारात्मक FSL रिपोर्ट अकेले आरोपी की निर्दोषता सिद्ध नहीं करती, लेकिन वर्तमान मामले की अन्य परिस्थितियों के साथ यह अभियोजन के आरोपों को पुष्ट नहीं करती.
पीड़िता की गवाही पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध के मामलों में विश्वसनीय और भरोसेमंद गवाही के आधार पर अकेले भी दृढ़ विश्वास की जा सकती है. लेकिन वर्तमान मामले में उसकी गवाही में मौजूद छूट, विसंगतियां और घटनाक्रम से जुड़ी परिस्थितियों के कारण कोर्ट को आवश्यक स्तर का विश्वास नहीं हुआ.
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पीड़िता की उम्र और आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को बिना किसी उचित संदेह के सिद्ध करने में असफल रहा. ऐसी स्थिति में आरोपी को संदेह का लाभ मिलना आवश्यक है. इसके आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि एवं सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया. साथ ही निर्देश दिया गया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में आवश्यक न हो तो उसे तत्काल रिहा किया जाए.

