समेज में उजड़े आशियानों को दो साल बाद भी जमीन का इंतजार, 36 लोगों की जान लेने वाली आपदा के नहीं भरे जख्म
समेज में आई आपदा के बाद पीड़ित आज भी स्थायी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं. इन्हें स्थायी पुनर्वास के लिए जमीन नहीं मिल पाई.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 14, 2026 at 12:46 PM IST
रामपुर बुशहर: 31 जुलाई 2024 की रात शिमला के रामपुर में स्थित समेज गांव पर आई विनाशकारी आपदा को भुला पाना आज भी ग्रामीणों के लिए संभव नहीं है. यहां आज भी तबाही के निशान हरे हैं, जहां पहले एक गांव आबाद था वहां आज मलबे के ढेर और बड़ी-बड़ी चट्टानें नजर आती हैं. शिमला के रामपुर और कुल्लू की सीमा पर स्थित यह गांव कुछ ही पलों में मलबे, चट्टानों और कीचड़ के ढेर में तब्दील हो गया था, जहां कभी स्कूल, मंदिर, खेत, गौशालाएं और घर आबाद थे, वहां आज सन्नाटा पसरा है. सरकारों ने उस समय जो वादे किए वो आज तक पूरे नहीं हुए. आज लोगों को उन वादों के पूरा होने की आस मिटती जा रही है.
लोग कई सालों से समेज में अपनी पुश्तैनी जमीन पर मकान बनाकर रह रहे थे, लेकिन बाढ़ में जमीन के साथ मकान भी बह गए. आपदा के बाद सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू और प्रशासनिक अधिकारियों ने गांव का दौरा किया था. उस दौरान लोगों को घर बनाने के लिए साथ लाख और 2 बिस्वां जमीन देने का वादा किया था. घर बनाने के लिए आर्थिक मदद मिल गई, लेकिन 2 बिस्वां जमीन का वादा अभी भी अधूरा है. इनके लिए जमीन की तलाश भी की गई, लेकिन कई बार एफसीआरए के कारण मामला फंस गया.

स्थायी पुनर्वास के लिए नहीं मिली जमीन
ग्राम पंचायत के पूर्व प्रधान मोहनलाल कपाठिया ने बताया कि 'जिन परिवारों के घर आपदा में बह गए थे, उन्हें सरकार की ओर से मकान निर्माण के लिए 7-7 लाख रुपये की सहायता राशि दी गई. हालांकि, स्थायी पुनर्वास के लिए भूमि उपलब्ध नहीं हो सकी, जिसके कारण कई प्रभावित परिवार आज भी अपने अन्य घरों या रिश्तेदारों के यहां रहने को मजबूर हैं.'
आज ताजा हैं लोगों के जख्म
दो साल पहले आई आपदा के बाद समेज गांव आज भी सुनसान दिखाई देता है. बरसात का मौसम आते ही उस भयावह रात की यादें ताजा हो जाती हैं. गांव ने अपनों को खोया, घर उजड़े और ऐसी पीड़ा मिली, जिसके निशान आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं. ग्रामीणों का कहना है कि आर्थिक सहायता तो मिली, लेकिन स्थायी पुनर्वास और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद अभी भी अधूरी है, क्योंकि कुछ लोगों के पास अपनी जमी ही नहीं है. आपदा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीएम सुक्खू खुद गांव का दौरा करने पहुंचे थे. हर तरफ मलबा ही मलबा नजर आ रहा था.
स्थानीय ग्रामीण बक्शी ने उस आपदा में बहुत कुछ खोया था. उन्हें आज भी यकीन नहीं होता कि उनके अपने अब इस दुनिया में नहीं हैं. वो याद करते हैं कि 'इस भीषण आपदा में मैंने अपनी बेटी और नाती को हमेशा के लिए खो दिया. 31 जुलाई 2024 की वह भयावह रात आज भी आंखों के सामने ताजा है. समय बीत गया, लेकिन इस त्रासदी ने ऐसे गहरे जख्म दिए हैं, जो शायद कभी नहीं भर पाएंगे. बरसात का हर मौसम उस दर्द और अपनों की याद को फिर से जीवंत कर देता है.'

भीषण बाढ़ में 36 लोगों की हुई थी मौत
दरअसल आज से दो साल पहले 31 जुलाई की रात को बादल फटने के बाद समेज खड्ड में आई भीषण बाढ़ अपने साथ भारी मलबा और विशाल चट्टानें लेकर आई, जिसने करीब 15 मकान पूरी तरह बह गए. कुछ मकानों का तो नामों निशान मिट गया. ये पहचान कर पाना भी मुश्किल था कि यहां कभी कोई मकान सालों से खड़ा था. इस भीषण त्रासदी में 36 लोगों की जान चली गई थी, जिनमें से कुछ लोग आज तक लापता हैं. राहत एवं बचाव कार्य के लिए एनडीआरएफ, सेना, आईटीबीपी, सीआईएसएफ और पुलिस के 301 जवान कई दिनों तक लगातार अभियान में जुटे रहे थे. मलबा हटाने के लिए पांच एलएनटी मशीनों का भी सहारा लिया गया था. आपदा तो बीत गई, लेकिन कुछ लोगों का पुनर्वास आज तक नहीं हुआ. वो परिवार जो कभी बड़े-बड़े घरों में रहते थे वो आज किराए के कमरों में रह रहे हैं. घर बनाएं तो बनाएं कहां, क्योंकि बाढ़ में जमीन बह गई. अब समेज में गुजर चुके लोगों की यादें ही रह गई हैं.
स्थानीय निवासी अनीता पुराने दिनों को याद करते हुए भावुक हो जाती हैं. वो आज भी अपने पुराने साथियों को याद करती हुई कहती हैं कि 'पहले गांव की सभी महिलाएं हर काम मिल-जुलकर करती थीं. खेतों से लेकर घर के काम तक सब एक-दूसरे का साथ निभाती थीं, लेकिन इस त्रासदी ने हमसे अपना परिवार और वो अपनापन छीन लिया. आज मैं खुद को अकेला महसूस करती हूं, क्योंकि जिनके साथ हर दिन हंसी-खुशी बीतता था, वो लोग अब हमारे बीच नहीं हैं. बरसात का मौसम आते ही वह भयावह रात और अपने बिछड़े लोगों की यादें फिर ताजा हो जाती हैं.'
तिरपातल के नीचे पढ़ रहे नौनिहाल
उस त्रासदी को दो वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन समेज के बच्चों का संघर्ष आज भी खत्म नहीं हुआ है. आपदा में पूरी तरह ध्वस्त हुआ राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय और प्राथमिक विद्यालय आज भी दोबारा खड़ा नहीं हो पाया है, जिसके चलते 73 छात्र और 13 नन्हे बच्चे आज भी न्यूकुंदर महिला मंडल के आंगन में तिरपाल के नीचे पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि, शिक्षा का अधिकार केवल किताबों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण भी हर बच्चे का अधिकार है. मानसून के दौरान लगातार बारिश और भूस्खलन की आशंका के बीच बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है.

