संत ने अस्पताल के लिए बेची पूरी संपत्ति, गांव में बनाया सर्वसुविधायुक्त भवन, तीन साल से लोकार्पण का इंतजार
बालोद के गुरुर ब्लॉक में एक 90 साल का संत सिस्टम की लचर व्यवस्था के कारण लोगों का दर्द नहीं दूर कर पा रहा है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : June 24, 2026 at 9:56 PM IST
बालोद : इंसान अपने उम्र के आखिरी पड़ाव में सुकून की तलाश में रहता है. अक्सर ये देखने को मिलता है कि बुजुर्ग होने पर लोग ज्यादा समय अपनों के साथ बिताना चाहते हैं.लेकिन छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का एक शख्स उम्र के आखिरी पड़ाव में खुद के लिए नहीं बल्कि दूसरों की भलाई करने की उम्मीद लिए बैठा है. इस शख्स की पथराई आंखें आज भी उस चीज के इंतजार में हैं,जिसके लिए इसने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया. आईए जानते हैं आखिर कौन है ये शख्स.
अस्पताल खुलने की आस
ये कहानी है बालोद जिले के गुरूर ब्लॉक के गांव दुबचेरा में रहने वाले 90 वर्षीय कबीरपंथी संत गुरु सुख दास साहेब की. जिनकी बूढ़ी और पथराई आंखें रोज सुबह उठकर गांव के एक सूने अस्पताल भवन को निहारती हैं. दिन ब दिन कमजोर होता शरीर और घटती सांसें सिर्फ इसी उम्मीद पर टिका है कि अस्पताल भवन का लोकार्पण हो और गांव के मरीजों को उचित इलाज मिले. अब बीतते साल और बढ़ते इंतजार की वजह से इस बुजुर्ग का हौंसला जवाब देने लगा है.

क्यों है अस्पताल का इंतजार
क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और इलाज के अभाव में दम तोड़ते गरीबों की तकलीफ को देखकर संत गुरु सुख दास साहेब का दिल ऐसा पसीजा कि उन्होंने एक ऐतिहासिक फैसला ले लिया. उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति और जीवनभर की जमा-पूंजी बेच डाली ताकि गांव में ही अस्पताल खुल सके. मकसद सिर्फ एक था कि गांव के गरीबों को इलाज के लिए शहर न दौड़ना पड़े.
संत की इच्छा को मिला बल
संत साहेब के इस पावन संकल्प को देखकर ग्रामीणों का भी दिल पसीज गया. गांव वालों ने एकजुट होकर अस्पताल के लिए आधा एकड़ जमीन दान में दे दी. इसके बाद संत साहेब ने अपने पैसों से वहां एक सर्वसुविधायुक्त अस्पताल भवन खड़ा कर दिया. कबीर साहब के दिखाए सद्मार्ग पर चलने वाले गुरु सुख साहेब का मानना है कि यह शरीर तो नाशवान है, एक दिन मिट्टी में मिल जाना है. लेकिन परमार्थ और दूसरों की सेवा हमेशा जेहन में जिंदा रहती है. मैं बस अपने जीते जी यहां डॉक्टरों को बैठते देखना चाहता हूं.

मैंने गांव में अस्पताल भवन का निर्माण अपने लिए नहीं किया है.इसमे मेरा परमार्थ है,मैंने कबीर साहब के बताए रास्तों पर चलकर लोगों की सेवा करने का संकल्प लिया है.मेरा आपसे यही गुजारिश है कि जल्द से जल्द इस भवन में अस्पताल का संचालन शुरु करवा दीजिए- संत गुरु सुख दास साहेब
बिना किसी इंजीनियर के तैयार किया 'आधुनिक अस्पताल '
आपको बता दें कि संत ने बिना किसी सरकारी या तकनीकी मदद के इस भवन का निर्माण बिल्कुल उसी ब्लूप्रिंट पर करवाया है, जैसा एक आधुनिक सरकारी अस्पताल का होता है. आईए आपको बताते हैं कि इस भवन में क्या-क्या है.
- ओपीडी (OPD) कक्ष: मरीजों की त्वरित जांच और प्राथमिक उपचार के लिए
- आईसीयू (ICU) और जनरल वार्ड: गंभीर स्थिति से निपटने और मरीजों को भर्ती करने के लिए
- पैथोलॉजी लैब कक्ष: ब्लड टेस्ट, एक्स-रे और अन्य जरूरी जांचों के लिए आरक्षित जगह
- प्रबंधन कक्ष : दवाओं का विशाल स्टोर, डॉक्टरों के कमरे और एक आपातकालीन गेट
3 साल से भवन को लोकार्पण का इंतजार
विडंबना देखिए कि जिस इमारत को एक बुजुर्ग ने अपनी जिंदगी बेचकर साल 2023 में ही मुकम्मल कर दिया था, वह आज 3 साल बाद भी ताले में बंद है. स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने औपचारिकता निभाते हुए अपनी रिपोर्ट प्रदेश स्वास्थ्य मुख्यालय को भेज तो दी है, लेकिन तब से लेकर आज तक फाइलें मंत्रालय और दफ्तरों की धूल खा रही हैं.पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर वर्तमान सरकार और प्रशासन के आला अधिकारियों तक गुहार लगाई जा चुकी है, लेकिन नतीजा सिर्फ 'खोखला आश्वासन' रहा.
"हमने शासन-प्रशासन से बहुत मिन्नतें कर लीं. किसी ने अपना सर्वस्व इस भवन के लिए फूंक दिया है, ताकि लोगों की जान बच सके.सरकार को इस त्याग का सम्मान करना चाहिए और तुरंत अस्पताल शुरू करना चाहिए, वरना हमें आंदोलन का रास्ता चुनना होगा ''- दिनेंद्र साहेब, संत के शिष्य
"पूरे गांव ने इस नेक काम में सहयोग किया है, लेकिन मुख्य धन साहेब जी ने अपनी संपत्ति बेचकर लगाया है.साहेब जी की अंतिम इच्छा है कि वे अपनी आंखों के सामने यहां मरीजों का इलाज होते देख लें.व्यवस्था को इतनी संवेदनहीनता नहीं दिखानी चाहिए- मनसुख लाल साहू, ग्रामीण व्यवस्था अध्यक्ष
जिम्मेदारों को जानकारी लेकिन आदेश का इंतजार
इस बारे में जिम्मेदारों से सवाल पूछा गया तो उनका कहना था कि अस्पताल भवन का बनना अलग बात है.यदि उन्हें भवन बनाना था तो पहले जानकारी देनी थी,इसके बाद निर्माण कराना था.उक्त भवन में अस्पताल चलाने के लिए सेटअप की आवश्यकता है. जिसका प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है.
इस संदर्भ में सारी जानकारी प्रदेश स्वास्थ्य विभाग को भेज दी गई है.अभी अस्थायी व्यवस्था के लिए दो डॉक्टर भेजे जाएंगे. प्रॉपर सेटअप और संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है, जिसके लिए शासन को पत्र भेजा गया है— डॉ. जेएल उइके, CMHO
संत के त्याग की कौन लेगा सुध ?
90 साल के एक फकीर संत का यह त्याग देश के बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों और खुद को 'जनसेवक' कहने वाले राजनेताओं के मुंह पर एक जवाब है, जो चुनावों में करोड़ों के वादे करते हैं और बाद में भूल जाते हैं. अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या प्रशासनिक तंत्र बुजुर्ग संत की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए अस्पताल के संचालित करेगा,या फिर आश्वासन का बोझ लिए संत को इस दुनिया से रुकसत होना पड़ेगा.
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