इस गांव में था जिन्नों का आतंक, खड़े-खड़े गिर जाता था इंसान, डरावनी है जिंदा गांव की कहानी
सागर में एक गांव ऐसा है जिसका नाम जिंदा है, भूत-प्रेत, जिन्न से जुड़ा है इस नाम के पीछे की वजह, जिसकी दहशत में कई परिवारों ने छोड़ दिया था गांव. सागर से कपिल तिवारी की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : July 1, 2026 at 5:40 PM IST
सागर: वैसे तो भारत देश में कई अजीबोगरीब नाम वाले गांव, कस्बे और शहर हैं. इन नामों के पीछे कई कारण भी हैं और उनकी पहचान भी छिपी हुई है. ऐसा ही एक गांव सागर शहर से लगा हुआ है, जिसका नाम जिंदा है. पहली बार सुनकर और पढ़कर लगता है कि ये कैसा नाम है, लेकिन जब इस गांव के बुजुर्गों से इस नाम के बारे में पूछो, तो कहानी सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
दरअसल, इस गांव के पीछे भूत प्रेत का भय जुड़ा हुआ है, तो पलायन की पीड़ा भी जुड़ी हुई है. जिंदा गांव के नाम के बारे में जब किसी बुजुर्ग से पूछों, तो वो करीब 200 साल पुरानी कहानी का जिक्र करते हैं. जिसमें भूत प्रेत और जिन्न की दहशत के साथ ग्रामीणों का संघर्ष जुड़ा हुआ है. जो डर गए वो गांव छोड़कर पलायन कर गए, जो मन के भय से लड़ते रहे, वो आज गांव में सुखी जीवन बिता रहे हैं और जिन्न की दहशत मानो फुर्र हो गयी है.
कहां है जिंदा गांव
सागर शहर से लगे इस गांव की बात करें, तो शहर से लगी हुई बमोरा ग्राम पंचायत के अंतर्गत जिंदा गांव आता है. बमोरा ग्राम पंचायत में सिर्फ 2 गांव बमोरा और जिंदा गांव आते हैं. बमोरा गांव को लोग भलीभांति जानते हैं, लेकिन जिंदा गांव थोड़ा अंदरूनी इलाके में बसा होने के कारण कम चर्चित है, लेकिन जब कोई इस गांव का नाम पहली बार सुनता है, तो नाम और गांव को लेकर जरूर जानना चाहता है.
इस गांव में 2 ठाकुर परिवार है, जिन्हें एक तरह से गांव का मुखिया का दर्जा हासिल है. कहा जाता है कि कभी इस गांव में ठाकुरों का दबदबा था और करीब 70 ठाकुर परिवार यहां रहते थे, लेकिन करीब 200 साल पहले एक अंजानी दहशत के कारण ये गांव लगभग वीरान हो गया और कई परिवार यहां से पलायन कर गए. जो 70 ठाकुर परिवार यहां रहते थे, उनमें से अब सिर्फ दो परिवार यहां पर बचे हैं और बाकी परिवार गांव छोड़कर दूसरे गांव या शहर में बस गए हैं.

200 साल पहले था दहशत का माहौल
गांव के बुजुर्ग वीर सिंह ठाकुर बताते हैं कि "मेरे परदादा बताते थे कि गांव का नाम जिंदा कैसे पड़ा. ये करीब 200-250 साल पुरानी बात है. जब मैं छोटा था, तो मेरे परदादा बताते थे कि इस गांव का नाम जिंदा इसलिए पड़ा, क्योंकि यहां पर जिन्न रहते थे. मैंने पूछा कि जिन्न क्या होते हैं, तो उन्होंने बताया था कि प्रेत योनि में रहते हैं, तो जिन्न भी और प्रेत भी कहा जाता है. परदादा ने ये भी बताया था कि जिन्न हमारे परिवार को परेशान भी करते थे.
फसल-घरों को नुकसान कर देते थे जिन्न
जब जिन्न ने बहुत ज्यादा परेशान करना शुरू कर दिया, तो हमारे गांव में एक पंडित जी थे, जो पूजा पाठ और ज्योतिष भी जानते थे, साथ में तंत्र-मंत्र भी जानते थे. हमारे परदादा ने उनसे बात की, तो उन्होंने बताया कि गांव में जिन्न है और वो सबको परेशान करते हैं. कुछ दिनों बाद जब हमारा परिवार बरमान में नर्मदा स्नान के लिए जा रहा था, तो पंडित जी से पूछा कि क्या वो भी चलेंगे, तो पंडित जी ने मना कर दिया. तब हमारे परदादा ने कहा कि हम लोग चले जाएंगे, तो जिन्न हमारी फसल और घर पर नुकसान कर सकते हैं, तो क्या करना चाहिए.

एक पंडितजी ने जिन्नों को गांव से खदेड़ा
तब पंडितजी ने कहा कि आप निश्चिंत होकर जाओ, हमारे गांव में एक नहीं जितने भी जिन्न है, हम उन सबको अपनी विद्या के जरिए खदेड़ देंगे. तब हमारे परदादा ने कहा कि हमें कैसे पता चलेगा कि आपने जिन्न को भगा दिया. तब पंडित जी ने कहा कि तुम्हे बरमान पहुंचने में दो तीन दिन का समय लगेगा. एक दिन बाद तुम्हारी सभी बैलगाड़ी के एक तरफ के खूटा टूट जाएंगे. ऐसा होगा तो समझ जाना कि गांव से जिन्न चले गए और वापस आकर हमें बताना कि ऐसा हुआ कि नहीं.
पंडित जी ने जैसा कहा था, वैसा ही हुआ और हम लोग वापस आए, तो उन्हें बताया. तब से हमारे गांव को जिंदा गांव कहा जाने लगा. अब गांव में ऐसा कुछ भी नहीं है, पंडित जी ने जैसा कहा, वैसा ही हुआ. हमारे परिवार की चार बैलगाड़ी नर्मदा जी के लिए गयी थी, तो रास्ते में चारों बैलगाड़ियों के खूटा टूट गए. अब हमारे गांव में किसी तरह की समस्या नहीं है.
खेती करना, उठना-बैठना सबकुछ हो गया था मुश्किल
ठाकुर वीर सिंह बताते हैं कि जिन्नों के कारण गांव के लोगों का रहना मुश्किल हो गया था. ना गांव के लोग ढंग से अपने घर में रह पाते थे, ना खेती किसानी कर पाते थे. यहां तक कि जैसे हम आप बैठे हैं, इसी तरह गांव के लोग बैठे रहते थे, तो अचानक गिर जाते थे. गांव के लोगों के मकानों की दीवारें अपने आप ढह जाती थी. खेती करना इतना मुश्किल हो गया था कि खड़ी फसल एक मिनट में जलकर खाक हो जाती थी. लोग दहशत के मारे घर से नहीं निकलते थे. अगर गांव लौटने पर रात हो जाए, तो फिर गांव नहीं आते थे.

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कभी 70 ठाकुर परिवार थे गांव में, अब सिर्फ दो बचे
वे कहते हैं कि हमारे परदादा के समय इस गांव में 70 ठाकुर परिवार थे. इसके अलावा अन्य जातियों के लोग भी यहां रहते थे, लेकिन एक समय ये हाल हो गया था कि एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार करके आते थे, तब तक दो लोगों की मौत और हो जाती थी. वीर सिंह ठाकुर ने बताया कि यहां पर ठाकुरों की बड़ी-बड़ी बाखर (मकान) थे, लेकिन आज कुछ नहीं बचा है. अब सिर्फ हम दो परिवार के ठाकुर यहां पर रहते हैं. एक समय ऐसा था कि लोग अपना घर वार और गृहस्थी का सामान तक छोड़कर गांव से चले गए थे."

