जब पेड़ बने पत्थर! सागर में दुर्लभ जीवाश्मों ने खोला पृथ्वी का 180 करोड़ साल पुराना रहस्य
सागर यूनिवर्सिटी के एप्लाइ़ड जियोलाॅजी डिपार्टमेंट में दुर्लभ वनस्पति जीवाश्मों का संग्रह, दिखी 180 करोड़ साल पहले वनस्पतियों की दुनिया. कपिल तिवारी की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : July 4, 2026 at 3:05 PM IST
सागर: बेजान नजर आने वाले पत्थरों की दुनिया बहुत ही अद्भुत और चमत्कारिक है. खासकर जब ये जीवाश्म बन जाते हैं, तो बेशकीमती हो जाते हैं. क्योंकि इनसे पृथ्वी का करोड़ों साल पुराना इतिहास आसानी से पता चल जाता है. इनसे उस समय के जीव जंतु, जलवायु, वनस्पति और प्राकृतिक संसाधनों की जानकारी मिलती है. सागर यूनिवर्सिटी के एप्लाइ़ड जियोलाॅजी डिपार्टमेंट के म्यूजियम में ऐसे ही अद्भुत जीवाश्मों का अपना अलग संसार है.
यहां आपको 180 करोड़ साल पुराना शैवाल का जीवाश्म मिलेगा, तो साढे़ छह करोड़ साल पुराने विशाल वृक्ष के तने का जीवाश्म भी देख सकते हैं. इतना ही नहीं, साढे़ चार करोड़ साल पुराना पेड़ खुद ही अपने समय के पेड़ पौधों और मौसम की जानकारी देता नजर आएगा. वनस्पति जीवाश्म की अद्भुत दुनिया से कई तरह की जानकारियां मिलती हैं और इसका अध्ययन कर वैज्ञानिक पृ़थ्वी के विकास, उस समय की जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों का पता लगा सकते हैं.
क्या होते हैं जीवाश्म?
पृथ्वी पर लाखों करोड़ों साल पहले की जीवित वनस्पति, जीव जंतु और सूक्ष्मजीवों संरक्षित अवशेष या उनके द्वारा छोड़े गए निशान वगैरह जीवाश्म कहलाते हैं. आमतौर पर जब कोई पेड़ गिर जाता है या कोई जीव जंतु मर जाता है, समय के साथ उसके अवशेष रेत, मिट्टी और कीचड़ के नीचे दब जाते हैं. धीरे-धीरे समय के साथ ये सभी अवशेष चट्टान का रूप ले लेते हैं. इनमें वनस्पति, जीव जंतु और सूक्ष्मजीवों के जीवाश्म हो सकते हैं. जीव जंतुओं में उनके दांत, पंजे और हड्डियों के जीवाश्म ज्यादातर मिलते हैं. इसी तरह वनस्पतियों में ज्यादातर जीवाश्म उनके तने और कई बार पत्तियों वगैरह के भी मिलते हैं.

सागर में मौजूद करोड़ों साल पुराने वनस्पति जीवाश्म
सागर यूनिवर्सटी के एप्लाइड जियोलाॅजी (व्यवहारिक भूविज्ञान) विभाग के संग्रहालय में ऐसे कई बेशकीमती जीवाश्म मौजूद हैं, जिनमें वनस्पति जीवाश्म की अद्भुत दुनिया है. जिनका अध्ययन कर विशेषज्ञ सिलसिलेवार पृथ्वी के विकास, वनस्पतियों के विकास और खासतौर पर उस समय की जलवायु का अध्ययन कर सकते हैं.
सागर के नजदीक मिला 6.5 करोड साल पुराने वृक्ष का जीवाश्म
सागर यूनिवर्सटी के भूवैज्ञानिकों पी.के. कठल और आरसी मेहरोत्रा द्वारा ने आज से करीब 9 साल पहले सागर के नजदीक मोठी गांव में राइजोपालमोक्सिलोन (Rhizopalmoxylon) खोजा था. जो करीब साढे़ 6 करोड़ साल पुराना है. यह एक जीवाश्म ताड़ है, जो मध्य प्रदेश की दक्कन इंटर ट्रैपियन (Deccan Intertrappean) चट्टानों में पाए जाते हैं. इस तरह के जीवाश्म मध्य प्रदेश के सागर और छिंदवाड़ा जिले में पाए गए हैं. जिससे लाखों साल पहले के क्रिटेशियस काल के अंत की गर्म और आद्र जलवायु के संकेत मिलते हैं.

इनके अध्ययन से पता चला है कि ये इलाका पहले खारे पानी, दलदली इलाके का हिस्सा रहा है. सागर यूनिवर्सिटी के असि. प्रोफेसर डाॅ. गौरव सिंह बताते हैं कि ''वनस्पति जीवाश्म में ज्यादातर पेड़ों के कठोर हिस्से ही ज्यादातर जीवाश्म बनते हैं. जिनमें ज्यादातर पेड़ों का तना होता है. इस जीवाश्म में साफ देख सकते हैं कि इसके अंदर रेशे जैसी आकृति दिखती है. इससे पता चलता है कि जब प्लांट को उर्जा की जरूरत होती है, तो जड़ों के माध्यम से तने तक पहुंचता है. इस जीवाश्म में बहुत अच्छे तरीके से संरक्षण (preservation) हुआ है.

साढे़ चार करोड़ साल पुराना पाम ट्री का जीवाश्म
सागर यूनिवर्सिटी के एप्लाइड जियोलाॅजी डिपार्टमेंट के संग्रहालय में मंडला के घुघुआ में मिला 4.5 करोड साल पुराना पाम ट्री का जीवाश्म मिला है. इसकी खास बात ये है कि अगर इसके टुकड़े को पालिश करके देखें, तो जीवाश्म में आपको एक पेड़ की तरह वलय (ring) संरचना नजर आएगी और कोई भी आसानी से नहीं समझा पाएगा कि ये पेड़ है या फिर उसके जीवाश्म है. माइक्रोस्कोप में भी ये उसी तरह नजर आएगा, जैसे कोई पेड़ नजर आता है. कई मामलों में तो ये माइक्रोस्कोप में पेड़ से बेहतर नजर आता है.

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180 करोड़ साल पुराना प्री-कैम्ब्रियन जीवाश्म
डाॅ. गौरव सिंह बताते हैं कि, ''एप्लाइड जियोलाॅजी डिपार्टमेंट के म्यूजियम में प्री कैम्बियन जीवाश्म भी मौजूद हैं, जो करीब 180 करोड़ साल पुराना है. प्री कैम्बियन जीवाश्म पृथ्वी के इतिहास के सबसे प्राचीन यानि 3.5 अरब वर्ष से 54 करोड साल पुराने हैं. संग्रहालय में प्री कैम्बियन जीवाश्म शैवाल (Algae) मौजूद है. इसमें अलग-अलग परतें एक के ऊपर एक नजर आती है. इसमें एक परत चूना पत्थर और एक परत शैवाल की है. इसका कारण ये है कि कोई भी शैवाल को प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश की जरूरत होती है.

पानी में सूर्य का प्रकाश जहां तक पहुंचता है, तो शैवाल वहां तक मिलती है. जब तक सूर्य का प्रकाश मिलता है, तब तक इनकी वृद्धि बेहतर होती है. लेकिन पानी में मौजूद चूने की परत शैवाल को ढक लेती है, इससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है. ऐसे में कुछ शैवाल चूने की परत को छेदकर ऊपर आकर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करता है. इस तरह एक परत शैवाल और एक परत चूने की पत्थर की जम जाती है और इस तरह कई परते बन जाती है. ये आमतौर पर प्री कैम्ब्रियन चट्टानों में मिलता है. ये इसलिए मिलते हैं कि उस वक्त शैवाल को खाने वाले जीव पृथ्वी पर मौजूद नहीं थे. इसलिए उस समय शैवाल काफी समय में मौजूद थे.''
वनस्पति जीवाश्मों के अध्ययन से क्या जानकारी मिलती है
असि. प्रोफेसर डाॅ गौरव सिंह बताते हैं कि वनस्पति जीवाश्मों का अध्ययन काफी महत्वपूर्ण होता है और ये हमें अरबों साल पुरानी जानकारियां देता है.''

