न जमीन न आसमान, हवा में विराजमान अंतरिक्ष पार्श्वनाथ! सागर में देश का दूसरा अनोखा जैन मंदिर
सागर के मंगलगिरी में बनेगा अनोखा जैन मंदिर, हवा में स्थापित होगी अंतरिक्ष पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा. पढ़ें मंदिर का इतिहास.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : January 9, 2026 at 1:14 PM IST
|Updated : January 9, 2026 at 2:07 PM IST
सागर: मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड की बात करें, तो यहां पर जैन धर्मावलंबी काफी संख्या में हैं. संभागीय मुख्यालय सागर में भी जैन धर्म से जुडे़ लोगों की संख्या काफी ज्यादा है. ऐसे में यहां जैन धर्म के एक से बढ़कर एक मंदिर स्थापित किए गए हैं और किए जा रहे हैं. इसी कड़ी में सागर की मंगलगिरी में एक और मंदिर स्थापित होने जा रहा है.
फिलहाल देश का ऐसा इकलौता मंदिर महाराष्ट्र के वाशिम है, इस मंदिर की खासियत ये है कि यहां स्थापित भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा अधर में है. इसलिए इस प्रतिमा को अंतरिक्ष पार्श्वनाथ प्रतिमा कहा जाता है. खास बात ये है कि देश की इसी तरह की दूसरी प्रतिमा अब सागर के मंगलगिरी में स्थापित होने जा रही है.
देश की इकलौती अंतरिक्ष पार्श्वनाथ प्रतिमा
महाराष्ट्र के वाशिम जिले में शिरपुर जैन नाम की जगह देश विदेश के जैन अनुयायियों की आस्था का केंद्र है. जिसे अंतरिक्ष पार्श्वनाथ नाम से जाना जाता है. यहां स्थापित भगवान पार्श्वनाथ की प्राचीन मूर्ति को अंतरिक्ष में स्थापित माना जाता है. कहा जाता है कि भगवान पार्श्वनाथ हवा में विराजमान हैं. यहां बने कुंए को चमत्कारी माना जाता है. कहते हैं कि इस कुएं के पानी से नहाने से चर्म रोग ठीक हो जाते है. यहां भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा जमीन से ऊपर हवा में नजर आती है. कहा जाता है कि इस प्रतिमा को राजा ऐल श्रीपाल ने कुएं से निकलवा कर मंदिर का निर्माण कराकर स्थापित करवाया था. मंदिर की पुरानी ईंटें पानी में तैरती हैं.

मंगलगिरी जैन तीर्थ स्थल में होगी स्थापना
अब महाराष्ट्र के वाशिम की तरह अंतरिक्ष पार्श्वनाथ की दूसरी प्रतिमा सागर के मंगलगिरी तीर्थ पर स्थापित की जा रही है. मंगलगिरी तीर्थ ट्रस्ट के अध्यक्ष जयकुमार जैन ने बताया कि, ''महाराष्ट्र के वाशिम में अंतरिक्ष पार्श्वनाथ नाम से भगवान पशुनाथ का मंदिर है. जिसमें भगवान की ऐसी प्रतिमा विराजमान है, जो अधर में हैं. किसी भी तरफ से कोई सहारा नहीं है. प्रतिमा के नीचे से कपड़ा निकाल सकते हैं. हमारी भी ऐसे ही मंदिर बनाने की भावना हुई की. इसी तरह की प्रतिमा का निर्माण कराया जाए और इस मंदिर में प्रतिष्ठित कराया जाए. इसके लिए संकल्प लिया है और शीघ्रातिशीघ्र मंदिर का निर्माण कराया जाएगा और प्रतिमा स्थापित कराई जाएगी.''

कुएं के जल के स्नान से शरीर के विकार होते हैं ठीक
भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय मंत्री और दिगंबर जैन तीर्थ निर्देशिका के संपादक हंसमुख जैन गांधी बताते हैं कि, ''23 वे तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की इस अतिशयकारी प्रतिमा के आगे विज्ञान भी नत मस्तक हो जाता है, क्योंकि यह अधर में है. इसलिए इसे अंतरिक्ष पार्श्वनाथ के नाम से जाना जाता है, यह पृथ्वी को स्पर्श नहीं करती है और इसके नीचे से आसानी से पतला कपड़ा या लोहे का स्केल निकल जाता है.''
जिनवाणी संरक्षण और प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. संजीव सर्राफ कहते है कि, ''जैनों की आस्था का केंद्र और भारतीय संस्कृति की अदभुत धरोहर अंतरिक्ष पार्श्वनाथ की मूर्ति 42 इंच की है. यह रामायण कालीन मूर्ति मानी जाती है. मंदिर की पुरानी ईंट पानी में तैरती है और कुएं के जल के स्नान से शरीर के विकार दूर होने के प्रमाण मिलते हैं.

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क्या कहते हैं जानकार
सागर पुरातत्व संग्रहालय के सुजीत पुरी गोस्वामी बताते हैं कि, ''ये तकनीक पूरी तरह से विज्ञान पर आधारित है और सोमनाथ मंदिर में भी इसका प्रयोग हुआ था. आधुनिक समय में ऐसी मूर्तियां तैयार करने के लिए चुंबकीय उत्तोलन विधि का उपयोग किया जाता है. आमतौर पर इस तकनीक से छोटी मूर्तियां बनायी जाती हैं. इस तरह की मूर्ति बनाने के लिए चुंबक और विद्युत चुंबक का उपोयग किया जाता है.
मूर्ति और उसके आधार में शक्तिशाली चुंंबक या विद्युत चुंबक का उपोयग किया जाता है. चुंबकों के बीच में प्रतिकर्षण बल के कारण मूर्ति आधार के ऊपर तैरती नजर आती है. वहीं मूर्ति को स्थिर दिखाने के लिए सेंसर जैसी तकनीक का प्रयोग भी किया जाता है. जिससे मूर्ति एक निश्चित ऊंचाई पर स्थिर रहती है. अगर कहा जाए, तो ये चमत्कार नहीं, बल्कि देखने वाले का भ्रम है और इंजीनियरिंग और विज्ञान का कमाल है.''

