केंद्र ने किया मनरेगा की शक्ति कम करने का काम, नए नियमों में काम मांगने का अधिकार खत्म : कांग्रेस
कांग्रेस ने एक बार फिर मनरेगा का नाम बदले जाने और नियमों में बदलाव करने के खिलाफ केंद्र सरकार को घेरा है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : January 10, 2026 at 6:00 PM IST
सरगुजा : मनरेगा का नाम बदले जाने के बाद कांग्रेस लगातार इसका विरोध कर रही है. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के दिग्गज नेता अलग-अलग जिलों में मनरेगा के नए नाम वीबी जीरामजी के नए कलेवर के बारे में जनता को समझा रही है. बीजेपी का मानना है कि मनरेगा में हुए बदलाव के दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे.ऐसे में कांग्रेस के दिग्गज नेता भी प्रेस वार्ता के जरिए मनरेगा के नाम बदले जाने का कारण और इससे होने वाले नुकसान के बारे में जनता के बीच अपनी बात रख रहे हैं.सरगुजा संभाग में पूर्व मंत्री प्रेमसाय सिंह ने मनरेगा का नाम बदले जाने को लेकर कांग्रेस की ओर से आवाज उठाई.
मनरेगा में 180 करोड़ से अधिक कार्य दिवस सृजित
प्रेमसाय सिंह ने बताया कि महात्मा गांधी के ग्राम स्वरोजगार के स्वप्न को पूर्ण करने की दृष्टि से कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का बिल साल 2005 में पारित किया था. ग्रामीण मजदूरों को रोजगार की संवैधानिक गारंटी दी गई थी. 2006 में इस योजना को लागू किए जाने के बाद से अब तक 180 करोड़ से अधिक कार्य दिवस सृजित किए गए हैं . ग्रामीण भारत में 10 करोड़ से ज्यादा परिसंपत्तियों का निर्माण किया जा चुका है, जिनमें सड़क, तालाब जैसी आधारभूत संरचनाएं शामिल हैं.
ग्रामीणों को 15 दिवस के अंदर कार्य मुहैया कराना था अनिवार्य
प्रेमसाय सिंह के मुताबिक वर्ष 2008-09 की वैश्विक आर्थिक मंदी हो या कोविड का दौर, इस योजना के माध्यम से ही देश की अर्थव्यवस्था सुचारु रुप से चलती रही. कैग की ऑडिट सहित विश्व भर में किए गए 200 अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि यह देश की एक सफल और प्रभावी योजना थी. इस योजना के इस कदर प्रभावी होने के पीछे जो प्रावधान महत्वपूर्ण है वो था काम की गारंटी का संवैधानिक अधिकार. इस अधिकार के माध्यम से ग्रामीण मजदूर कार्य की मांग करते और उन्हें 15 दिन के भीतर कार्य मुहैया कराना पड़ता था.ऐसा नहीं होने पर उन्हें बेरोजगारी भत्ता दिये जाने का प्रावधान इस कानून में था.
देश की बड़ी आबादी को मनरेगा ने गरीबी रेखा से बाहर निकाला
इस कार्य का शत-प्रतिशत बजट केन्द्र सरकार मुहैया कराती थी, जिसके कारण राज्य सरकारें आर्थिक बोझ की चिंता से मुक्त होकर इस योजना का प्रभावी क्रियान्वयन करती थीं. मनरेगा की योजना में कार्य की मांग के समय को लेकर कोई बंधन नहीं था. मजदूरी की दरों में वार्षिक वृद्धि होती थी. मजदूर पंचायत और ग्राम सभाओं के माध्यम से कार्य की मांग कर सकते थे. इन प्रावधानों ने मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया और देश की एक बड़ी आबादी को गरीबी रेखा से बाहर निकाला.
एनडीए सरकार ने इस योजना के मूलभूत प्रावधानों को बदल दिया. साथ ही देश की आजादी के नायक महात्मा गांधी के नाम से रखे गए इस योजना का नाम बदल कर उसे विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण कर दिया. नई योजना में पहला हमला काम पाने की संवैधानिक गारंटी पर किया गया. नई योजना काम मांगने के अधिकार को समाप्त करती है. नई योजना ग्राम पंचायतों के काम देने के अधिकार को भी समाप्त करती है और मोदी जी की केन्द्र सरकार को मनमाने ढंग से कार्यों के आबंटन के लिए अधिकार देती है- प्रेमसाय सिंह,पूर्व मंत्री
प्रेमसाय सिंह ने आरोप लगाए कि पहले देश की प्रत्येक ग्राम पंचायत को यह अधिकार था कि वो काम की मांग के आधार पर काम को स्वीकृति दे, लेकिन नए प्रावधान के माध्यम से अब मोदी सरकार तय करेगी कि कहां काम देना है और कहां नहीं. नये बदलाव में न्यूनतम मजदूरी की गारंटी समाप्त हो जाएगी और सरकार को मनमाने ढंग से मजदूरी तय करने का अधिकार होगा.
बजट आबंटन के प्रावधान में भी बदलाव
प्रेमसाय के मुताबिक मनरेगा के तहत गांवों में विकास कार्य और रोजगार नियोजित करने का अधिकार ग्राम पंचायतों को था, जो इस नई योजना में अब केन्द्र की सरकार तय करेगी कि क्या काम हो, कितना रोजगार हो. संभावना है कि ठेकेदारों के लिये प्रतिबंधित इस कार्य में अब ठेकेदारों को भी प्रवेश दिया जाएगा. सरकार ने जो महत्वपूर्ण बदलाव इस योजना में किया वो बजट के आबंटन का है. नई योजना के अनुसार अब व्यय को केन्द्र और राज्य सरकार 60-40 के अनुपात में वहन करेंगी. देश की अधिकांश राज्य सरकारों की आर्थिक हालत खस्ता है. ऐसे में मनरेगा के विशेष प्रावधान बाकी की योजनाओं की तरह ही काम करेंगी.
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