सुरक्षित बचपन की ओर कदम: स्कूली बच्चों को मिलेगी 'गुड टच-बैड टच' और मानसिक स्वास्थ्य की शिक्षा
सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को 'गुड टच और बैड टच' और 'वर्चुअल टच' के स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दी जाएगी.

Published : January 11, 2026 at 1:59 PM IST
जयपुर : सरकारी स्कूल परिसरों में छात्र-छात्राओं के साथ हो रहे यौन हिंसा की घटनाओं के बीच राजस्थान सरकार ने बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक अहम और सराहनीय पहल की है. राज्य सरकार और रिसोर्स इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन राइट्स (RIHR) के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता (एमओयू) हुआ है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को बाल अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य और यौन शोषण से बचाव से जुड़ी व्यवहारिक जानकारी दी जाएगी. इस समझौते के अंतर्गत स्कूलों में बच्चों को 'गुड टच और बैड टच' के साथ-साथ 'वर्चुअल टच' की भी जानकारी दी जाएगी. डिजिटल युग में बच्चों के मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया से जुड़े खतरों को देखते हुए यह पहल बेहद जरूरी मानी जा रही है. आज के समय में बच्चों को केवल शारीरिक नहीं, बल्कि ऑनलाइन माध्यमों से होने वाले शोषण और हिंसा के प्रति भी जागरूक करना आवश्यक है. पेश है एक रिपोर्ट
'निर्भय पथ-एक पहल' : RIHR की प्रोग्राम मैनेजर लता सिंह ने बताया कि सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों के मानसिक, सामाजिक एवं कानूनी सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए शिक्षा विभाग एवं RIHR (रिसोर्स इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन राइट्स) के मध्य 'निर्भय पथ-एक पहल' परियोजना के अंतर्गत समझौता ज्ञापन (MOU) किया है. यह परियोजना 5 वर्षों की अवधि के लिए लागू की गई है, जिसे चरणबद्ध रूप से पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर जयपुर जिले के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित 1084 सरकारी विद्यालयों में क्रियान्वित किया जाएगा.
शिक्षकों को भी प्रशिक्षण : उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के तहत बच्चों को यह समझाया जाएगा कि कौन-सा स्पर्श सुरक्षित है और कौन-सा असुरक्षित. साथ ही उन्हें यह भी सिखाया जाएगा कि किसी भी तरह की असहज स्थिति में वे किससे और कैसे मदद ले सकते हैं. इसके अलावा मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी बच्चों को जागरूक किया जाएगा, ताकि वे तनाव, डर या दबाव की स्थिति में अपनी भावनाओं को समझ सकें और खुलकर बात कर सकें. लता ने कहा कि केवल कानून और सजा के जरिए ही नहीं, बल्कि जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से ही बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोका जा सकता है. इस पहल के तहत शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वे बच्चों की समस्याओं को पहचान सकें और समय रहते उचित कदम उठा सकें.
तीन मॉड्यूल पर होगा काम :
- कक्षा 1 से 12 तक के विद्यार्थियों को बाल अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक परामर्श सेवाओं से जोड़ा जाएगा.
- RIHR की ओर से विशेषज्ञ टीम स्कूलों में जाकर कार्यशालाएं आयोजित करेगी.
- स्कूली छात्र-छात्राओं को पॉक्सो के कानून के बारे में जागरूक करेंगे.
- बच्चों को लीगल सपोर्ट के ग्रुप और एकल काउंसलिंग की जाएगी.
- ड्रॉपआउट बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जाएगा.
- इन कार्यशालाओं में बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों और शिक्षकों को भी जोड़ा जाएगा, जिससे एक सुरक्षित और सहयोगी वातावरण तैयार हो सके.
- सरकार का लक्ष्य है कि हर बच्चा अपने अधिकारों को जाने, अपनी सुरक्षा को लेकर सजग रहे और किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का साहस कर सके.
- यह पहल न केवल बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से सशक्त बनाकर एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी.
सामाजिक और डिजिटल खतरों सावधान : लता सिंह बताती हैं कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत कक्षा 1 से 12 तक के विद्यार्थियों को बाल अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक परामर्श सेवाओं से जोड़ा जाएगा. आज के समय में जब बच्चे कम उम्र में ही कई तरह के सामाजिक और डिजिटल खतरों का सामना कर रहे हैं, तब 'गुड टच और बैड टच' की सही समझ उन्हें आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना देती है. विद्यालयों में आयोजित संरचित सत्रों के माध्यम से बच्चों को यह सिखाया जाएगा कि वे अपने शरीर की सीमाओं को पहचानें.
बच्चे गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाएं और आवश्यकता पड़ने पर किससे मदद लेनी है. कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों को लेकर जागरूकता है. मोबाइल और इंटरनेट की आसान उपलब्धता ने बच्चों को नई दुनिया से जोड़ा है, लेकिन इसके साथ ही साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और मानसिक तनाव जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं. एक्सपर्ट की ओर से बच्चों को सुरक्षित ऑनलाइन व्यवहार, समय प्रबंधन और डिजिटल संतुलन के बारे में सरल भाषा में समझाया जाएगा.

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खुलकर चर्चा करना जरूरी : लता सिंह कहती हैं कि स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली छेड़छाड़, हिंसा या अन्य शोषण से जुड़ी घटनाओं पर खुलकर चर्चा करना भी इस पहल का उद्देश्य है. कई बार बच्चे डर, शर्म या भ्रम के कारण अपनी बात साझा नहीं कर पाते. इस कार्यक्रम के तहत परामर्श सेवाएं, भरोसेमंद संवाद और संदर्भ सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे बच्चे बिना भय के अपनी समस्याएं रख सकें. इस जागरूकता कार्यक्रम से विद्यार्थियों को कई स्तरों पर लाभ होगा. वे न केवल अपने अधिकारों को समझेंगे, बल्कि मानसिक रूप से अधिक मजबूत और संतुलित बनेंगे.
तीन चरणों में लागू होगा कार्यक्रम : तनाव प्रबंधन, भावनात्मक समझ और सहयोग लेने की क्षमता उनके व्यक्तित्व विकास में सहायक होगी. साथ ही, विद्यालय छोड़ चुके या विद्यालय से बाहर रह रहे बच्चों की पहचान कर उन्हें फिर से शिक्षा से जोड़ने के लिए समुदाय-आधारित प्रयास किए जाएंगे. वर्ष 2026 से 2031 तक तीन चरणों में लागू होने वाला यह कार्यक्रम पहले 192, फिर 238 और जयपुर जिले के सभी 1,084 सरकारी विद्यालयों तक पहुंचेगा. इसके बाद प्रदेश के अन्य शहरों में भी इसी तरह से कार्यक्रम आयोजित होंगे.
आंकड़ों ने किया चौंकाने वाला खुलासा : बच्चों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता विजय गोयल ने राजस्थान में स्कूली बच्चों के साथ हो रही यौन हिंसा की गंभीर स्थिति पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाओं ने प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को कलंकित किया है और स्कूल जैसे सुरक्षित माने जाने वाले परिसरों में बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. विजय गोयल के अनुसार पिछले पांच वर्षों में राजस्थान में 80 से अधिक सरकारी स्कूलों के बच्चों के साथ यौन हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं. इनमें कई मामले स्कूल परिसर के भीतर ही हुए, जो व्यवस्था की गंभीर विफलता को दर्शाते हैं.

उन्होंने कहा कि स्कूली बच्चों को कानून और अपने अधिकारों की पर्याप्त जानकारी नहीं है, जिसके कारण वे न केवल शोषण का शिकार होते हैं, बल्कि कई बार जानकारी के अभाव में स्वयं भी अपराध की राह पर चले जाते हैं. आंकड़ों का हवाला देते हुए गोयल ने बताया कि वर्ष 2019 से 2024 के बीच प्रदेश में करीब 2800 बच्चों के द्वारा दुष्कर्म के मामले दर्ज हुए हैं. वहीं, लगभग 1100 बच्चों के द्वारा अपहरण के मुकदमे भी सामने आए हैं. उन्होंने कहा कि स्कूलों में बाल अधिकार, यौन शोषण से बचाव और कानूनी जानकारी को जागरूक किया जाना, ताकि बच्चों को सुरक्षित और जागरूक माहौल मिल सके.

