दिल्ली की प्यास बुझाने को दी जमीन, अब हक के लिए संघर्ष को मजबूर हुए ये लोग
रेणुका जी बांध विस्थापितों ने मुआवजा और पुनर्वास नीति संशोधन की उठाई मांग.साथ ही वर्ष आरएंडआर नीति को संशोधित करने की मांग की.


By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 9, 2026 at 7:45 PM IST
सिरमौर: राष्ट्रीय हित में अपनी पुश्तैनी जमीन और घर देने वाले रेणुका जी बांध विस्थापित आज अपने हक के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं. रेणुका जी बांध विस्थापित संघर्ष समिति ने नाहन में आयोजित पत्रकारवार्ता के दौरान सरकार और बांध प्रबंधन के समक्ष विस्थापितों की लंबित व जायज मांगों को मजबूती से रखते हुए बांध निर्माण कार्य शुरू करने से पहले उन्हें प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की मांग की.
समिति के अध्यक्ष विजय ठाकुर, संयोजक विनोद ठाकुर की मौजूदगी में समिति के प्रेस सचिव योगी ठाकुर ने कहा कि जिन परिवारों ने राष्ट्रहित में सबसे बड़ा बलिदान दिया, वही आज मुआवजा और पुनर्वास के लिए दर-दर भटक रहे हैं. उन्होंने कहा कि हाउसलेस की मांग लंबे समय से प्रमुख मुद्दा रही है. कई सरकारों के बावजूद यह मांग पूरी नहीं हुई. हाल ही में 150 विस्थापित परिवारों की हाउसलेस मांग पूरी हुई है, लेकिन अन्य लंबित मांगें अब भी जस की तस हैं, जबकि बांध के लिए टनल निर्माण का कार्य किसी भी समय शुरू हो सकता है. उन्होंने चेताया कि एक बार कंपनी का काम शुरू होने के बाद विस्थापितों की समस्याएं फिर से नजरअंदाज की जाएंगी. समिति ने दो टूक कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन उसकी कीमत उन्हीं लोगों से नहीं वसूली जानी चाहिए, जिन्होंने देश के लिए अपनी जमीनें दी हैं.
दिल्ली को मिलेगा पानी, विस्थापित अब भी इंतजार में
समिति ने कहा कि रेणुका जी बांध परियोजना से देश की राजधानी दिल्ली को पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा. ऐसे में सरकार की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि जिन परिवारों की जमीनें अधिग्रहित की गईं, उनकी मांगों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए. यदि प्रभावित परिवार उस समय जमीन देने से इनकार कर देते, तो यह परियोजना आज अस्तित्व में ही नहीं होती.
घर के बदले घर, जमीन के बदले जमीन की मांग
समिति ने स्पष्ट किया कि उनकी मांगें असामान्य नहीं हैं, जिनका घर जा रहा है, उन्हें तय मुआवजा तुरंत दिया जाए और जिन परिवारों को 5 बीघा जमीन देने का प्रावधान है, वह उपलब्ध करवाई जाए. आरोप लगाया गया कि शुरुआत में मकान अधिग्रहण के दौरान कोई शर्त नहीं रखी गई, लेकिन अब मुआवजा देते समय अनावश्यक शर्तों में उलझाया जा रहा है.
जमीन का मुआवजा बाजार दर से बहुत कम
समिति के अनुसार पहले एक मकान का मुआवजा 7 लाख रुपए तय किया गया था, जिसे संघर्ष के बाद बढ़ाकर 27–28 लाख रुपए किया गया. वहीं जमीन के बदले मात्र डेढ़ लाख रुपए दिए जा रहे हैं, जो लगभग 6 बिस्वा जमीन के बराबर है. सवाल उठाया गया कि आज के समय में 6 बिस्वा जमीन डेढ़ लाख रुपए में कहां मिल सकती है? मांग की गई कि जमीन के मुआवजे की दरें बढ़ाई जाएं, ताकि विस्थापित कहीं और जमीन खरीद सकें.
पीडब्ल्यूडी शेड्यूल रेट और आरएंडआर नीति संशोधन की मांग
समिति ने कहा कि वो चंडीगढ़ में फ्लैट नहीं, बल्कि ददाहू क्षेत्र में पीडब्ल्यूडी के निर्धारित शेड्यूल रेट के अनुसार मुआवजा चाहते हैं, जो अब तक नहीं मिला है. साथ ही वर्ष 2008 की पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (आरएंडआर) नीति को वर्तमान बाजार दरों के अनुसार संशोधित करने की मांग की गई, क्योंकि मौजूदा ग्रांट नाकाफी है.
इस दौरान विस्थापितों ने एचपीपीसीएल में योग्यता के आधार पर रोजगार में प्राथमिकता, एनजीटी कमेटी की सिफारिशों को लागू करने, भूमि, मकान और पेड़-पौधों के मुआवजे की दरें सार्वजनिक करने और डूब क्षेत्र की दोबारा डिमार्केशन की मांग भी दोहराई. साथ ही 250 वर्ग मीटर प्लॉट की दर को वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार बढ़ाने की मांग रखी गई.

