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आरटीआई मामले में आईपीएस अधिकारी को राहत, 25 हजार जुर्माना रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेशों को बताया मनमाना और पक्षपातपूर्ण.

इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Photo credit: ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 27, 2026 at 10:41 PM IST

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प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सूचना के अधिकार मामले में एक आईपीएस अधिकारी पर लगाया गया 25,000 का अधिकतम जुर्माना रद्द कर दिया है. न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी ने केंद्रीय सूचना आयोग के 8 फरवरी 2007 और 19 मार्च 2007 के आदेशों को अवैध, मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताते हुए निरस्त कर दिया.

याची शैलेश कुमार यादव जो उस समय आईपीएस अधिकारी के रूप में गाजियाबाद में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी एवं लोक सूचना अधिकारी के पद पर प्रतिनियुक्त थे,के खिलाफ एक आरटीआई आवेदन में सूचना देने में देरी का आरोप लगाया गया था.

आवेदक ने 26 मार्च 2006 को पासपोर्ट से संबंधित जानकारी मांगी थी. बाद में सूचना देने में लगभग 145 दिन की देरी का आरोप लगाते हुए मामला केंद्रीय सूचना आयोग पहुंचा. तत्कालीन सूचना आयुक्त ने 19 मार्च 2007 को अधिकतम 25,000 का जुर्माना लगाया और विदेश मंत्रालय को विभागीय कार्रवाई की सिफारिश भी कर दी.

याची ने दलील दी कि सूचना अंततः उपलब्ध करा दी गई थी. देरी स्टाफ की भारी कमी और कार्यभार के कारण हुई. मुख्य पासपोर्ट अधिकारी की जांच रिपोर्ट में किसी भी अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया गया.

आयोग ने जांच रिपोर्ट का इंतजार किए बिना अधिकतम जुर्माना लगा दिया. आदेशों की भाषा से पूर्वाग्रह और पक्षपात झलकता है.कोर्ट ने कहा कि हर देरी पर स्वतः दंड नहीं लगाया जा सकता. दंड तभी लगाया जा सकता है जब बिना उचित कारण के देरी हो, या दुर्भावनापूर्ण आचरण सिद्ध हो, या लगातार लापरवाही साबित हो.

कोर्ट ने पाया कि जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया था कि देरी संस्थागत समस्याओं के कारण हुई, न कि किसी अधिकारी की जानबूझकर की गई गलती से. हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेशों की भाषा पर भी गंभीर टिप्पणी की. आदेश में अधिकारी के प्रति कठोर और अपमानजनक टिप्पणियां की गई थीं.

कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की भाषा से पूर्वाग्रह झलकता है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है. कोर्ट ने कहा कि अधिकतम जुर्माना लगाना और साथ ही विभागीय कार्रवाई की सिफारिश करना, वह भी जांच रिपोर्ट आने से पहले, जल्दबाजी और मनमानी दर्शाता है.

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