इस शिव मंदिर में रावण ने बनाई थी स्वर्ग जाने के लिए सीढ़ी! हर साल बढ़ती है शिवलिंग की ऊंचाई
देवभूमि हिमाचल में शिव के कई मंदिर हैं. इन मंदिरों का इतिहास कई सौ साल पुराना माना जाता है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 13, 2026 at 7:58 PM IST
सिरमौर: इस 15 फरवरी को शिवरात्रि का त्योहार मनाया जाएगा. हिमाचल में शिव के कई प्राचीन मंदिर हैं. देवी-देवताओं की धरती कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में कई शिव मंदिरों के साथ आस्था, इतिहास और लोककथाएं जुड़ी हुई हैं. यहां के प्राचीन शिव मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं और रहस्यों के जीवंत साक्षी भी हैं. इन्हीं में से एक जिला सिरमौर के मुख्यालय नाहन के समीप आमवाला-सैनवाला पंचायत का प्रसिद्ध और अत्यंत प्राचीन पौड़ीवाला शिव मंदिर, जिसका संबंध लंकापति रावण की अमरता की चाह से जोड़ा जाता है.
इस मंदिर का इतिहास हाइवे के किनारे स्थित इसके मुख्य द्वार पर भी अंकित है. इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग चमत्कारी माना जाता है. हर साल ये शिवलिंग अपनी ऊंचाई बढ़ाता है. लिहाजा शिवरात्रि के मौके पर ETV Bharat ने मंदिर पुजारी और स्थानीय लोगों से विशेष बातचीत की और इस शिव मंदिर का इतिहास जानने का प्रयास किया.
पंचायत के निवर्तमान प्रधान संदीपक तोमर बताते हैं कि मान्यता है कि शक्तिशाली होने के बावजूद लंकापति रावण अमर होना चाहता था. अमरता प्राप्त करने के लिए उसने भगवान शिव की घोर तपस्या की. ये वही समय था जब भगवान श्रीराम अयोध्या के राजा बनने वाले थे. रावण की कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने को कहा. रावण ने अमरता का वरदान मांगा. तब भगवान शिव ने अमर होने के लिए उसे एक ही दिन में पांच चमत्कारी सीढ़ियों (पौड़ियों) का निर्माण करने को कहा. अमरता की चाह में रावण ने कार्य प्रारंभ किया. पहली पौड़ी हरिद्वार में हर की पौड़ी पर, दूसरी पौड़ी नाहन के पौड़ीवाला में, तीसरी पौड़ी चूड़ेश्वर महादेव (चूड़धार) में और चौथी पौड़ी किन्नर कैलाश में बनाई. किंवदंती के अनुसार चौथी सीढ़ी के बाद रावण अत्यधिक थक गया और उसे नींद आ गई. जब वो जागा, तब तक अगली सुबह हो चुकी थी. समयसीमा समाप्त हो चुकी थी और इसी के साथ अमरता का उसका सपना अधूरा रह गया. लिहाजा पौड़ीवाला स्थित इस प्राचीन शिव मंदिर में आज भी उस दूसरी चमत्कारी पौड़ी के अस्तित्व में होने की बात कही जाती है. हलांकि ये पौड़ी दिखाई नहीं देती. पौड़ी के कारण ही इस मंदिर का नाम पौड़ीवाला है.

दूर-दूर से पहुंचते हैं श्रद्धालु
इस मंदिर को लेकर न केवल हिमाचल बल्कि हरियाणा समेत दूर-दूर तक श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है. इस स्थान पर पहुंचते ही मन को विशेष सुकून का अनुभव होता है. मंदिर में महाशिवरात्रि पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. मंदिर यहां आने वाले श्रद्धालुओं से क्षेत्र में साफ-सफाई बनाए रखने का आग्रह भी किया जाता है.

हरियाणा से पहुंचे श्रद्धालु बोले–मिला अद्भुत सुकून
इधर मंदिर में हरियाणा से आए श्रद्धालुओं मोहित चौहान, कमल का कहना है कि इस मंदिर के महत्व के बारे में इंटरनेट के माध्यम से जानकारी मिली, जिस मंदिर को स्वर्ग की दूसरी पौड़ी के रूप में जाना जाता है, उसे देखने और महादेव के दर्शनों की इच्छा यहां खींच लाई. घने जंगलों के बीच स्थित इस पवित्र स्थान पर पहुंचकर मन को अत्यंत शांति मिली और महादेव के दर्शन कर वे स्वयं को धन्य मानते हैं.

शिवलिंग का आकार बढ़ने का दावा
पौड़ीवाला मंदिर घने जंगलों में स्थित है. यहां प्राकृति का अदभूत नजारा देखने को मिलता है. यहां एक दम शांति और सुकून अनुभव होता है. शहर के शोर शराबे से ये मंदिर बहुत दूर है. वहीं, मंदिर में स्थापित शिवलिंग को चमत्कारिक माना जाता है. स्थानीय निवासी प्रीतम का कहना है कि 'इस प्राचीन मंदिर में स्थित शिवलिंग को लेकर भी विशेष मान्यता प्रचलित है. मान्यता है कि शिवरात्रि पर इसका आकार हर वर्ष एक चावल के दाने के बराबर बढ़ता है. यहां एक प्राचीन बावड़ी भी स्थित है. कहा जाता है कि पांडवों ने वनवास काल में यहां से गुजरते समय इसी बावड़ी के जल से महादेव का अभिषेक किया था. आज भी श्रद्धालु मंदिर में रखे लोटों से बावड़ी से जल लाकर महादेव का जलाभिषेक करते हैं. शिवरात्रि मेले के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु शीश नवाने पहुंचते हैं.'
'यहां साक्षात भगवान शिव शंकर विराजमान'
उधर एक अन्य स्थानीय निवासी जगदीप का कहना है कि यहां आने वाले लोगों का विश्वास है कि पौड़ीवाला के इस शिव मंदिर में साक्षात भगवान शिव शंकर विराजमान हैं और यहां आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु की मनोकामना पूर्ण होती है. यही कारण है कि महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां भव्य मेला आयोजित होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आस्था की डोर से खिंचे चले आते हैं.
श्रद्धालु कैसे पहुंचें इस पवित्र स्थान तक
यह मंदिर नेशनल हाइवे 07 चंडीगढ़-पांवटा साहिब-देहरादून मार्ग पर जिला सिरमौर मुख्यालय नाहन से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर आमवाला क्षेत्र में स्थित है. हाइवे से मंदिर की दूरी लगभग डेढ़ किलोमीटर है, जहां तक सड़क सुविधा उपलब्ध है. चंडीगढ़ से इसकी दूरी करीब 78 किलोमीटर, अंबाला से लगभग 58 किलोमीटर और यमुनानगर से करीब 55 किलोमीटर है. मुख्य हाइवे पर स्थित होने के कारण नियमित अंतराल पर बसों की आवाजाही भी रहती है. श्रद्धालु निजी वाहन से भी आसानी से यहां पहुंच सकते हैं.

प्रकृति की गोद में बसा आस्था का केंद्र
कुल मिलाकर स्वर्ग की दूसरी पौड़ी के रूप में प्रसिद्ध ये प्राचीन शिव धाम न केवल पौराणिक मान्यताओं और लोककथाओं के कारण विशेष महत्व रखता है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. सबसे खास बात यह है कि पूरा क्षेत्र सफेदा सहित अन्य कई प्रजातियों के पेड़ों से घने जंगलों से घिरा हुआ है, जहां पहुंचते ही प्राकृतिक शांति और आध्यात्मिक सुकून का अनूठा अनुभव होता है. आस्था, इतिहास और प्रकृति का ये अद्भुत संगम ही पौड़ीवाला शिव मंदिर को देवभूमि हिमाचल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशिष्ट पहचान दिलाता है.
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