विंडमिल ने रोकी दुर्लभ पक्षी खरमोर की उड़ान, 8 साल से सैलाना अभयारण्य कर रहा इंतजार
पवन चक्की प्रोजेक्ट ने रोकी खरमोर पक्षियों की राह, पिछले 8 साल से सैलाना नहीं पहुंचा एक भी खरमोर पक्षी. दिव्यराज सिंह की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : August 31, 2026 at 7:35 PM IST
|Updated : September 1, 2026 at 1:31 PM IST
रतलाम: रतलाम के सैलाना स्थित प्रसिद्ध खरमोर अभ्यारण में बीते 8 सालों से खरमोर पक्षी (Lesser Florican) प्रजनन के लिए नहीं आ रहे हैं. वन विभाग के तमाम प्रयासों के बाद भी इस वर्ष सैलाना और आंबा के अभयारण्य खरमोर विहीन हो गए हैं. केवल सैलाना ही नहीं बल्कि धार के सरदारपुर स्थित खरमोर अभ्यारण में भी इन पक्षियों ने आना बंद कर दिया है. दुर्लभ किस्म के पक्षियों के लिए काम करने वाले एक एनजीओ और वन विभाग के सर्वे में खरमोर पक्षियों के रूठ जाने का मुख्य कारण बड़ी संख्या में इस क्षेत्र में लगे पवन चक्की प्रोजेक्ट, मानवीय दखल, नीलगाय और गिट्टी की खदानें हैं. जिसके कारण अब खरमोर पक्षी इन अभयारण्य में प्रजनन के लिए नहीं पहुंचते हैं. खासकर पवन चक्की प्रोजेक्ट इन पक्षियों के माइग्रेशन की राह में बाधा बन रहे हैं.
खरमोर पक्षी के नहीं आने के कारण
दरअसल, रतलाम के सैलाना स्थित खरमोर अभ्यारण में विलुप्त प्रजाति के खरमोर पक्षी हर वर्ष प्रजनन के लिए आया करते थे, लेकिन वर्ष 2018 के बाद यहां इन बेहद शर्मीले पक्षियों ने आना बंद कर दिया है. वाइल्डलाइफ के लिए काम करने वाले एनजीओ और वन विभाग द्वारा इसके कारणों का पता करने के लिए सर्वे किया जा रहा है. मुंबई के बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने सैलाना स्थित अभयारण्य और धार के सरदारपुर के खरमोर पक्षी अभयारण्य का दौरा किया है.

वन विभाग के अधिकारी दिनेश कुमार जमरे ने बताया कि "खरमोर पक्षी हर वर्ष प्रजनन के लिए वर्षा काल में इन अभयारण्य में पहुंचते थे, लेकिन न पिछले 8 सालों से एक भी पक्षी यहां नहीं पहुंचा है. प्रारंभिक निरीक्षक और जांच में यह सामने आया है कि इस क्षेत्र में पहाड़ियों पर लगे हुए पवन चक्की प्रोजेक्ट की वजह से इन पक्षियों का माइग्रेशन रूट डिस्टर्ब हुआ है. वहीं, अभयारण्य के आसपास खेती और अन्य गतिविधियों की वजह से भी पक्षी नहीं आ रहे हैं. फेंसिंग नहीं होने की वजह से घास के मैदान में मवेशी और जंगली जानवर जैसे नीलगाय ऊंची घास को खा जाते हैं और नष्ट भी करते हैं जिसकी वजह से इस पक्षी के लिए अंडे देने और छुपने की जगह खत्म होती जा रही है. वहीं, अभयारण्य के आसपास के क्षेत्र में होने वाली माइनिंग और सड़क निर्माण की वजह से भी इन पक्षियों के प्राकृतिक आवास पर असर पड़ा है."
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खरमोर पक्षी के पुनर्वास के लिए वन विभाग द्वारा किए जा रहे प्रयास
क्षेत्रीय फॉरेस्ट अधिकारी दिनेश कुमार जमरे ने बताया कि "वन विभाग द्वारा डिटेल रिपोर्ट तैयार कर खरमोर पक्षी अभयारण्य क्षेत्र के आसपास के क्षेत्र को इको सेंसेटिव क्षेत्र बनाए जाने की डिमांड की जा रही है. वहीं, इसे विकसित करने के लिए वन विभाग द्वारा कार्य किया जा रहा है. मवेशी और जंगली जानवर जैसे नीलगाय, जंगली सूअर, सियार और कुत्ते अभ्यारण में नहीं घुस पाएं इसके लिए चेन जाली वाली फेंसिंग की जा रही है. करीब 1350 हेक्टेयर क्षेत्र की फेंसिंग का कार्य शुरू किया गया है जिसमें से 3200 मी फेंसिंग लगा दी गई है."
अरावली पर्वत श्रृंखला के घास के मैदान खरमोर पक्षी की पहली पसंद
भारत में खरमोर पक्षी के जितने भी अभयारण्य हैं वह अरावली पर्वत श्रृंखला के घास मैदानों में ही स्थित हैं. रतलाम जिले के सैलाना और धार जिले के सरदारपुर में लंबे समय से खरमोर पक्षियों ने आना बंद कर दिया है. लेकिन, राजस्थान के अजमेर के पास स्थित अभयारण्य में इस वर्ष भी खरमोर पक्षियों की आमद हुई है. वन विभाग की टीम अजमेर स्थित अभयारण्य और सैलाना स्थित अभ्यारण के वातावरण, भौगोलिक स्थिति की तुलना कर इस बात का पता लगाने का प्रयास कर रही है कि आखिर ऐसे क्या कारण है जिनकी वजह से खरमोर पक्षी अब मालवा से रूठ गया है.
बहरहाल, पिछले 8 सालों से सूने पड़े सैलाना के खरमोर पक्षी अभ्यारण को देखने आने वाले पर्यटक भी अब निराशा हैं कि उन्हें एक भी खरमोर पक्षी दिखाई नहीं देता हैं. हालांकि, वन विभाग अब भी करीब 1400 हेक्टेयर क्षेत्र के अभयारण्य को इन पक्षियों के पुनर्वास के लिए विकसित करने में जुटा हुआ है

