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बड़बोलिया को नहीं जला पाती होलिका दहन की आग, राख से निकाल घर ले आते हैं ग्रामीण

रतलाम में होली पर गोबर के नारियल और बड़बोलिया बनाने की परंपरा, होलिका दहन के बाद औषधि के रूप में होता है उपयोग.

RATLAM HOLIKA DAHAN
होली पर गोबर से तैयार होता है नारियल (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : March 2, 2026 at 4:17 PM IST

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Updated : March 2, 2026 at 5:19 PM IST

4 Min Read
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रिपोर्ट: दिव्यराज सिंह

रतलाम: होली का त्योहार पूरे देश में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है. इस त्यौहार और होलिका दहन को लेकर अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग परंपराएं होती हैं. मध्य प्रदेश के मालवा में होलिका दहन के लिए गोबर के बड़बोलिया (गुलरिया) और नारियल बनाने की परंपरा है. बड़बोलिया मतलब होलिका के गहने, जिन्हें दहन से पूर्व अविवाहित बालिकाओं द्वारा होलिका पर चढ़ाया जाता है. होली के त्यौहार के 1 सप्ताह पहले से ही ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाएं बड़बोलिया बनाने और गोबर के नारियल तैयार करने का कार्य करती हैं. यह परंपरा अब विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है, लेकिन रतलाम, मंदसौर और रतलाम जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में यह अब भी जिंदा है.

गोबर से तैयार होता है नारियल

होलिका दहन से जुड़ी इस परंपरा का पालन सैकड़ों वर्षों से जारी है. इसमें गाय के गोबर से अलग-अलग डिजाइन के गहने होलिका के लिए तैयार किए जाते हैं. जिन्हें बड़बोलिया या गुलरिया कहा जाता है. सेमलिया गांव में अपनी दादी के साथ होलिका के गहने तैयार कर रही खुशी परमार ने बताया कि उसे यह बनाना उसकी बुआ और दादी ने सिखाया है. जिसे वह होलीका पर चढ़ाएगी. खुशी परमार ने कहा, "2 दीपक के बीच 5 रुपए का सिक्का डालकर उसके ऊपर गोबर की परत चढ़कर नारियल बनाया है, जिसे होलिका दहन के समय भाई द्वारा चढ़ाया जाएगा. इसे लेकर मान्यता है कि नारियल के अंदर से निकलने वाले सिक्के को शुभ माना जाता है और भाई के स्वस्थ्य एवं दीर्घायु होने का आशीर्वाद मिलता है."

बड़बोलिया को नहीं जला पाती होलिका दहन की आग (ETV Bharat)

राख में से बड़बोलिया निकाल लाया जाता है घर

खुशी की दादी श्यामा बाई ने बताया कि "होलिका दहन में बड़बोलिया बनाने की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है. बुआ द्वारा भतीजे प्रहलाद को गोदी में लेकर आग में चले जाने और भक्त प्रहलाद के सुरक्षित बाहर आ जाने के प्रतीक के तौर पर गोबर के बने इन गहनों को चढ़ाने की परंपरा है. इतनी आग में जलने के बाद भी यह बड़बोलिया जलकर राख नहीं होते हैं. जिन्हें होलिका दहन हो जाने के बाद राख में से ढूंढ कर अपने घर लाया जाता है. जिसका उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है. खासकर चर्म रोग और पायरिया सहित दांत के दर्द में यह दवा के रूप में इस्तेमाल होता है. इससे घर में खटमल की समस्या भी नहीं होती है. चूल्हे में इसका धूप लगा देने से वर्ष भर घर के सदस्य बीमार नहीं होते हैं."

Ratlam gulariya tradition
होली पर गोबर के नारियल और बड़बोलिया बनाने की परंपरा (ETV Bharat)

गांव में आज भी जीवित है यह परंपरा

आधुनिक युग और लगातार गोवंश की घटती संख्या की वजह से शहरों से अब यह परंपरा गायब सी होने लगी है. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अविवाहित बालिकाएं इस परंपरा का निर्वहन कर रही हैं. नई पीढ़ी के बच्चों तक पुराने रीति रिवाज पहुंचे, इसलिए गांव में भी लोग इस परंपरा को आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं. इसके लिए मंदसौर के तीतरोड़ गांव में सभी छोटी बालिकाओं को आमंत्रित कर सामूहिक बड़बोलिया या गुलरिया बनाने का आयोजन किया गया है.

Ratlam badhboliya in Holika Dahan
होलिका दहन के बाद बड़बोलिया का औषधि के रूप में होता है उपयोग (ETV Bharat)

होलिका दहन की आग में सेकी जाती है गेहूं की फसल

सेमलिया गांव के राजेंद्र सिंह पवार ने बताया, "उनकी दोनों बेटियों ने भी पहली बार बड़बोलिया बनाए हैं, जिसे होलिका पर चढ़ाया जाएगा." सेमलिया गांव के जगदीश चौहान ने बताया, "होलिका दहन के मौके पर छोटे बच्चों को होलिका के ताप में तपाने की भी परंपरा है. मान्यता है कि इससे बच्चे वर्ष भर स्वस्थ रहते हैं. गेहूं की फसल को भी होलिका दहन की आग में सेका जाता है. मान्यता है कि इससे अच्छी फसल होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है और गेहूं के सेके हुए दानों में औषधीय गुण आ जाते हैं."

Last Updated : March 2, 2026 at 5:19 PM IST