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रसभरी की खेती बना रही किसानों को लखपति; मुम्बई और दिल्ली के साथ विदेश में भी डिमांड

आगरा कृषि विज्ञान केंद्र अध्यक्ष और वरिष्ठ वैज्ञानिक राजेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि कई जिलों में रसभरी (मकोयम) की खेती हो रही है.

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रसभरी की खेती से प्रति एकड़ सालाना 10 लाख तक की कमाई की जा सकती है. (Photo Credit: ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 27, 2026 at 4:20 PM IST

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रिपोर्ट: श्यामवीर सिंह

आगरा: यूपी में आलू की खेती मतलब आगरा. आगरा में अब किसान आलू की खेती के साथ ही नकदी खेती की ओर रुख कर रहे हैं. जो अच्छा मुनाफा दें और उन्हें कोल्ड स्टोरेज में रखने की जरूरत न हो. इसलिए आलू के गढ़ आगरा के खंदौली और एत्मादपुर ब्लॉक में किसान अब रसभरी की खेती कर रहे हैं. जिले में रसभरी की खेती का रकबा हर साल बढ़ रहा है.

किसानों की आय दोगुनी: आगरा की देशी और डिस्को रसभरी की डिमांड देश की राजधानी दिल्ली, चंडीगढ, मुम्बई, जयपुर, भोपाल और अन्य महानगर में है. स्वाद में खट्टी मीठी रसभरी लोगों की जुबान पर रस घोलने के साथ ही किसानों को लखपति बना रही है. इस बार 200 रुपये से अधिक का रेट मिलने से रसभरी की खेती करने वाले किसानों के चेहरे खिले हुए हैं. ये खेती किसानों की आय दोगुनी करने का जरिया बन रही है.

जानकारी देते वरिष्ठ वैज्ञानिक राजेंद्र सिंह चौहान. (Video Credit: ETV Bharat)

किसान मालामाल हो रहे: आलू के घाटे की मार से उबरने के लिए आंवलखेड़ा और बरहन के आसपास के गावों में किसानों ने करीब 35 साल पहले रसभरी की खेती शुरू की थी. इसकी खेती अब किसानों की अच्छी कमाई का जरिया बन गई है. रसभरी की खेती से किसान मालामाल हो रहे हैं. जिसकी वजह से इन गांवों में गेहूं, आलू, सरसों, जौ और बाजरा जैसी फसलों का रकबा कम हो रहा है. मगर, रसभरी की खेती का रकबा बढ रहा है.

मिट्टी के बैड बनाकर बीज की बुवाई: कुरगवां के किसान उदयवीर सिंह कुशवाहा ने बताया कि साल में एक ही बार रसभरी की खेती होती है. इसके बाद दूसरी फसल नहीं होती है. रसभरी की खेती को लेकर माह से ही खेत तैयारी करते हैं. जब बारिश कम होती है. वैसे ही खेत की जुताई के बाद मिटटी के बैड बनाकर बीज की बुवाई करते हैं. इसके बाद लगभग जनवरी माह से ही फल आने लगते हैं. मार्च माह तक फल आते हैं.

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रसभरी की मांग दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ-साथ विदेशों में भी है. (Photo Credit: ETV Bharat)

100 से 125 रुपये प्रति किलोग्राम बिक्री: इसके बाद फसल खत्म हो जाती है. किसान उदयवीर सिंह ने मैं आलू की भी खेती करता हूं. आलू की खेती में प्रति हेक्टेयर खर्च ढाई लाख रुपये आता है. आलू की तरह रिस्क भी अधिक हैं. जबकि, रसभरी की खेती में रिस्क कम इसमें प्रति हेक्टेयर करीब 40 से 50 हजार रुपये की लागत रहती है. जबकि, एक एकड में 1500 किलोग्राम तक रसभरी मिल जाती है. इस बार जनवरी माह में 220 रुपये किलोग्राम का भाव मिला. अब भी 100 से 125 रुपये प्रति किलोग्राम का भाव मिल रहा है.

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इसकी मांग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों में अधिक है. (Photo Credit: ETV Bharat)

200 रुपये अधिक का मिला रेट: आंवलखेड़ा के किसान राजेश सिंह ने बताया कि इस साल रसभरी का बहुत अच्छा रेट मिला है. भले ही जनवरी में फल कम मिला. मगर, बाज़ार में रसभरी की कीमत ज्यादा मिली. इस साल 200 से 225 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत मिली है. अभी की बात करें तो 100 रुपये प्रति किलोग्राम का रेट मिल रहा है. जिसके चलते ही आंवलखेड़ा, बरहन, कुरगवां, चावली और आसपास के गांवों में लगातार रसभरी की खेती का रकबा बढ़ रहा है.

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रसभरी में विटामिन सी, एंटीऑक्सीडेंट और फाइबर प्रचुर मात्रा में होते हैं. (Photo Credit: ETV Bharat)

आगरा की रसभरी की इन जिलों में डिमांड: आगरा की रसभरी की डिमांड दिल्ली, चंडीगढ, लखनऊ, जयपुर, ग्वालियर, भोपाल समेत शहरों में है. जिसके चलते ही जनवरी माह में ही दिल्ली और अन्य महानगर से व्यापारी खुद आंवलखेड़ा और आसपास के गांव में आकर रसभरी की खेती देखकर खेत में ही खड़ी फसल का सौदा कर लेते हैं. जिससे ही किसानों को सही मुनाफा हो रहा है. इससे उनका बाजार जाने का खर्च भी बच जाता है और खेत पर ही रसभरी का अच्छा रेट मिल जाता है.

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इसकी खेती के लिए बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती. (Photo Credit: ETV Bharat)

टमाटर की खेती से रसभरी की खेती: किसानों का कहना है कि पहले आंवलखेडा, बरहन और आसपास के क्षेत्र में टमाटर की खेती खूब होती थी. किसान अपना आलू बेचने बरेली, दिल्ली और अन्य शहरों में जाते थे. आज से करीब 35 साल पहले की बात है. जब टमाटर की फसल बरेली की मंडी लेकर गए तो वहां पर रसभरी की खेती करने वाले बदायूं के किसानों से बात हुई. बदायूं के किसानों ने बताया कि कम लागत में अच्छा मुनाफा मिलता है. इस पर बदायूं के किसानों से रसभरी का बीज लेकर आए. पौध तैयार की और उसे खेतों में रोपा. इसके बाद से आंवलखेडा और आसपास के क्षेत्र में रसभरी की खेती की शुरुआत हुई.

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आलू जैसी फसलों की तुलना में इसमें खाद और अन्य इनपुट की लागत काफी कम होती है. (Photo Credit: ETV Bharat)

लागत कम और मुनाफा अधिक: गांव कुरगवां के किसान रामजीलाल ने बताया कि रसभरी की खेती में लागत कम और मुनाफा अधिक है. पहले आलू की खेती की. जिसमें घाटा हुआ. जिस पर गेंहू और सरसों की खेती करने लगे. मगर, जब रसभरी की खेती की तो इसमें गेंहू और सरसों से अधिक मुनाफा हुआ. जिस पर ही अब मैं रसभरी की खेती करीब 10 साल से कर रहा हूं. अपने खेत के साथ ही पटटे पर खेत लेकर रसभरी की खेती करता हूं.

पैदावार और रकबा लगातार बढ़ रहा: हम इसकी पौध नहीं तैयार करते हैं. सीधे ही खेत में बाते हैं. जिससे हमें 15 दिन पहले ही फल मिलने लगते हैं. एक हेक्टेयर जमीन के लिए 250 से 300 ग्राम बीज जरूरत होती है. इस खेती में बारिश के बाद पांच से छह सिंचाई की जरूरत होती है. बारिश में मिटटी के बैड बनाकर बीज बोते हैं. निराई करके खरपतवार हटाते हैं. इसके कीटनाशक और खाद कोई खर्च नहीं होता है. जिसकी वजह से ही क्षेत्र में रसभरी की पैदावार और रकबा लगातार बढ़ रही है. हम खुद ही बीज तैयार करते हैं.

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एक बार पौधा लगाने के बाद, यह 10 से 15 वर्षों तक लगातार फल देता रहता है. (Photo Credit: ETV Bharat)

उन्नत किस्मों से पैदावार अधिक मिलेगी: आगरा के बिचपुरी स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि आगरा में रसभरी की खेती करने वाले किसान केवीके से जुडे हैं. जिनसे बात करने पर उन्हें रसभरी की उन्नत किस्मों के बारे में जानकारी देते हैं. जिससे किसान रसभरी की इन उन्नत किस्मों को लगाएं. जिससे अच्छी पैदावार मिलेगी.

नादर नाम की रसभरी की प्रजाति: भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (आईआईएचआर ने रसभरी की तीन किस्में विकसित की हैं. जिनमें एक बैंब्लोरा प्रजाति, दूसरी जबलपुर आबलोंग प्रजाति और तीसरी अर्काचंद्रा है. जिसका क्लोन 18-5 है. इसके साथ ही एक नादर नाम की रसभरी की प्रजाति है. इसके साथ ही भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्रीय समशीतोष्ण बागवानी संस्थान (ICAR-CITH) श्रीनगर और जम्मू-कश्मीर ने भी रसभरी की प्रजाति सीआईटीएचसीजीबीसेल को विकसित किया है.

इन प्रदेश और देशों में रसभरी की खेती: आगरा के बिचपुरी स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि यूपी में आगरा के साथ ही अन्य जिलों में भी रसभरी रसभरी (मकोयम) की खेती हो रही है. राजस्थान में जयपुर, अजमेर के साथ ही बिहार, छत्तीसगढ के कई जिलों में रसभरी की खेती होती है. इसके साथ ही उत्तरी अमेरिका, रशिया, पोलैंड, यूके, सर्बिया, यूक्रेन, जर्मनी और उत्तर एशिया के कई देशों में रसभरी की खेती होती है.

रसभरी की खेती पर एक नजर:

  • रसभरी की खेती नकदी फसल है.
  • जुलाई और अगस्त में रसभरी के बीज की बुवाई या पौधारोपण.
  • मिट्टी के बेड बनाकर बीज की बुवाई या पौधारोपण किया जाता है.
  • 20-25 डिग्री का तापमान रसभरी की खेती के लिए अच्छा.
  • बलुई मिट्टी, दोमट मिट्टी और चिकनी मिट्टी में अच्छी पैदावार.

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