ETV Bharat / state

किन्नौर के छितकुल मे दिखा दुर्लभ घोस्ट ऑर्किड, पांच दशक बाद आया नजर

रक्छम-छितकुल वन्यजीव अभयारण्य में लगभग 60 साल बाद रहस्यमयी 'घोस्ट ऑर्किड' फिर दर्ज किया गया है. ये वनस्पति जगत के लिए अच्छी खबर है.

घोस्ट ऑर्किड
घोस्ट ऑर्किड (PIC CREDIT: संतोष कुमार ठाकुर वन खंड अधिकारी)
author img

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : August 21, 2026 at 11:15 AM IST

2 Min Read
Choose ETV Bharat

किन्नौर: जिले के रक्छम-छितकुल वन्यजीव अभयारण्य में करीब पांच से छह दशक बाद दुर्लभ और रहस्यमयी घोस्ट ऑर्किड (एपिपोगियम एफिलम) का दोबारा रिकॉर्ड दर्ज किया गया है. वन खंड अधिकारी संतोष कुमार ठाकुर और वन मित्र अल्पना नेगी समेत वन्यजीव टीम के रूप सिंह और गोपाल नेगी ने रक्छम क्षेत्र में इसे अपने कैमरे में कैद किया है.

लिहाजा हिमाचल की वनस्पति संपदा के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है. वहीं पश्चिमी हिमालय की दुर्लभ वनस्पतियों के संरक्षण और अध्ययन के लिए भी नई उम्मीद लेकर आई है. बहरहाल प्रदेश की जैव विविधता के लिए इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. वन विभाग की टीम ने प्राकृतिक आवास में इन पौधों की फोटोग्राफी करने के साथ-साथ वैज्ञानिक अध्ययन के लिए आवश्यक फील्ड डाटा भी एकत्र किया. सर्वेक्षण के दौरान इस प्रजाति के केवल चार पौधे ही मिले, जिससे इसकी अत्यधिक दुर्लभता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

पांच दशक बाद नजर आया घोष्ट ऑर्किड
पांच दशक बाद नजर आया घोष्ट ऑर्किड (PIC CREDIT: संतोष कुमार ठाकुर वन खंड अधिकारी)

वनस्पति विज्ञान के लिए बड़ी उपलब्धि

सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य अरण्यपाल एवं विश्व प्रसिद्ध टैक्सोनोमिस्ट डा. गुरिंदरजीत सिंह गोराया ने कहा कि 'घोस्ट ऑर्किड हिमाचल प्रदेश के सबसे दुर्लभ ऑर्किड में से एक है. लगभग 60 से 70 वर्ष पुराने रिकॉर्ड के बाद इस तरह का प्रमाणित दस्तावेज मिलना वनस्पति विज्ञान के लिए बड़ी उपलब्धि है.'

1921 में मिला पथा पहला साक्ष्य
1921 में मिला पथा पहला साक्ष्य (PIC CREDIT: संतोष कुमार ठाकुर वन खंड अधिकारी)

1921 में मिला था पहला प्रमाण

वन खंड अधिकारी संतोष कुमार ठाकुर ने बताया कि घोस्ट ऑर्किड का पहला उल्लेख वर्ष 1921 में प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक हेनरी कोलेट ने शिमला जिले के फागू क्षेत्र से किया था. इसके बाद वर्ष 1959 में डा. राव ने इसका संग्रह किया था. बाद के वर्षों में इसके कुछ बिखरे हुए रिकॉर्ड सामने आए, लेकिन प्रमाणित समकालीन दस्तावेज बहुत कम रहे. ऐसे में रक्छम-छितकुल वन्यजीव अभयारण्य से मिला यह नया रिकॉर्ड वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है.

एपिपोगियम जीनस की दुनिया में लगभग आठ प्रजातियां हैं, जिनमें से तीन भारत में दर्ज की गई हैं.
एपिपोगियम जीनस की दुनिया में लगभग आठ प्रजातियां हैं, जिनमें से तीन भारत में दर्ज की गई हैं. (PIC CREDIT: संतोष कुमार ठाकुर वन खंड अधिकारी)

वनस्पति विज्ञान के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. भगवती प्रसाद शर्मा ने बताया कि 'एपिपोगियम एफिलम जीन्स की दुनिया में लगभग आठ प्रजातियां हैं, जिनमें से तीन भारत में दर्ज की गई हैं. अनुकूल मौसम आने पर इसका पुष्पीय तना अचानक जमीन से बाहर निकलता है, कुछ दिनों तक फूल खिलते हैं और लगभग 10 से 12 दिन बाद यह फिर गायब हो जाता है.'

ये भी पढ़ें: बेहतर उत्पादन के लिए किसान जान लें ये बातें, फसलों-सब्जियों के संरक्षण के लिए कृषि विभाग की एडवाइजरी