इबादत का मौसम रमजान, क्यों फर्ज है रोजा, क्या है सहरी और इफ्तार की अहमियत
19 फरवरी से शुरु हुआ रमजान का पाक महीना, रोजे रखकर अल्लाह की इबादत कर रहे लोग, जानिए रोजा और खास नमाज तरावीह की अहमियत.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 19, 2026 at 3:16 PM IST
|Updated : February 19, 2026 at 3:51 PM IST
RAMZAN 2026: देश भर में 19 फरवरी से रमजान का आगाज हो गया है. 18 फरवरी की शाम को चांद दिखने के साथ ही मस्जिदों में तरावीह का दौर शुरु हो गया. हर तरफ इबादत का माहौल है. इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग 30 दिनों तक रोजा रखेंगे और ईद का चांद नजर आने तक ये सिलसिला जारी रहेगा. रमजान के एक हफ्ते पहले से ही बाजारों में काफी रौनक देखने को मिल रही है. रमजान की शुरुआत कब से हुई, रोजा रखने की क्या अहमियत है. आईए जानते हैं सब कुछ.
इस्लाम धर्म के पांच फर्ज
इस्लाम धर्म के मानने वालों के लिए 5 बुनियादी स्तंभ (अरकान-ए-इस्लाम) हैं, जो उनकी जिंदगी का आधार माने जाते हैं. शहादा (आस्था की गवाही), नमाज, जकात, रोजा और हज को इस्लाम में फर्ज बताया गया है. इन पर अमल करते हुए इंसान अपनी जिंदगी नेक और अल्लाह के बताए रास्ते पर गुजाने की कोशिश करता है. मुस्लमानों पर पांच वक्त की नमाज फर्ज है. जकात भी मुसलमानों पर फर्ज है. हर बंदा अपनी कमाई का 25 प्रतिशत हिस्सा जरूरतमंदों और गरीबों को दान करता है. रोजा इस्लाम का चौथा स्तंभ है. जिसमें मुसलमान एक महीने रोजे रखते हैं.

कब हुई रमजान की शुरुआत
इस्लाम में रमजान बहुत पाक महीना माना जाता है. इसे इबादत का महीना भी कहा जाता है. आखिर रमजान की शुरुआत कब हुई, इसे जानने के लिए हमें 610 ईस्वी में जाना होगा. इसी साल पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मक्का के पास मौजूद गुफ़ा-ए-हिरा में इबादत किया करते थे. इसी दौरान फरिश्ते जिब्रील (अलैहिस्सलाम) उनके सामने प्रकट हुए और उन्होंने कुरआन के पहले शब्द बताए की अल्लाह एक है. यही से इस्लाम की शुरुआत हुई. यह वाकया रमजान के महीने में हुआ था. इसके बाद से ही रमजान के महीने में रोजे को भी फर्ज कर दिया गया.
रमजान में नाजिल हुआ था कुरआन
इसी महीने में पवित्र कुरआन उतारा गया, जो कि दुनिया के तमाम इंसानों के लिए जिंदगी गुजारने का एक बेहतरीन नमूना है. इसमें पाक किताब में बताया गया है कि, एक इंसान को अपनी जिंदगी किस तरह से गुजारनी चाहिए. इसलिए इस माह में कुरआन की भी ज्यादा से ज्यादा तिलावत (पढ़ाई) की जाती है और तरावीह की नमाज में भी कुरआन सुना जाता है. वैसे तो साल भर कुरआन पढ़ने का सवाब मिलता है, लेकिन रमजान के महीने में ज्यादा सवाब मिलता है. वही वजह है की रमजान में ज्यादातर मुस्लिम कुरआन को पढ़ते हैं.

रोजा रखने के फायदे
रमजान में मुसलमान 30 दिन तक रोजे रखते हैं. सुबह से शाम तक लोग भूखे रहकर अल्लाह की इबादत करते हैं. फिर शाम को टाइम के मुताबिक रोजा इफ्तार किया जाता है. रोजा रखने के कई फायदे भी हैं. रोजा रखकर भूखे और प्यासे रहने से इंसान के जिस्म को भी फायदा पहुंचता है. उसके शरीर के सभी अंग रिफ्रेश हो जाते हैं, जिससे बंदे को एक अलग ही ताजगी महसूस होने लगती है. इफ्तार के लिए मुसलमान खजूर से शुरुआत करते हैं.
खजूर से रोजा इफ्तार करना सुन्नत
खजूर से रोजा इफ्तार करना सुन्नत माना जाता है. पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) भी खजूर से ही रोजा खोलते थे. खजूर से रोजा इफ्तार करने के कई फायदे हैं. दिनभर भूखे-प्यासे रहने के बाद खजूर शरीर की कमजोरी दूर करती है और ताकत देती है. इससे बॉडी में एनर्जी बनी रहती है और रोजा रखने वाला व्यक्ति तंदुरुस्त महसूस करता है. इसलिए चाहिए कि इफ्तार की शुरुआत खजूर से करें. ताकि सुन्नत पर अमल भी हो और सेहत के फायदे भी हासिल हों.

बंदे इस महीने ज्यादा से ज्यादा इबादत करें
भोपाल के नायब शहर काजी अली कादर हुसैनी ने बताया कि, ''रमजान का पाक महीना इस्लाम में सबसे ज्यादा बरकत और इबादत वाला माना जाता है. यह सिर्फ भूख-प्यास सहने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने मन और अपनी इच्छाओं पर काबू पाने का एक जरिया है. इस महीने में बंदों को ज्यादा से ज्यादा अल्लाह की इबादत करना चाहिए.''
क्या होती है सेहरी
रोजा रखने की शुरुआत सुबह सूरज निकलने से पहले होती है. उस समय बंदे खाना खाते हैं, जिसे 'सेहरी' कहते हैं. सेहरी में ऐसा खाना खाना चाहिए जो दिन भर आपको ऊर्जा दे सके. रोजा रखने से पहले 'नियत' करना सबसे जरूरी है. नियत का मतलब है दिल में यह पक्का इरादा करना कि आप सिर्फ ईश्वर की रजा के लिए रोजा रख रहे हैं.

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कुरान पढ़ें, गरीबों को जकात दें
इस महीने में कुरान पढ़ना और उसके अर्थ को समझना बहुत पुण्य का काम माना जाता है. रोजे के साथ नमाज पढ़ना जरूरी है. यह आपको अनुशासन और मानसिक शांति देता है. रमजान हमें दूसरों का दर्द समझना सिखाता है, इसलिए, गरीबों की मदद करना और उन्हें खाना खिलाना इस महीने का अहम हिस्सा है. रोजे का असली मकसद गुस्से पर काबू पाना और हर हाल में शुक्रगुजार रहना है.
रोजे के दौरान कैसी होना चाहिए डाइट
रोजा रखने वालों को इस पूरे महीने में खान-पान पर खास ध्यान देने की जरूरत होती है. रोजे के वक्त डॉक्टर डाइट पर भी विशेष ध्यान देने की सलाह देते हैं. फिजिशियन डॉ. एम सी अग्रवाल ने बताया कि, ''रोजे के दौरान तली-भुनी चीजों को खाने से बचना चाहिए, नहीं तो आप बीमार भी पड़ सकते हैं. सेहरी के वक्त हल्की और हेल्दी चीजें खानी चाहिए. इसमें अंडा, आटे की रोटी या परांठा, ताजे फल, जूस आदि लेना फायदेमंद है. इफ्तार के वक्त खाते समय कम से कम पानी पीना चाहिए. खजूर खाना बढ़िया होता है. यह सेहत के लिए फायदेमंद है. खजूर में आयरन होता है, जिससे शरीर को ऊर्जा मिलती है. कोशिश करना चाहिए कि सेहरी में कॉफी, कोल्डड्रिंक्स या सोडा वाली चीजें न खाएं-पीएं.

बाजारों में रोनक, इत्र की बढ़ी डिमांड
रमजान का चांद दिखने के बाद से ही बाजारों में रोनक देखने को मिल रही है. लोग दुकानों पर फल-फ्रूट्स खरीदते नजर आ रहे हैं. वहीं इत्र की दुकानों पर भी चहल-पहल नजर आ रही है. क्योंकि मुसलमानों को इत्र को लेकर बहुत क्रेज रहता है. जब बात रमजान की हो तो इत्र खरीदने से कोई पीछे नहीं रहता. नमाज और तरावीह के लिए लोग तरह-तरह की खुशबुएं खरीदते हैं. इसके साथ ही कपड़ों की भी दुकानें सज गई हैं.

