ETV Bharat / state

फर्रुखाबाद का मेला रामनगरिया, गंगा की गोद में 1 महीने तक कल्पवासियों का डेरा, जानिए महत्व-दिनचर्या

माघ मेले में हर साल बड़ी संख्या में उमड़ते हैं भक्त, प्रयागराज के बाद यूपी का मिनी माघ मेला कहा जाता.

फर्रुखाबाद माघ मेला 2026
फर्रुखाबाद माघ मेला 2026 (Photo Credit; ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : January 9, 2026 at 9:16 AM IST

|

Updated : January 9, 2026 at 9:48 AM IST

8 Min Read
Choose ETV Bharat

फर्रुखाबाद (आलोक दुबे): 3 जनवरी से प्रयागराज में माघ मेले की शुरुआत हो गई है. संगम के तट पर कल्पवास के लिए भी लाखों संत-गृहस्थ जुटे हैं, लेकिन फर्रुखाबाद में मां गंगा किनारे रामनगरिया मेला हर साल लगता है, जो अपनी धार्मिक मान्यताओं और कल्पवास के लिए प्रसिद्ध है. पूरे एक माह तक श्रद्धालु जप-तप के साथ ध्यान लगाएंगे. आइए जानते है फर्रुखाबाद के इस माघ मेले में कल्पवास की धार्मिक मान्यता, दिनचर्या और अन्य खास बातों के बारे में.


1965 में मिली कल्पवास को मंजूरी: बता दें कि पतित पावनी के पांचाल घाट स्थित तट पर माघ माह में हर साल तंबुओं का शहर और मेला श्री रामनगरिया बसता है. इसमें हजारों की संख्या में साधु-संत व कल्पवासी 1 महीने तक गंगा की गोद में रहकर भजन-पूजन करते हैं. यहां कल्पवास का सिलसिला कब शुरू हुआ है. इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं है. बताते हैं कि पहले यहां केवल साधु-संत चातुर्मास कल्पवास करते थे. 1965 में यहां गृहस्थों को भी कल्पवास की अनुमति मिली. अब ये मेला मिनी माघ मेला का स्वरूप ले चुका है. वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद भी पांचाल घाट पर प्रवास कर चुके हैं. जानकारी के मुताबिक ये बात उन्होंने एकांतिक वार्ता के दौरान श्रद्धालुओं को बताई थी.

फर्रुखाबाद माघ मेला 2026 (Video Credit; ETV Bharat)


कब दी गई मेले की अनुमति? पांचाल घाट पर गंगा किनारे साधु संतों के कल्पवास का इतिहास लगभग 350 साल से अधिक पुराना बताया जाता है. पहले पांचाल घाट पर साधु संत चातुर्मास साधना व कल्पवास करने आते थे. तब गंगा किनारे घना जंगल था. इसे घटिया घाट के नाम से जाना जाता था. दिन में तो संतों के नजदीकी शिष्यों को भोजन व पूजा सामग्री पहुंचाने की अनुमति रहती थी लकिन शाम होते ही उन्हें भी वहां वापस जाना होता था. कल्पवास की अनुमति चातुर्मास 1965 में पहली बार स्वामी श्रद्धानंद ने गृहस्थों को दी. इसके बाद 1985 में तत्कालीन विधायक महरम सिंह की पहल पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण तिवारी ने श्री राम नगरिया मेला की अनुमति दी.

कल्पवास के लाभ
कल्पवास के लाभ (Photo Credit; ETV Bharat)


शास्त्रों के अनुसार, कल्पवास को 12 वर्षों तक लगातार करने पर अत्यधिक पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसके बाद उद्यापन समापन किया जाता है. इसकी अवधि एक रात से लेकर 12 वर्ष तक हो सकती है. प्रमुख रूप से इसे एक महीने के लिए किया जाता है.

नियम
नियम (Photo Credit; ETV Bharat)
क्या है कल्पवास, क्यों महत्वपूर्ण है साधना: हिंदू धर्म में कल्पवास तप, संयम और साधना से जुड़ी परंपरा है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माघ महीने में गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर एक माह तक कथा, ध्यान, दान और व्रत के साथ रहना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है.
माघ मेला की तिथि
माघ मेला की तिथि (Photo Credit; ETV Bharat)

पुराणों में इसका वर्णन ‘जीवन के पुनरुद्धार’ के रूप में मिलता है. शास्त्रों में कहा गया है कि कल्पवास का एक माह पूरे जीवन की नकारात्मकता को दूर कर मन को स्थिर करता है. हिंदू धर्म में मान्यता है कि एक कल्प होता है चार अरब 32 करोड़ वर्ष का. पुराणों में वर्णित है कि
जो एक महीना छल-कपट को त्याग दे, निश्चल मन से यहां पर वास करे. एक माह लगातार स्नान करे, जप, तप और साधना करे, उसको 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का पुण्य मिल जाएगा. शास्त्रों के अनुसार 12 वर्षों तक लगातार कल्पवास करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है.

सावधानियां
सावधानियां (Photo Credit; ETV Bharat)


कल्पवासियों की दिनचर्या: गंगा की रेत में कल्पवासी तंबुओं में सादा और अनुशासित जीवन जीते हैं. उनका दिन ब्रह्ममुहूर्त में गंगा स्नान से शुरू होता है. इसके बाद हवन, जप, पाठ, सत्संग, कथा-श्रवण और दान जैसे अनुष्ठान होते हैं. भोजन सादा और सात्त्विक होता है. कई कल्पवासी वर्षों से लगातार यहां आ रहे हैं. इनमें बुजुर्ग, महिलाएं और NRI श्रद्धालु भी शामिल हैं, जो इसे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पड़ाव मानते हैं. माघ मेले में भारत सहित कई देशों के साधु–संन्यासी भी कल्पवास के लिए आते हैं.

आग तापते हुए कल्पवासी
आग तापते हुए कल्पवासी (Photo Credit; ETV Bharat)
माघ मेला फर्रुखाबाद
माघ मेला फर्रुखाबाद (Photo Credit; ETV Bharat)



कल्पवास की प्रक्रिया: कल्पवास करने वालों को 21 नियमों का पालन करना होता है. कल्पवास के पहले दिन तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजन किया जाता है. कल्पवास करने वाला अपने रहने के स्थान के पास जौ के बीज रोपता है. जब ये अवधि पूरी हो जाती है तो वे इस पौधे को अपने साथ ले जाते हैं, जबकि तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर देते हैं.



कब से कब तक कल्पवास: हर साल माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर जाते हैं तब कल्पवास की शुरुआत होती है. पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होकर माघ मास के शुक्ल पक्ष् की एकादशी तक कल्पवास करना चाहिए. कल्पवास के लिए सूर्य का मकर राशि में होना जरूरी होता है. कल्पवास स्वेच्छापूर्वक संकल्पित कठोर तपस्या है. दिन में एक बार स्वयं पकाया हुआ भोजन या फलाहार किया जाता है.

कल्पवासी
कल्पवासी (Photo Credit; ETV Bharat)


कल्पवास से खुलता है मुक्ति का मार्ग : कल्पवास से तन, मन और बुद्धि तीनों का शोधन होता है. इससे मनोकामनाओं की पूर्ति होती है. कुछ लोग मुक्ति के लिए कल्पवास करते हैं. कल्पवास में जो श्रद्धालु जिस भाव से आता है, नियम-संयम और धर्म से रहता है तो उसकी पूर्ति होती है. इसीलिए इसका बहुत ही आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व.



त्याग और साधना: कल्पवास के दौरान श्रद्धालु एक महीने तक संयमित जीवन जीते हैं. उनका पूरा समय व्रत, पूजा और कठिन साधना में व्यतीत रहता है.


धार्मिक गतिविधियां: कल्पवास में भक्ति स्नान, ध्यान, हनुमान चालीसा का पाठ रामायण पाठ, सत्संग करते हैं. रोजमर्रा की दुनिया से दूरी उन्हें आध्यात्मिक ऊर्जा और मानसिक शांति देती है. यह प्रक्रिया आत्मा के विकास और कर्मों का फल पाने में मदद करती है.



माघ मास का महत्व: हिंदू धर्म में माघ स्नान अत्यंत पुण्यदायी माना गया है. फर्रुखाबाद में गंगा स्नान करने से श्रद्धालु पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख समृद्धि आती है.



सामाजिक समरसता: कल्पवास केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक लाभ नहीं, बल्कि सामाजिक समर सत्ता भी बढ़ती है. भक्त मेलों में मिलकर धार्मिक शिक्षा परंपरा और संस्कार का आदान-प्रदान करते हैं.


मानसिक संतुलन: एक महीने के लिए घर बार त्याग कर साधना करना श्रद्धालु को मानसिक संतुलन और आंतरिक शांति देता है.


मेला क्षेत्र के आंकड़े: वर्तमान में फर्रुखाबाद मेला क्षेत्र में लगभग 10000 तंबू लगाई गए है. यहां कुल 50000 कल्पवासी साधना कर रहे हैं. हर तंबू में 4 से 5 लोग निवास कर रहे हैं. यहां प्रतिदिन लगभग 2 लाख श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए पहुंच रहे हैं.


क्या बोले साधु-संत और गृहस्थ: साधु-संत और गृहस्थ बेबी मिश्रा, राजबेटी, महंत मोहन दास, विष्णु दास, रजनी अवस्थी, दुर्गेश शुक्ला, नन्ही देवी, दयाल दास ने बताया कि भागीरथी की गोद में बसी आध्यात्मिक नगरी में दिनों-दिन रौनक बढ़ती जा रही है. शीतलहर में भी कल्पवासियों का जोश नहीं डिगा सकी है. यहां तड़के से गंगा स्नान व धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम शुरू हो जाता है, जो देर शाम तक अनवरत चलता रहता है. अखाड़े में जूना के पास बैठे साधु संत भजन कीर्तन करते हुए अध्यात्म की चर्चा में लीन दिखते हैं. वहीं, कल्पवासी अपनी तंबुओं में भजन-कीर्तन कर रहे हैं. इस मिनी कुंभ में भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई दे रही है.

आत्मशुद्धि, संयम और मोक्ष: संतों ने बतााय कि बताया कि कल्पवास एक प्राचीन हिंदू प्रथा है, जिसमें भक्त पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक करीब एक महीने रामनगरिया मेला में मां गंगा के तट पर रहकर कठोर आत्म- अनुशासन, तपस्या और वेदा अध्ययन करते हैं. जिसका मुख्य उद्देश्य आत्म शुद्धि, संयम और मोक्ष प्राप्ति है. इस दौरान सात्विक भोजन दाल, चावल, रोटी सब्जियां, फल ,दूध और मेवे खाए जाते हैं. दिन में केवल एक बार भोजन किया जाता है और बाकी समय फलहार या उपवास रहता है.

यह भी पढ़ें: प्रयागराज ही नहीं, यूपी के इस जिले में भी लगता है माघ मेला; संत-गृहस्थ करते हैं कल्पवास, जानिए क्या है इतिहास

यह भी पढ़ें: माघ मेला 2026; दो दिन बाद पहला स्नान, कहीं पाइपलाइन तो कहीं चकर्ड प्लेटें नहीं बिछीं, सुविधा पर्ची–जमीन की मारामारी

Last Updated : January 9, 2026 at 9:48 AM IST