भाई की कलाई पर सजी जूट से बनी राखी, कोलकाता से सीखी कला ने दिया कमाई का नया रास्ता
रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जा रहा है. कटिहार में महिलाएं अपने भाई की कलाई पर जूट से बनी राखी बांध रही हैं. रिपोर्ट- मनीष ठाकुर

Published : August 28, 2026 at 3:56 PM IST
|Updated : August 28, 2026 at 4:54 PM IST
कटिहार: कभी जूट की खेती और जूट मिल के लिए पहचान रखने वाला कटिहार अब इसी जूट से एक नई पहचान गढ़ने की कोशिश कर रहा है. इस बार बड़े पैमाने पर जूट के प्राकृतिक रेशों से आकर्षक राखियां तैयार की गईं हैं, जो बाजार में खूब बिक रही हैं. लोग इसे काफी पसंद भी कर रहे हैं. इन राखियों को ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं ने बनाए हैं. खास बात यह है कि इस पहल के पीछे ऐसे एक किसान हैं, जिन्होंने कोलकाता जाकर जूट से अलग-अलग उत्पाद तैयार करने की तकनीक सीखी और लौटकर अपने गांव में इसका प्रयोग शुरू किया.
घर पर ही जूट की राखियां तैयार: दलन पूरब पंचायत के किसान रविशंकर श्रवण ने अपनी टीम के साथ घर पर ही जूट की राखियां तैयार की. पिछले दो वर्षों से जूट से राखी बनाने का काम किया जा रहा है, लेकिन इस बार इसकी मांग को देखते हुए बड़े पैमाने पर उत्पादन किया गया. आसपास के बाजार में राखी बिक रही हैं. लोग सीधे इनके सेंटर से आकर भी खरीद रहे हैं. रविशंकर के यहां करीब 10 से 15 महिलाओं को राखी बनाने का प्रशिक्षण भी दिया गया है, ताकि महिलाओं को घर बैठे रोजगार और अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिल सके.
कैसे आया ये ख्याल?: रविशंकर बताते हैं कि जूट से राखी बनाने की तकनीक सीखने के लिए आत्मा, कटिहार की ओर से उन्हें प्रशिक्षण के लिए कोलकाता ले जाया गया था. वहां उन्होंने देखा कि जिस जूट के रेशे को यहां अक्सर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, उससे कई तरह के उपयोगी और आकर्षक उत्पाद बनाए जा रहे हैं. इसी से प्रेरणा लेकर कटिहार लौटने के बाद उन्होंने जूट की राखी तैयार करने का काम शुरू किया.
"कुछ साल पहले कोलकाता ट्रेनिंग में गए थे. जहां देखे कि जूट से खिलौना, राखी, फाइल-फोल्डर और बहुत तरह की चीजें बनाई जाती है. वापस आकर हम भी राखी और खिलौना बनाने का काम शुरू किए. 100 से अधिक दीदी काम सीखकर अपना भी रोजगार चला रही हैं. ये राखी प्राकृतिक है. सालों भर पहनकर रख सकते हैं, क्योंकि इससे त्वचा पर किसी प्रकार का साइड इफेक्ट नहीं होता है."- रविशंकर श्रवण, संचालक सह जूट किसान

राखी को लेकर लोगों में क्रेज: रविशंकर ने कहा कि अब कई जीविका दीदियां भी उनसे राखी बनाने का प्रशिक्षण ले रही हैं और अपने स्तर पर राखियां तैयार कर रही हैं. हालांकि अभी इस उत्पाद को बड़े बाजार तक पहुंचाने की चुनौती बनी हुई है लेकिन ग्रामीण इलाकों में जूट की राखी को लेकर लोगों में खास आकर्षण देखने को मिल रहा है. लोग खुद आगे आकर राखी की खरीदारी करते दिखे.
इको-फ्रेंडली है ये राखी: जूट से बनी ये राखियां प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल है. रविशंकर ने बताया कि यह राखी सामान्य राखियों की तरह प्लास्टिक आधारित सामग्री पर निर्भर नहीं है. ऐसे में पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी यह एक बेहतर विकल्प हो सकती है.
महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया: वे बताते हैं कि महिलाओं के लिए इससे रोजगार भी मिल रहा है. कई महिलाएं यहां आकर राखी और खिलौने बनाती हैं. कई महिलाएं हमारे पास से ट्रेनिंग लेकर स्वरोजार की दिशा में आगे बढ़ रही हैं.

स्वरोजगार के लिए आगे आएं: राखी बनाने की ट्रेनिंग ले रहीं पूजा देवी बताती हैं कि उन्होंने रविशंकर के यहां आकर जूट से राखी बनाना सीखा. उनका कहना है कि थोड़े अभ्यास के बाद कम समय में कई राखियां तैयार की जा सकती हैं. इससे गांव की महिलाओं को घर पर रहकर काम करने और अपनी आमदनी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है.
"अच्छा लगता है राखी बनाने और उससे कमाई भी हो जाती है. जूट की राखी देखने में बहुत सुंदर भी लगता है. हम तो अन्य बहनों से कहना चाहते हैं कि घर में बेकार बैठने से अच्छा है कि हुनर सीखकर राखी या अन्य सामान बनाने के लिए सीखें. कुछ रुपये कमाकर घर चलाने में मदद भी मिल जाएगी."- पूजा देवी, राखी बनाने वाली महिला

"रविशंकर भैया के यहां जूट से राखी बनाया जाता है. हम भी सीखें हैं. अच्छा लगता है काम सीखने और राखी तैयार करने में सभी बहनों से अपील करना चाहेंगे कि जूट की राखी ही अपने भाई की कलाई में बांधें."- निर्मला पोद्दार, राखी बनाने वाली महिला
बहनें जूट की राखी ही भाई को बांधें: वहीं, निर्मला पोद्दार भी जूट की राखी बनाने की ट्रेनिंग ले रही हैं. उनका कहना है कि इस तरह के काम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का रास्ता मिल सकता है. उन्होंने लोगों से इस रक्षाबंधन पर जूट से तैयार राखियों को अपनाने की अपील की.

बंद जूट मिलों के बीच नई उम्मीद: कटिहार में जूट सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि कभी हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का आधार हुआ करता था. जूट मिलों के बंद होने, मजदूरों की कमी और जूट की कीमतों में गिरावट के कारण धीरे-धीरे किसानों का रुझान इस फसल से कम हुआ. इसका असर जूट की खेती के रकबे पर भी पड़ा.
रविशंकर कहते हैं कि एक समय कटिहार को 'जूट नगरी' के नाम से जाना जाता था. जूट की खेती से होने वाली आमदनी के सहारे किसान दुर्गापूजा, दीपावली और छठ जैसे त्योहारों की तैयारियां करते थे लेकिन मिल बंद होने और जूट की खेती से अपेक्षित लाभ नहीं मिलने के कारण किसानों ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी.
'फिर से दिलाएंगे पुरानी पहचान': वे कहते हैं, 'अगर जूट से इस तरह के नए उत्पाद तैयार कर उन्हें बेहतर बाजार मिले तो किसानों को जूट की खेती के लिए फिर से प्रोत्साहित किया जा सकता है. इससे खेती के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.'
राखी से बड़ा संदेश: जूट की यह राखी भले ही देखने में एक छोटा-सा उत्पाद हो लेकिन इसके पीछे कटिहार की पुरानी पहचान को फिर से जीवित करने की कोशिश छिपी है. एक तरफ किसान पारंपरिक फसल जूट को नए उत्पाद से जोड़कर कमाई का रास्ता तलाश रहे हैं तो दूसरी तरफ महिलाएं इसे घर बैठे रोजगार के रूप में अपना रही हैं.
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