झुंझुनू के जैतपुर स्कूल ने पेश की मिसाल: गुरु-शिष्य ने मिलकर बनाया 'हरित विद्यालय मॉडल'
विद्यालय परिसर में करीब 200 से अधिक फलदार, छायादार एवं औषधीय पौधे लगाए गए हैं. विद्यालय में किचन गार्डन भी विकसित किया गया है.

Published : February 27, 2026 at 4:14 PM IST
झुंझुनू: जिले के बुहाना क्षेत्र में जहां एक ओर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई चिंता का विषय बनी हुई है, वहीं हरियाणा सीमा से सटे जैतपुर गांव स्थित शहीद मेजर हर्ष राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय ने पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल पेश की है. यहां शिक्षक और विद्यार्थी सिर्फ पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धरातल पर हरित क्रांति के वास्तविक संवाहक बनकर काम कर रहे हैं. विद्यालय परिसर में वर्तमान में 200 से अधिक फलदार, छायादार और औषधीय पौधे लहलहा रहे हैं, जो इस पहल की सफलता का प्रमाण है.
शिक्षक वेतन से उठा रहे पौधों का खर्च : इस पहल की सबसे खास बात यह है कि पौधों की सुरक्षा, खाद, जालियां और रखरखाव का पूरा खर्च विद्यालय के शिक्षक अपने वेतन से वहन करते हैं. उनका मानना है कि प्रकृति को दिया गया योगदान आने वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा निवेश है. पेड़ों की सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम लगाया गया है, जिससे जल संरक्षण के साथ पौधों की बेहतर देखभाल सुनिश्चित होती है. वहीं, पेयजल पास के आश्रम स्थित ट्यूबवेल से उपलब्ध कराया जाता है.
लंच ब्रेक बना सेवा का समय : जहां अधिकांश स्कूलों में मध्यांतर का समय खेल या आराम के लिए होता है, वहीं इस विद्यालय में यह समय सेवा का रूप ले चुका है. प्रतिदिन अवकाश के दौरान शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर पौधों की देखरेख करते हैं. सभी बच्चों ने पेड़ों को गोद ले रखा है और निराई-गुड़ाई से लेकर पानी देने तक का काम परिवार की तरह करते हैं. इससे बच्चों में जिम्मेदारी और प्रकृति प्रेम की भावना विकसित हो रही है.
कई प्रजातियों के पौधों से हरा-भरा परिसर : विद्यालय परिसर में बिल्वपत्र, मौसमी, किन्नू, नींबू, आंवला, आम, करौंदा, अशोक, नीम, पीपल और बरगद सहित कई प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं. स्कूल गेट के बाहर भी बरगद और पीपल के करीब 20 पेड़ लगाए गए हैं, जिनकी सुरक्षा के लिए लोहे की जालियां लगाई गई हैं. फलदार पौधों से प्राप्त फलों की बिक्री से जो राशि मिलती है, उसे फिर से पौधारोपण और रखरखाव में लगाया जाता है.

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किचन गार्डन से पोषाहार : विद्यालय में विकसित किचन गार्डन इस मॉडल की एक और खास उपलब्धि है. यहां आलू, प्याज, लहसुन, धनिया, हरी मिर्च, पालक और मेथी जैसी सब्जियां जैविक खाद से उगाई जाती हैं. यही सब्जियां विद्यार्थियों के मध्यान्ह भोजन में उपयोग की जाती हैं, जिससे बच्चों को पौष्टिक और सुरक्षित आहार मिलता है. साथ ही विद्यार्थियों को जैविक खेती का व्यावहारिक ज्ञान भी मिल रहा है.
सामुदायिक भागीदारी भी बनी ताकत : विद्यालय परिसर को स्वच्छ और हरा-भरा बनाए रखने में ग्रामीणों की भी अहम भूमिका है. गांव की महिलाएं जब अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने आती हैं तो वे स्वयं परिसर की सफाई में सहयोग करती हैं. इससे विद्यालय और समुदाय के बीच मजबूत संबंध भी विकसित हुए हैं.
प्रधानाचार्य का बयान : विद्यालय प्रधानाचार्य राजवीर सोमरा के अनुसार, राज्य सरकार की पर्यावरण जागरूकता और हरित विकास की नीतियों से प्रेरित होकर यह पहल शुरू की गई. उनका कहना है कि गुरु-शिष्य के सामूहिक प्रयास से तैयार हुआ यह मॉडल न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहा है, बल्कि अन्य विद्यालयों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण भी बन रहा है.

