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हाईकोर्ट में मामलेः सरकारी जमीन पर हुए कब्जों के नियमन पर रोक, पौधारोपण में वित्तीय अनियमितता पर मांगा जवाब

राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन पर कब्जों, पौधरोपण में वित्तीय अनियमितता व सेवा समाप्ति से जुड़े मामलों की सुनवाई की.

COURT STAYS REGULARIZATION,  ENCROACHMENTS ON GOVERNMENT LAND
राजस्थान हाईकोर्ट. (ETV Bharat jaipur)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : July 6, 2026 at 8:53 PM IST

6 Min Read
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जयपुरः राजस्थान हाईकोर्ट ने नगरीय विकास विभाग के 10 जून 2026 के आदेश के जरिए सरकारी जमीनों पर कब्जा कर बसी कॉलोनियों के नियमन और अपंजीकृत दस्तावेजों से खरीदी जमीनों के पट्टे देने वाले प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगा दी है. इसके साथ ही अदालत ने डिनोटिफाइड कच्ची बस्तियों के नियमन, कच्ची बस्तियों के नियमन की दरों को तय करने और खांचा भूमि के कब्जे को आवंटित करने पर भी अंतरिम रोक लगा दी है. वहीं, मामले में राज्य सरकार सहित एसीएस यूडीएच से जवाब देने के लिए कहा है. एक्टिंग सीजे संजीव प्रकाश शर्मा व जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश पब्लिक अगेंस्ट करप्शन की जनहित याचिका पर दिए.

याचिका में अधिवक्ता पूनम चंद भंडारी व टीएन शर्मा ने अदालत को बताया कि नगरीय विकास विभाग ने गत 10 जून के आदेश से प्रदेशभर में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कर बसाई कॉलोनियों के नियमन करने सहित अपंजीकृत दस्तावेजों के जरिए खरीदी जमीन के पट्टे देने का प्रावधान किया है. इसके लिए पूरे प्रदेश भर में सरकार नियमन कैंप लगा रही है. वहीं, कच्ची बस्तियों के नियमन के लिए भी दरें तय की गई हैं और डिनोटिफाइड कच्ची बस्तियों के नियमन सहित खांचा भूमि पर किए गए कब्जों का आवंटन करना तय किया है.

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याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने राजेन्द्र कुमार बडज़ात्या बनाम स्टेट ऑफ यूपी मामले में स्पष्ट कहा है कि अनधिकृत निर्माणों के लिए कोई नरमी नहीं बरती जाएगी. ऐसे आदेशों से आमजन में यह संदेश जाता है कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करने पर बाद में नियमन हो जाएगा. इससे न केवल सरकारी सम्पत्ति का दुरुपयोग होगा, बल्कि नियोजित विकास बाधित होगा और प्रशासनिक प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा. राज्य सरकार का अवैध कब्जों को वैध ठहराना कानून के खिलाफ है. आदेश को रद्द किया जाए. इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने संबंधित वर्ग की भूमियों के नियमन पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है.

पौधारोपण में वित्तीय अनियमितताः राजस्थान हाईकोर्ट ने साल 2023-24 के दौरान अलवर की राजगढ़ रेंज में पौधारोपण के नाम पर 17 करोड़ रुपए से ज्यादा राशि की वित्तीय अनियमितता व पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से जुडे़ मामले में मुख्य सचिव, एसीएस फॉरेस्ट, पीसीसीएफ व उप वन सचिव से चार सप्ताह में जवाब देने के लिए कहा है. एक्टिंग सीजे एसपी शर्मा व जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश वरदा फाउंडेशन की जनहित याचिका पर दिया.

याचिका में सीनियर एडवोकेट आरके माथुर व अधिवक्ता आदित्य किरण माथुर ने अदालत को बताया कि 2023-24 में राजगढ़ रेंज के 11 स्थानों पर करीब 650 हेक्टेयर क्षेत्र में मृदा संरक्षण एवं पौधारोपण कार्य कराए गए. यह कार्य फ्रांसीसी विकास एजेंसी के लोन से संचालित राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता विकास परियोजना के तहत कराए. याचिका में आरोप लगाया गया कि इसमें अफसरों के साथ मिलीभगत कर 17 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम की वित्तीय अनियमितताएं हुई.

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याचिका में कहा कि जेसीबी से काम कराने के बाद उसे मानव श्रम का बताया. वहीं, अधिकांश जगह तकनीकी तौर पर पौधारोपण के लिए सही नहीं थी, लेकिन फिर भी भारी मशीनों से प्राकृतिक वन क्षेत्र एवं मिट्टी की संरचना को नुकसान पहुंचाया. ग्राम वन सुरक्षा एवं प्रबंधन समितियों के पदाधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर कर उनके बैंक खातों से सरकारी राशि निकाली गई. प्रारंभिक जांच अधिकारी रहे तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक राजीव चतुर्वेदी ने इसमें 17 करोड़ रुपए से ज्यादा की वित्तीय अनियमितता पाई थी. उन्होंने फरवरी 2025 में वन विभाग को यह मामला एसीबी में जांच के लिए भेजने का प्रस्ताव भेजा, लेकिन मामला वन विभाग में ही कई महीनों तक लंबित रहा और जांच में देरी हुई. याचिका में गुहार की गई कि मामले की न्यायिक निगरानी में सीबीआई से जांच कराई जाए. इस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है.

सेवा समाप्ति मामले में दिव्यांग अफसर को राहतः राजस्थान हाईकोर्ट ने नए नियमों के तहत घटाई दिव्यांगता प्रतिशत के आधार पर साल 2013 में नियुक्त सहायक प्रशासनिक अधिकारी की सेवा समाप्ति मामले में उसे राहत देते हुए एकलपीठ के गत 27 जनवरी के आदेश की क्रियान्विति पर रोक लगा दी है. वहीं, अदालत ने पंचायती राज विभाग के एसीएस, संयुक्त सचिव, कार्मिक विभाग सचिव तथा जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से जवाब मांगा है. एक्टिंग सीजे एसपी शर्मा व जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने यह अंतरिम आदेश किशोर सिंह की अपील पर दिए.

अपील में एकलपीठ के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें दिव्यांगता प्रतिशत कम होने पर प्रार्थी की सेवा खत्म करने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी थी. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सुनीत चौधरी ने कहा कि 40 प्रतिशत कम दृष्टि दिव्यांगता पर प्रार्थी को पंचायती राज विभाग में साल 2013 में नियुक्ति मिली थी. वहीं, बाद में केंद्र सरकार ने दिव्यांगता मूल्यांकन के लिए नई गाइडलाइन लागू की. नए मानकों के अनुसार दोबारा मेडिकल परीक्षण में प्रार्थी की दिव्यांगता 40 प्रतिशत से घटाकर 30 प्रतिशत आंकी गई.

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इस पर विभाग ने प्रार्थी की सेवा खत्म करने का आदेश दिया. इसे एकलपीठ में चुनौती दी, लेकिन याचिका खारिज हो गई. खंडपीठ में प्रार्थी की ओर से कहा कि नियुक्ति के समय प्रार्थी पूरी तरह पात्र था. केवल केंद्र सरकार के दिव्यांगता मूल्यांकन के मानदंड बदलने के चलते पूर्व में नियुक्त कर्मचारी की दिव्यांगता कम कर उसकी सेवा को खत्म नहीं किया जा सकता. प्रार्थी पर 2001 के नियम लागू होते हैं जबकि उसकी सेवा 2024 के नियमों से खत्म की है. खंडपीठ ने प्रार्थी पक्ष की दलीलों से सहमत होकर एकलपीठ के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी.