हाईकोर्ट ने सांभर लेक क्षेत्र में सोलर प्लांट लगाने पर लगी रोक हटाई, कंपनी को दी सशर्त मंजूरी
राजस्थान हाईकोर्ट ने सोलर प्लांट से जुड़ी याचिका पर सुनवाई की.

Published : May 1, 2026 at 8:14 PM IST
जयपुरः राजस्थान हाईकोर्ट ने नावा सिटी में सौर संयंत्र परियोजना स्थापित करने पर रोक लगाने वाले अपने गत 17 दिसंबर के आदेश को वापस लेते हुए एसजेवीएन ग्रीन एनर्जी लिमिटेड को प्लांट लगाने की सशर्त अनुमति दी है. अदालत ने कहा कि सोलर पैनलों की ऊंचाई को बढ़ाया जाए, ताकि प्रवासी पक्षी बिना किसी बाधा के उनके नीचे घोंसला बनाकर अंडे दे सकें और प्रजनन कर सकें. जस्टिस एसपी शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने यह आदेश दिनेश कुमावत व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिए.
अदालत ने एसजेवीएन को कहा है कि वह सौर पैनल की ऊंचाई कम से कम 1.5 मीटर रखेगा और यदि क्षेत्र से पेड़ काटने की जरूरत होगी तो उनकी जगह आसपास के इलाकों में तीन गुणा वृक्ष लगाएगा. इसके साथ ही इस भूमि पर पानी के आने पर कोई व्यवधान नहीं होना चाहिए, जिससे उस पानी का उपयोग प्रवासी पक्षी बारिश के बाद भी कर सकें. अदालत ने स्पष्ट किया है कि हिंदुस्तान साल्ट्स, सांभर सॉल्ट्स व एसजेवीएन के बीच हुए एग्रीमेंट की अवधि में अदालत के स्टे की अवधि को शामिल नहीं किया जाएगा.
अदालत ने कहा कि गत 17 दिसंबर को आदेश देते समय एनजीटी में मामला लंबित होने और उसकी ओर से स्टे नहीं देने के तथ्य अदालत के संज्ञान में नहीं लाए गए थे. ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना चिंता का विषय है. अदालत ने कहा कि सांभर झील केवल नमक उत्पादन के लिए है, बल्कि महत्वपूर्ण पक्षी अभयारण्य के रूप में भी कार्य करती है. जहां सर्दियों में हजारों राजहंस व अन्य प्रवासी पक्षी आते हैं और प्रजनन करते हैं. यह महत्व केवल झील क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नावा सिटी सहित आसपास के इलाको में भी फैला हुआ है. ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि हम उन पक्षियों की रक्षा करें. अदालत ने अपने आदेश में माना कि बिजली की कमी को दूर करने के लिए सौर ऊर्जा भी जरूरी है.
अदालत ने कहा कि एडीजे, सांभर की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि संबंधित भूमि वेटलैंड नहीं है और न तो यह नमक क्षेत्र है और ना ही वेटलैंड या झील का बफर जोन है. वहीं, सांभर सॉल्टस के एमडी के अनुसार यह भूमि झील से करीब ढाई किमी दूर है और इस दूरी में आवासीय व व्यावसायिक प्रतिष्ठान मौजूद हैं. अदालत ने कहा कि सांभर सॉल्टस के पूर्व सीएमडी के अनुसार यह भूमि सन् 1950 के आसपास आवंटित की गई थी. हालांकि समय के साथ यह भूमि लगभग अप्रयुक्त हो गई है और यहां पानी भी मौजूद नहीं है.
सुनवाई के दौरान प्रतिवादी कंपनियों की ओर से कहा गया कि याचिका तथ्य छिपाकर पेश की गई है. एनजीटी ने इस संबंध में परियोजना पर रोक नहीं लगाई और एक कमेटी का गठन किया था. इसके अलावा यह परियोजना नियमों के तहत व्हाइट कैटेगरी में आती है और पर्यावरण मंत्रालय की 13 मई, 2011 की अधिसूचना के तहत इसे पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी की जरूरत नहीं है. ऐसे में गत 17 दिसंबर को परियोजना पर दिए स्टे को रद्द किया जाए.

