Sawan Special: पुष्कर का वो शिवालय, जहां महादेव का क्रोध शांत करने के लिए ब्रह्मा जी ने की थी शिवलिंग की स्थापना
पुष्कर में जगतपिता ब्रह्मा द्वारा स्थापित कपालेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास अद्भुत है. पढ़िए प्रियांक शर्मा की स्पेशल रिपोर्ट.

Published : August 24, 2026 at 6:35 AM IST
पुष्कर (अजमेर): सतयुग के पावन तीर्थ पुष्कर में वैसे तो कई प्राचीन मंदिर और शिवालय स्थापित हैं, लेकिन जगतपिता ब्रह्मा द्वारा स्थापित कपालेश्वर महादेव मंदिर की महिमा सबसे अलग है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही दिव्य स्वयंभू शिवलिंग है, जिसकी स्थापना और पूजन कर स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने देवाधिदेव महादेव के भयंकर क्रोध को शांत किया था. सावन के इस पावन महीने में कपालेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन के लिए देश-विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों का ताँता लगा हुआ है. आइए जानते हैं 900 साल पुराने जूना अखाड़े से जुड़े इस चमत्कारी मंदिर का पूरा रहस्य और इसकी अद्भुत कहानी.
900 वर्षों का गौरवशाली इतिहास: धरती का पहला और सतयुग का एकमात्र जीवित तीर्थराज पुष्कर है, जो पूरे विश्व में जगतपिता ब्रह्मा के इकलौते सक्रिय साधना स्थल के रूप में विख्यात है. धार्मिक नगरी पुष्कर में मुख्य ब्रह्मा मंदिर के अलावा सतयुग कालीन कई अति प्राचीन और जाग्रत देवस्थान स्थित हैं, जिनमें कपालेश्वर महादेव शिवालय का स्थान ऊंचा है. पौराणिक इतिहास समेटे इस दिव्य शिवलिंग को स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने अपने हाथों से स्थापित किया था. वर्तमान में इस पवित्र मंदिर की कमान जूना अखाड़े के 26वें महंत सेवानंद गिरी महाराज संभाल रहे हैं, जबकि काशी के परम संत कांतानंद जी महाराज इस प्राचीन गद्दी के प्रथम महंत थे. पिछले 900 वर्षों से इस सिद्धपीठ पर निरंतर केवल जूना अखाड़े के ही संतों और सन्यासियों की महंत परंपरा चली आ रही है.
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ब्रह्मा जी के हस्त-कमल से हुई पुष्कर की उत्पत्ति: महंत सेवानंद गिरी बताते हैं कि धार्मिक ग्रंथों और स्कंद पुराण की दंतकथाओं के अनुसार, जगतपिता ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की, तब उन्होंने यज्ञ परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए एक विशाल महायज्ञ का संकल्प लिया. हालांकि, पृथ्वी पर यज्ञ के लिए सही स्थान का चुनाव करना एक कठिन चुनौती थी, तभी एक आकाशवाणी हुई, जिसने ब्रह्मा जी को अपने हाथ में मौजूद दिव्य कमल को धरती पर प्रक्षिप्त (छोड़ने) करने का निर्देश दिया. ब्रह्मा जी के हस्त-कमल से छूटे पुष्प की पंखुड़ियां धरती पर तीन अलग-अलग स्थानों पर गिरीं. जहां पहली पंखुड़ी गिरी उसे 'बूढ़ा पुष्कर' कहा गया, दूसरी जगह को 'माध्य पुष्कर' और जहां तीसरी पंखुड़ी गिरी उसे 'कनिष्ठ पुष्कर' के नाम से जाना गया. यही कनिष्ठ पुष्कर आज का पवित्र 'ब्रह्मा सरोवर' है. ब्रह्मा जी ने इसी स्थान को चुनकर महायज्ञ का शुभारंभ किया और इस भव्य आयोजन की पूरी कमान देवर्षि नारद मुनि को सौंप दी.

यज्ञ परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए यज्ञ: महंत सेवानंद गिरी बताते हैं कि जगतपिता ब्रह्मा के इस यज्ञ में सभी देवी-देवताओं, विप्रों, सागरों, नदियों, तीर्थों, यक्षों, गंधर्वों, सर्पों आदि सभी को आमंत्रित किया गया था, लेकिन जगतपिता ब्रह्मा ने जिन लोगों को सभी को यज्ञ के लिए आमंत्रण देने की जिम्मेदारी सौंपी थी, उन्होंने देवाधिदेव महादेव को आमंत्रित नहीं किया. देवर्षि नारद ही थे, जिन्होंने जगतपिता ब्रह्मा को यह कहकर मना लिया कि भगवान शिव श्मशान के भस्मधारी हैं, उनका यज्ञ में क्या काम और वह कैलाश पर अभी साधना में लीन हैं. ऐसे में महादेव को यज्ञ में बुलाना उचित नहीं है. उन्होंने बताया कि यज्ञ आरंभ हुआ, लेकिन यज्ञ सपत्नीक ही हो सकता है, इसलिए महर्षि नारद ने जगतपिता ब्रह्मा की पत्नी माता सावित्री को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जल्द पहुंचने के लिए कहा, लेकिन माता सावित्री को यज्ञ में पहुंचने में विलंब हो रहा था, तब जगतपिता ब्रह्मा ने एक कन्या से विवाह करके उन्हें अपने साथ यज्ञ में बैठाया, यही कन्या माता गायत्री थीं.

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जगतपिता ब्रह्मा को मिला श्राप: उन्होंने बताया कि जगतपिता ब्रह्मा के दूसरी शादी करने पर माता सावित्री काफी क्रोधित हुईं और उन्होंने जगतपिता ब्रह्मा को श्राप दे दिया कि संसार में उनका न तो कोई मंदिर होगा और न ही उन्हें पूजा जाएगा, यदि कोई मंदिर बनाएगा तो उसका सिर धड़ से अलग हो जाएगा. इस भयानक श्राप से देवी-देवता भी भयभीत हो गए और उन्होंने माता सावित्री से प्रार्थना की. देवी-देवताओं की प्रार्थना पर माता सावित्री ने श्राप का प्रभाव कम करते हुए कहा कि पुष्कर के अलावा कहीं भी जगतपिता ब्रह्मा का मंदिर नहीं होगा और न ही उनकी पूजा की जाएगी. यही वजह है कि केवल पुष्कर में ही जगतपिता ब्रह्मा का मंदिर है और यहीं उनकी पूजा होती है.

क्रोध को शांत करने के लिए स्थापित किया शिवलिंग: महंत सेवानंद गिरी बताते हैं कि महर्षि नारद ने कैलाश पहुंचकर महादेव को यज्ञ में नहीं बुलाने की बात कहकर क्रोधित कर दिया. जगतपिता ब्रह्मा को सबक सिखाने के लिए महादेव ने अपने शक्तिशाली गण कपाली को भेजा. कपाली ने न केवल पूरे यज्ञ क्षेत्र में, बल्कि पूरे पुष्कर क्षेत्र में अपनी माया से काल ही काल उत्पन्न कर दिया, जिससे यज्ञ में भय का माहौल पैदा हो गया. जगतपिता ब्रह्मा कपाली से बचने के लिए बैकुंठ में भगवान विष्णु के पास पहुंचे, तब भगवान विष्णु ने देवाधिदेव महादेव का क्रोध शांत करने के लिए जगतपिता ब्रह्मा को वापस पुष्कर जाकर शिवलिंग स्थापित करने और उसका पूजन करने के लिए कहा. बैकुंठ के बाहर बैठे कपाली को चकमा देकर जगतपिता ब्रह्मा पुष्कर पहुंचे और इसी स्थान पर उन्होंने स्वयंभू शिवलिंग की स्थापना की. कपाली को जब पता चला कि जगतपिता ब्रह्मा पुष्कर में हैं, तो वह वापस उनके पीछे पुष्कर लौट आया और उसने देखा कि ब्रह्मा शिव की आराधना कर रहे हैं. शिव की आराधना करते देख कपाली ने जगतपिता ब्रह्मा का अहित करने का विचार त्याग दिया और स्वयं उसी शिवलिंग में समाहित हो गया, तभी से यह शिवलिंग कपालेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुआ.

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ब्रह्म सरोवर के जल से अभिषेक करना शुभकारी: उन्होंने बताया कि भगवान कपालेश्वर महादेव का मंदिर कई बार बना और इसका कई बार जीर्णोद्धार भी हुआ, लेकिन स्वयं जगतपिता ब्रह्मा की ओर से स्थापित और पूजित स्वयंभू शिवलिंग आज भी विराजमान है. महंत सेवानंद गिरी बताते हैं कि पुष्कर सरोवर के पवित्र जल से शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हुए "ॐ ब्रह्मणे नमः" का जाप करने से श्रद्धालुओं के हर दुख दूर होते हैं और उनकी मनोकामनाएं यहां पूर्ण होती हैं.
मनोकामना पूर्ण हुई, अब देती हूं हर बार धन्यवाद: सतयुग से बाबा कपालेश्वर महादेव का शिवलिंग अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाए हुए है. तीर्थयात्री ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए यह दिव्य शिवालय बड़ी आस्था का केंद्र है. श्रद्धालु पायल बताती हैं कि बचपन से वह मंदिर आती रही हैं, खासकर सावन में तो वह हर दिन भगवान कपालेश्वर महादेव को जल अर्पित करने के लिए आती हैं. उन्होंने बताया कि महादेव की कृपा से उनकी मनोकामना पूर्ण हुई है और अब वह हर बार महादेव को जल अर्पित करके बारंबार धन्यवाद देने आती हैं.

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ब्रह्मा ने स्थापित किया और पूजा: स्थानीय श्रद्धालु शोभा पाराशर बताती हैं कि "भगवान कपालेश्वर महादेव का मंदिर सबसे प्राचीन है. महादेव के इस शिवलिंग को जगतपिता ब्रह्मा ने स्थापित किया था, जो स्वयंभू है. सावन के महीने में हर रोज महादेव की पूजन के लिए यहां आती हूं. मेरी तरह पुष्कर के कई लोग मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए रोज आते हैं. यहां ब्रह्म सरोवर के जल के अलावा अन्य तीर्थों के जल से भी महादेव का जलाभिषेक होता है, कई लोग यहाँ पर सहस्त्रधारा भी करते हैं. भगवान कपालेश्वर महादेव सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं."
मंत्र से महादेव करते हैं मनोकामना सिद्ध: पुष्कर के निकट गनाहेड़ा गांव के निवासी श्रद्धालु नारायण सिंह रावत बताते हैं कि वह कपालेश्वर महादेव मंदिर में 17 वर्षों से दर्शन और पूजन के लिए आ रहे हैं. सावन के महीने में तो वह हर दिन मंदिर आते हैं. यह शिवलिंग जगतपिता ब्रह्मा ने स्थापित किया था. शिवलिंग पर जो भी सच्चे मन से जल अर्पित करता है, उसकी मनोकामनाएं भगवान कपालेश्वर महादेव ज़रूर पूर्ण करते हैं. श्रद्धालु प्रकाश सिंह बताते हैं कि सावन में वह मंदिर आना कभी नहीं भूलते. यहां मान्यता है कि ब्रह्म सरोवर के जल से यहां जलाभिषेक करने और जल चढ़ाते वक्त "ॐ ब्रह्मणे नमः" मंत्र का जाप करने से कपालेश्वर महादेव जल्द प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.
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