ETV Bharat / state

हिमाचल के वीर सैनिक की पत्नी को 65 साल बाद मिला पेंशन का हक, हाईकोर्ट ने पक्ष में सुनाया फैसला

कोर्ट ने साफ कहा कि सेवा से सैनिक की छुट्टी 1965 के युद्ध में लगी चोटों के कारण हुई.नतीजतन उसे विकलांगता पेंशन मिलनी चाहिए थी.

पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट (FILE PHOTO)
author img

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : November 7, 2025 at 12:44 PM IST

2 Min Read
Choose ETV Bharat

पंचकूला/शिमला: भारत-पाकिस्तान 1965 युद्ध के वीर सैनिक हिमाचल के मंडी जिले में रहने वाले दिवंगत सैनिक चंदरमणि की विधवा पत्नी को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट से साठ साल बाद न्याय मिला है. छह दशक से इंसाफ के लिए लड़ रही विधवा के पक्ष में हाईकोर्ट ने सशस्त्र बल अधिकरण के आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने 1965 के युद्ध में गंभीर रूप से घायल सैनिक की पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन का हकदार माना है.

1965 के युद्ध में हुए चोटिल 1987 में मौत

हिमाचल के जिला मंडी के दिवंगत सैनिक चंदरमणि 8 अप्रैल 1964 को सेना में भर्ती हुए थे और 1965 के युद्ध में हिस्सा लिया. युद्ध के दौरान उन्हें गंभीर शारीरिक और मानसिक चोटें आईं, जिनका इलाज लखनऊ के मिलिट्री अस्पताल में हुआ, लेकिन गंभीर रूप से घायल होने के कारण उन्हें ड्यूटी योग्य नहीं माना गया. नतीजतन, 21 सितंबर 1968 को सेवा की आवश्यकता नहीं होने की टिप्पणी लिखकर उन्हें दो सैनिकों की मदद से घर भेज दिया गया और फिर 24 मार्च 1987 को उनका देहांत हो गया.

पत्नी का पारिवारिक पेंशन का दावा

सैनिक की पत्नी मिन्नी देवी उर्फ मुन्नी ने विशेष पारिवारिक पेंशन का दावा किया. इस पर सशस्त्र बल अधिकरण चंडीगढ़ ने 14 जुलाई 2023 को उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें साधारण पारिवारिक पेंशन देने का आदेश दिया था. इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में अपील की थी. केंद्र सरकार ने मिन्नी देवी का दावा काफी देर से किए जाने के तर्क के साथ फैसले को चुनौती दी, क्योंकि सैनिक की मौत 1987 में हुई थी.

कोर्ट ने पारिवारिक पेंशन का हकदार बताया

इस केस का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ये साफ है कि सेवा से सैनिक की छुट्टी 1965 के युद्ध में लगी चोटों के कारण हुई. नतीजतन उसे विकलांगता पेंशन मिलनी चाहिए थी. मौत के बाद सैनिक की पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन का अधिकार था. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सशस्त्र बल अधिकरण को साधारण पारिवारिक पेंशन नहीं, बल्कि विशेष पारिवारिक पेंशन देनी चाहिए थी, क्योंकि सैनिक युद्ध में लगी शारीरिक और मानसिक चोटों के कारण अक्षम हो गया था.

ये भी पढ़ें: सनवारा टोल बैरियर अब 11 नवंबर तक रहेगा बंद, हाईकोर्ट का एनएचएआई को सड़क सुधारने के लिए दस दिन का समय