पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बालिग अविवाहित बेटे भी माने जाएंगे पिता पर आश्रित
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बालिग अविवाहित बेटों को आश्रित मानते हुए 4.70 लाख अतिरिक्त मुआवजा और 7.5 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया.

Published : June 29, 2026 at 4:47 PM IST
पंचकूला: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून की व्याख्या कर एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल बालिग होने से अविवाहित बेटे पिता पर अपनी निर्भरता नहीं खो देते. यदि वे पढ़ाई कर रहे हों, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हों और अभी स्थापित नहीं हुए हों तो भी उन्हें आश्रित माना जाएगा और वे मुआवजा व पैरेंटल कंसोर्टियम के पूर्ण अधिकार के हकदार होंगे. नतीजतन कोर्ट ने इस सिद्धांत के आधार पर सड़क हादसे में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को मिलने वाले मुआवजे में 4.70 लाख रुपये की अतिरिक्त वृद्धि के आदेश दिए हैं.
पूर्व के फैसले को चुनौती: जस्टिस प्रमोद गोयल की कोर्ट ने भतेरी और अन्य की अपील स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया. अपीलकर्ताओं में हादसे में जान गंवाने वाले राजबीर की पत्नी व दो पुत्र शामिल हैं. अपीलकर्ताओं ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, सोनीपत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें कुल 12.06 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था.दरअसल, यह मामला 8 मई 2024 को हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें राजबीर की मौत हो गई थी. दुर्घटना प्रतिवादी चालक की तेज और लापरवाहीपूर्ण ड्राइविंग के कारण हुआ था. लेकिन दुर्घटना के तरीके और जिम्मेदारी को लेकर कोई अपील या क्रॉस ऑब्जेक्शन दाखिल नहीं किया गया, जिस कारण हाईकोर्ट के समक्ष विवाद केवल मुआवजा राशि तक सीमित रहा.
साक्ष्यों के अभाव में मजदूरी कम मानी: मामले के अपीलकर्ताओं ने अदालत को बताया कि राजबीर चाय की दुकान चलाकर प्रतिमाह लगभग 20 हजार रुपये कमाते थे. लेकिन ट्रिब्यूनल ने पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में राजबीर की मासिक आय, न्यूनतम मजदूरी यानी 11,500 रुपये मानी. हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष को सही ठहराते हुए कहा कि केवल मौखिक दावों के आधार पर आय निर्धारित नहीं की जा सकती, जबकि उसके लिए विश्वसनीय दस्तावेज या स्वतंत्र साक्ष्य आवश्यक हैं.
इन कारणों से पिता पर निर्भरता समाप्त नहीं:अदालत ने मामले में व्यक्तिगत खर्च के मद में 50 प्रतिशत कटौती को गलत माना. जस्टिस गोयल ने कहा कि मृत राजबीर के दोनों बेटे भले ही बालिग थे लेकिन वे अविवाहित थे व पढ़ाई कर रहे थे और आर्थिक रूप से स्थापित भी नहीं हुए थे. ऐसी स्थिति में उनकी पिता पर निर्भरता समाप्त नहीं मानी जा सकती. इस कारण मृतक के तीन आश्रित माने जाएंगे और व्यक्तिगत खर्च के लिए केवल एक-तिहाई कटौती ही उचित होगी.
दोनों बेटे पैरेंटल कंसोर्टियम के हकदार:अदालत ने कहा कि दोनों बेटे पैरेंटल कंसोर्टियम के भी हकदार हैं. इसके तहत प्रत्येक बेटे को 48,400 रुपये देने का आदेश दिया गया. संशोधित गणना के बाद कुल मुआवजा 16,76,448 रुपये निर्धारित किया गया, जो ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए 12,06,028 रुपये से 4,70,420 रुपये अधिक है.
7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के निर्देश:हाईकोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण त्रुटि की ओर भी ध्यान आकृष्ट कराया. अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल द्वारा मुआवजे पर ब्याज नहीं देना कानूनसम्मत नहीं था. इसलिए दावेदारों को दावा याचिका दाखिल होने की तारीख से लेकर पूरी राशि के भुगतान तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया गया. मुआवजे के वितरण और भुगतान की जिम्मेदारी ट्रिब्यूनल के मूल आदेश के अनुरूप ही रहेगी.
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