सच छिपाकर दाखिल की जनहित याचिका, हाईकोर्ट ने लगाया दो लाख रुपये का हर्जाना
अदालत ने माना कि पूर्व मामलों को छिपाकर न्यायालय से आदेश प्राप्त करने का प्रयास किया गया.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : August 31, 2026 at 10:04 PM IST
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के मोहनपुर ठिरिया स्थित नगर निगम के वधशाला ठेके से संबंधित जनहित याचिका को कानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग मानते हुए खारिज कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता शैलेश सिंह पर दो लाख रुपये का हर्जाना लगाया है. यह रकम हाईकोर्ट की विधिक सेवा समिति में जमा करने का निर्देश दिया गया है.
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2015 में मौर्या फ्रोजन एग्रो फूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में किए गए ठेका आवंटन को चुनौती दी थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि निविदा प्रक्रिया में धोखाधड़ी, मिलीभगत और प्रक्रिया का दुरुपयोग हुआ. याचिकाकर्ता ने निविदा को रद्द कर नए सिरे से पारदर्शी निविदा कराने तथा कंपनी के गठन, निदेशकों और वास्तविक स्वामित्व से संबंधित अभिलेखों की जांच कराने की मांग की थी.
सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता इसी मामले से जुड़े विवाद को लेकर पहले भी कई मुकदमे दाखिल कर चुका है. वर्ष 2024 में दायर एक जनहित याचिका वापस ले ली गई थी, जबकि दूसरी याचिका में हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण का दरवाजा खटखटाने की छूट दी थी. इसके बाद याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण में भी आवेदन दाखिल किए. इनमें से एक वापस लिया गया, जबकि दूसरा अभी लंबित है और उसकी अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है.
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान याचिका में पूर्व की कार्यवाहियों का खुलासा नहीं किया गया. याचिकाकर्ता ने यह घोषणा भी की थी कि इसी कारण या राहत के लिए पहले कोई जनहित याचिका दाखिल नहीं की गई है, जबकि रिकॉर्ड से यह तथ्य गलत साबित हुआ. अदालत ने माना कि पूर्व मामलों को छिपाकर न्यायालय से आदेश प्राप्त करने का प्रयास किया गया.
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जनहित याचिका का इस्तेमाल निजी हित या किसी प्रतिस्पर्धी के इशारे पर नहीं किया जा सकता. पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को न्यायालय के समक्ष पूरे और सही तथ्य रखने चाहिए. जनहित याचिका की आड़ में निजी विवाद, व्यक्तिगत लाभ या किसी अन्य उद्देश्य से मुकदमा दायर करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है. हाईकोर्ट ने याचिका को कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग मानते हुए दो लाख रुपये की लागत के साथ खारिज कर दिया.
अदालत ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि एक महीने के भीतर विधिक सेवा समिति में जमा की जाए. राशि जमा नहीं होने पर प्रतिवादी नंबर चार को वसूली के लिए आवेदन करने की छूट दी गई है.
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