प्राइवेट ऑडिटर और रियल-टाइम मॉनिटरिंग: दिल्ली में क्यों और क्या बदले गए फायर एनओसी के नियम?
''विभाग इस समय संसाधनों व स्टाफ के अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है''. ए.के. मलिक, चीफ फायर ऑफिसर, दिल्ली फायर सर्विस

Published : June 1, 2026 at 7:50 PM IST
नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में बहुमंजिला इमारतों, शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों व व्यापारिक परिसरों की सुरक्षा को अचूक बनाने तथा 'फायर एनओसी' से जुड़ी जटिल प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने के लिए दिल्ली सरकार ने कई बदलाव किए हैं. दिल्ली सरकार के गृह विभाग ने 'दिल्ली अग्निशमन सेवा (संशोधन) नियम, 2025' को आधिकारिक मंजूरी दे दी है, जिसकी विधिवत अधिसूचना 26 मई 2026 को दिल्ली के राजपत्र के माध्यम से जारी कर दी गई है.
इस नए संशोधन के तहत आगामी 26 अगस्त (राजपत्र प्रकाशन के 90 दिनों के बाद) से दिल्ली में थर्ड-पार्टी प्राइवेट ऑडिटर्स (निजी इंजीनियरों/फर्मों) द्वारा फायर सेफ्टी ऑडिट करने और एनओसी जारी करने की भी नई व्यवस्था जमीन पर पूरी तरह प्रभावी होने जा रही है. इन नीतिगत बदलावों में अत्याधुनिक तकनीक के माध्यम से मानवीय त्रुटियों व मिलीभगत को न्यूनतम करना है. दरअसल, दिल्ली में उपहार सिनेमा, अनाज मंडी, मुंडका व हाल के वर्षों में विवेक विहार के न्यूबोर्न चाइल्ड हॉस्पिटल जैसी लगातार बढ़ती आग की दर्दनाक घटनाओं को रोकने व दिल्ली फायर सर्विस के रिस्पॉन्स टाइम को बेहतर करने के लिए यह बेहद कड़ा और सुधारात्मक कदम उठाया गया है. अब न सिर्फ निजी एजेंसियों को ऑडिट का वैधानिक अधिकार मिला है, बल्कि चौबीसों घंटे लाइव निगरानी रखने वाला ऑटोमैटिक कंटीन्यूअस मॉनिटरिंग सिस्टम' (ACMS) भी अनिवार्य कर दिया गया है.
जानिए आखिर क्यों बदले नियम?
दिल्ली जैसे घने, बेतरतीब व व्यावसायिक रूप से अत्यधिक सक्रिय महानगर में पुरानी व्यवस्था (दिल्ली अग्निशमन सेवा नियम, 2010) के तहत कई ऐसी ढांचागत व प्रशासनिक चुनौतियां थीं, जिन्होंने सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर कर दिया था. मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से नियमों में आमूलचूल परिवर्तन करना अनिवार्य हो गया था.
1. लेटलतीफी व लालफीताशाही का खात्मा:
पुरानी व्यवस्था के तहत किसी भी भवन स्वामी को फायर एनओसी लेने या उसके नवीनीकरण के लिए पूरी तरह सरकारी अधिकारियों के भौतिक निरीक्षण पर निर्भर रहना पड़ता था. इस प्रक्रिया में महीनों की देरी भी होती थी. फाइलों का अंबार लगा रहता था. साथ ही भ्रष्टाचार की शिकायतें भी थीं. आवेदन से लेकर सर्टिफिकेट मिलने तक की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव था.
2. दिल्ली फायर सर्विस में बुनियादी ढांचे व मैनपावर की कमी:
दिल्ली फायर सर्विस के चीफ फायर ऑफिसर ए.के. मलिक ने बताया कि विभाग इस समय संसाधनों व स्टाफ के अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है. दिल्ली की विशाल आबादी व क्षेत्रफल को देखते हुए सुरक्षा के जो मानक तय हैं, उनकी हकीकत कुछ इस प्रकार है. एके मलिक ने बताया कि दिल्ली मास्टर प्लान 2021 के नियमों के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी में कम से कम 120 फायर स्टेशन की जरूरत है. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वर्तमान में दिल्ली के पास सिर्फ 71 सक्रिय फायर स्टेशन हैं, यानी आज भी 49 फायर स्टेशनों की भारी कमी है. उन्होंने यह भी बताया कि इस साल आठ नए फायर स्टेशन बनाने की तैयारी है. ए.के. मलिक से प्राप्त जानकारी के मुताबिक दिल्ली जैसे संवेदनशील शहर की सुरक्षा के लिए जहां 12,000 से अधिक ऑपरेशनल स्टाफ (अग्निशामक, चालक व तकनीकी अधिकारी) की आवश्यकता है, वहीं वर्तमान में विभाग के पास सिर्फ 2,400+ कर्मचारी ही तैनात हैं. विभाग लगभग 9 हजार से अधिक कर्मियों की भारी कमी के साथ काम कर रहा है. इसके लिए सरकार के साथ पत्राचार किया जा रहा है.
थर्ड-पार्टी प्राइवेट फायर ऑडिटर्स की योग्यता, श्रेणियां वचयन की प्रक्रियाः
नए संशोधन (विशेष रूप से नियम 34 व 35) के तहत अब सरकारी फायर अधिकारियों के एकाधिकार को समाप्त कर मान्यता प्राप्त निजी ऑडिटर्स (व्यक्ति, इंजीनियरिंग फर्म या कंपनियों के संघ) को फायर सेफ्टी ऑडिट करने के लिए वैधानिक रूप से अधिकृत कर दिया गया है. राजपत्र की सप्तम अनुसूची (में इन तीनों स्तरों के ऑडिटर्स के लिए अत्यंत कड़े तकनीकी मानक, शैक्षणिक योग्यता (जैसे फायर इंजीनियरिंग में डिग्री/डिप्लोमा) व न्यूनतम कार्य अनुभव निर्धारित किया गया है. भवनों की संवेदनशीलता, उनके आकार, ऊंचाई व अग्नि जोखिम के आधार पर इमारतों को वर्गीकृत किया गया है. इसी के अनुरूप प्राइवेट फायर सेफ्टी ऑडिटर्स को भी तीन विशिष्ट स्तरों में विभाजित किया गया है.
1. लेवल-1 फायर सेफ्टी ऑडिटर: यह बुनियादी व कम जोखिम वाली इमारतों (जैसे कम ऊंचाई वाले स्कूल या छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठान) के ऑडिट के लिए अधिकृत होंगे.
2. लेवल- 2 फायर सेफ्टी ऑडिटर: यह मध्यम जोखिम व मध्यम ऊंचाई वाले परिसरों (जैसे आवासीय सोसायटियां, होटल व मध्यम आकार के वाणिज्यिक मॉल) का ऑडिट करेंगे.
3. लेवल 3 फायर सेफ्टी ऑडिटर: यह अत्यधिक संवेदनशील, उच्च जोखिम व गगनचुंबी इमारतों (जैसे मल्टीप्लेक्स, बड़े सभा भवन, हजार्डस स्टोरेज व सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल) के ऑडिट के लिए अधिकृत होंगे.
थर्ड पार्टी ऑडिटर पंजीकरण व लाइसेंसिंग की प्रक्रिया:
कोई भी निजी विशेषज्ञ सीधे ऑडिट शुरू नहीं कर सकता है. इसके लिए एक पारदर्शी ऑनलाइन प्रक्रिया भी तय की गई है: योग्य इंजीनियरों या फर्मों को दिल्ली फायर सर्विस के केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर (Form U) भरना होगा. आवेदन के साथ उन्हें अपने तकनीकी स्टाफ की सूची, शैक्षणिक योग्यता के प्रमाणपत्र, पिछले अनुभव के दस्तावेज़, संस्था का पंजीकरण व टैक्स/पैन विवरण अपलोड करना होगा. निर्धारित पंजीकरण शुल्क का ऑनलाइन भुगतान करने के बाद दिल्ली फायर सर्विस के निदेशक द्वारा दस्तावेजों की गहन जांच की जाएगी. योग्य पाए जाने पर ही उन्हें 'सूचीबद्ध' किया जाएगा.
पंजीकृत होने के बाद ही इन सभी ऑडिटर्स की पूरी सूची, उनके क्रेडेंशियल्स व रेटिंग के साथ दिल्ली फायर सर्विस के पोर्टल पर लाइव प्रदर्शित की जाएगी. कोई भी भवन स्वामी अपनी पसंद, सुविधा व बजट के अनुसार इस लिस्ट में से किसी भी ऑडिटर का चयन करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगा.
फायर एनओसी प्राप्त करने की नई चरणबद्ध डिजिटल प्रक्रिया:
संशोधित नियमों ने सरकारी दफ्तरों के मानवीय हस्तक्षेप को शून्य कर दिया है. यदि किसी नागरिक को अपनी नई इमारत के लिए 'फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट' (एफएसीसी) चाहिए या पुरानी एनओसी का रिन्युअल कराना है, तो उसे निम्नलिखित 5-चरणों की पूरी तरह से डिजिटल प्रक्रिया से गुजरना होगा. भवन स्वामी दिल्ली फायर सर्विस के ऑनलाइन पोर्टल पर लॉगिन करेगा वअपनी इमारत की श्रेणी के अनुसार सूचीबद्ध प्राइवेट फायर सेफ्टी ऑडिटर्स में से किसी एक का चयन करेगा. चुना गया प्राइवेट ऑडिटर स्वयं अपनी टीम के साथ मौके पर जाएगा. मौके पर इमारत का गहन तकनीकी निरीक्षण करेगा. इस दौरान निर्धारित 20 सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा मानकों की जांच की जाएगी, जिनमें शामिल हैं. सभी 20 मानक राष्ट्रीय भवन संहिता और दिल्ली फायर नियमों के अनुरूप पाए जाते हैं तो ऑडिटर एक कानूनी घोषणा पत्र तैयार करेगा, जिसमें वह यह प्रमाणित करेगा कि उसने स्वयं स्थल का निरीक्षण किया है और इमारत सुरक्षा के लिहाज से पूरी तरह उपयुक्त है. इसके बाद प्राइवेट ऑडिटर अपने स्वयं के डिजिटल हस्ताक्षरों अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र (Fire Safety Certificate) जारी कर देगा.
इस तरह 20 मानकों की होगी जांच
- निकास मार्गों (Exit Routes) व सीढ़ियों की चौड़ाई व उपलब्धता.
- फायर हाइड्रेंट, होज रील व स्प्रिंकलर सिस्टम का वाटर प्रेशर.
- अंडरग्राउंड व ओवरहेड फायर वाटर टैंक की क्षमता.
- फायर अलार्म, स्मोक डिटेक्टर व आपातकालीन लाइटिंग व्यवस्था.
- लिफ्ट वेल में हवा का दबाव और कंपार्टमेंटेशन.
लापरवाही पर 10 लाख रुपये तक का जुर्माना और सीधे जेल:
निजी ऑडिटर्स को एनओसी जारी करने का अधिकार देने का मतलब ये कतई नहीं है कि वे अपनी मनमर्जी कर सकेंगे या बिल्डरों से साठगांठ करके गलत प्रमाणपत्र जारी कर देंगे. दिल्ली सरकार ने इसके लिए बेहद सख्त व क्रूर प्रशासनिक व कानूनी नियंत्रण प्रणाली तैयार की है. प्राइवेट ऑडिटर्स द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्रों पर नजर रखने के लिए दिल्ली फायर सर्विस के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष विजिलेंस विंग रहेगी. जो प्रत्येक तिमाही पूरे दिल्ली में निजी ऑडिटर्स द्वारा जारी की गई कुल एनओसी में से 5 प्रतिशत एनओसी का बिना किसी पूर्व सूचना के औचक (रैंडम) भौतिक सत्यापन करेगी.
यदि विजिलेंस विंग के औचक निरीक्षण में यह पाया जाता है कि किसी ऑडिटर ने जानबूझकर गलत रिपोर्ट लगाई है, बंद पड़े उपकरणों को चालू दिखाया है या मानकों की अनदेखी की है तो विभाग बिना किसी ढिलाई के उस ऑडिटर पर 2 से 10 लाख रुपये तक का भारी जुर्माना लगाया जाएगा. यदि कोई ऑडिटर या फर्म दूसरी बार किसी भी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार में लिप्त पाई जाती है तो उसका लाइसेंस और पंजीकरण हमेशा के लिए निरस्त कर उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा. फिर वह पूरे देश में कहीं भी यह काम नहीं कर सकेगा.
नियम 35(8) के तहत किया गया सबसे बड़ा बदलाव यह है कि ऑडिट प्रक्रिया के दौरान इन निजी ऑडिटरों को भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 2 के कानूनी दायरे में लोक सेवक' का दर्जा दिया गया है. इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि उनकी जारी की गई एनओसी वाली किसी इमारत में आग लगती है और जांच में उनकी लापरवाही या रिश्वतखोरी सामने आती है तो उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम व आपराधिक लापरवाही के तहत सीधे एफआईआर दर्ज होगी और उन्हें सीधे जेल जाना होगा.
तकनीक के जरिए 24 घंटे अचूक पहरा:
इस संशोधन की सबसे क्रांतिकारी व आधुनिक विशेषता है आटोमैटिक कंटीनिवस मानीटरिंग सिस्टम (ACMS) का क्रियान्वयन। यह प्रणाली पूरी तरह से क्लाउड कंप्यूटिंग और आईओटी (Internet of Things) गेटवे तकनीक पर काम करती है. इसका उद्देश्य इमारतों के भीतर लगे सुरक्षा उपकरणों को चौबीसों घंटे लाइव रखना है. इमारत के मुख्य अग्निशमन तंत्रों (जैसे- पंप रूम, हाइड्रेंट लाइन का प्रेशर व पानी के टैंक के सेंसर) से एक विशेष IoT डिवाइस जोड़ी जाएगी. यह डिवाइस 4G/5G या स्थानीय वाई-फाई नेटवर्क का उपयोग करके हर एक मिनट में सुरक्षा प्रणालियों का लाइव डेटा दिल्ली फायर सर्विस के क्लाउड पोर्टल पर भेजेगी.
यदि किसी इमारत में बिजली गुल होने, इंटरनेट बंद होने या जानबूझकर सिस्टम बंद करने के कारण क्लाउड पोर्टल को 15 मिनट तक कोई डेटा प्राप्त नहीं होता है तो पोर्टल का सर्वर इसे एक सुरक्षा उल्लंघन मानेगा. सिस्टम तुरंत स्वचालित रूप से संबंधित बिल्डिंग ओनर और अधिकृत प्राइवेट ऑडिटर के मोबाइल पर एक अलार्म और चेतावनी एसएमएस भेज देगा. इस आईओटी गेटवे डिवाइस में 7 घंटे का इन-बिल्ट यूपीएस (UPS) पावर बैकअप होना अनिवार्य है, जिससे बिजली कटने पर भी निगरानी न रुके. इसके अतिरिक्त इंटरनेट पूरी तरह ठप होने की स्थिति के लिए इसमें न्यूनतम 10,000 इवेंट लॉग (डेटा रिकॉर्ड) को लोकल स्टोरेज में सुरक्षित रखने की क्षमता होगी.
दो चरणों में क्रियान्वयन का रोडमैप:
सीएफओ ए.के. मलिक के अनुसार इस अत्याधुनिक तकनीक को पूरी दिल्ली में दो चरणों में लागू किया जा रहा है. पहले चरण में शुरुआती स्तर पर सिस्टम द्वारा उत्पन्न होने वाले अलर्ट व ऑफलाइन होने की चेतावनियां सिर्फ भवन के स्वामी व प्राइवेट ऑडिटर को भेजी जाएंगी, जिससे व बिना किसी कानूनी कार्रवाई के डर के 24 से 48 घंटों के भीतर तकनीकी खराबी को ठीक कर सकें. दूसरे चरण में इस पूरे क्लाउड आर्किटेक्चर को API (Application Programming Interface) के माध्यम से सीधे संबंधित क्षेत्रीय फायर स्टेशनों व केंद्रीय दिल्ली फायर कंट्रोल रूम के मुख्य डैशबोर्ड से लाइव जोड़ दिया जाएगा. इसके बाद यदि कोई मॉल या अस्पताल अपने फायर पंप बंद रखता है तो इसकी लाइव जानकारी सीधे फायर कंट्रोल रूम को मिल जाएगी व तत्काल एनओसी रद्द करने या परिसर को सील करने की कार्रवाई की जा सकेगी.
ऑनलाइन पेमेंट शुरू और राजस्व जिलों के साथ अलाइनमेंट:
नियमों को सरल बनाने के साथ-साथ दिल्ली सरकार ने विभाग के पूरे प्रशासनिक ढांचे को बदल दिया है, जिससे किसी भी स्तर पर शक्तियों का दुरुपयोग न हो सके. पुराने नियमों के तहत जब भी किसी बिल्डर या नागरिक को स्टैंड-बाय ड्यूटी शुल्क, शमन शुल्क या अनापत्ति प्रमाण पत्र शुल्क चुकाना होता था, तो उसे अनिवार्य रूप से बैंक के चक्कर काटकर बैंक ड्राफ्ट या पे-ऑर्डर बनवाना पड़ता था. नए संशोधनों में अब संपूर्ण वित्तीय लेन-देन को डिजिटल कर दिया गया है. नागरिक अब घर बैठे ही क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, यूपीआई (UPI) या इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से सीधे सरकारी खाते में शुल्क जमा कर रियल-टाइम डिजिटल रसीद प्राप्त कर सकते हैं. अधिसूचना के अनुसार भविष्य में एक निश्चित तिथि जारी कर कैश/ड्राफ्ट से भुगतान को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देंगे.
पूरी दिल्ली को अब 5 मुख्य जोन में पुनर्गठित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक का प्रशासनिक प्रभार एक मुख्य अग्निशमन अधिकारी के अधीन होगा, जिनकी सहायता उप मुख्य अग्निशमन अधिकारी करेंगे. साथ ही दिल्ली को 13 डिवीजन और 39 सब डिवीजन में विभाजित किया गया है. इस विभाजन में सीमाओं को इतना स्पष्ट कर दिया गया है कि किसी भी नागरिक को अपनी इमारत के अधिकार क्षेत्र को जानने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा.
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