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पढ़ाई और करियर का दबाव बना रहा उग्र, एक्सपर्ट से जानें बच्चों में कैसे पहचानें बागी होने के लक्षण?

पेरेंट्स बच्चों पर पढ़ाई और करियर का दबाव बना रहे हैं, जिससे बच्चे उग्र हो रहे हैं और जान ले रहे हैं.

बच्चे क्यों हो रहे बागी?
बच्चे क्यों हो रहे बागी? (Photo Credit; ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 26, 2026 at 9:25 PM IST

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Updated : February 26, 2026 at 11:06 PM IST

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रिपोर्ट : प्रशांत मिश्रा

लखनऊ : पढ़ाई को लेकर दिनोंदिन बढ़ते दबाव और टीवी-मोबाइल फोन में बढ़ती रुचि से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हट रहा है. माता-पिता उन पर ज्यादा दबाव बनाते हैं तो वह अपनी छोटी सी उम्र में बड़ा फैसला ले लेते हैं. यहां तक की हत्या से भी गुरेज नहीं करते.

तीन दिन पहले लखनऊ के आशियाना में एक ऐसा ही मामला सामने आया. कारोबारी पिता बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते थे, बेटा रेस्टोरेंट का बिजनेस करना चाहता था. दोनों में पढ़ाई को लेकर बहस हुई. विवाद इतना बढ़ गया कि बेटे अक्षत ने पिता मानवेंद्र सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी.

पिता को लेकर अक्षत के अंदर इतना गुस्सा था कि उसने शरीर के टुकड़े कर दिए. गर्दन और हाथ काटकर घर से 21 किमी. दूर काकोरी में फेंक दिया. शरीर को पन्नी में पैक कर नीले ड्रम में रख दिया. यह कोई पहली घटना नहीं है, इससे पहले भी कई इस तरह की कई घटनाएं हो चुकी हैं.

पांच साल पहले लखनऊ के गौतमपल्ली थाना क्षेत्र में रेलवे कॉलोनी में रहने वाले एक बड़े अधिकारी की नवी में पढ़ने वाली 16 साल की निशानेबाज बेटी ने अपनी मां व छोटे भाई को सोते समय गोली मार दी थी. बाद में इस बात का खुलासा हुआ था की लड़की लंबे समय से डिप्रेशन में थी.

जानिए क्यों बच्चे हो रहे बागी? (Video Credit; ETV Bharat)

सवाल: आखिल बच्चों में ऐसा क्या हो रहा बदलाव; लोगों के मन में सवाल उठने लगे हैं कि आखिर बच्चों में ऐसा क्या बदलाव होने लगा है कि वे अपने ही पैरेंट्स को मारने लगे हैं? बलरामपुर अस्पताल के मनोचिकित्सक पीके श्रीवास्तव बताते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव को सीधे तौर पर ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार बताना गलत होगा. क्योंकि, आज से पहले भी प्रतियोगी परीक्षाओं में कंपटीशन होता था और बच्चे अपनी क्षमताओं के अनुसार उसमें प्रतिभाग करते थे.

बच्चों से जबरदस्ती करना ठीक नहीं : यह बात सही है कि कई बार परिजन बच्चों पर अनायास उनकी क्षमताओं के विपरीत जाकर दबाव बनाते हैं, जो बच्चों को परेशान करता है. ऐसे में परिजनों से यही अपील है कि वह बच्चों की क्षमताओं को भांपते हुए उनसे परीक्षा की तैयारी करने के लिए कहें, उनका सहयोग करें, उनसे जबरदस्ती करना ठीक नहीं है. सबसे जरूरी है कि परिजनों को अपने बच्चों से बातचीत करते हुए उन्हें समझना चाहिए.

एक ही कार्य का दबाव बनाना सही नहीं : ध्येय कोचिंग संचालक विजय सिंह ने बताया कि कॉम्पिटेटिव एक्जाम की तैयारी करने वाले बच्चों व परिजनों को यह बात समझनी चाहिए कि प्रतिवर्ष जितनी वैकेंसी निकलती है उससे कई गुना ज्यादा बच्चे परीक्षा में बैठते हैं. सभी बच्चों का सिलेक्शन हो जाए यह संभव नहीं है. ऐसे में परिजनों को अनायास बच्चे पर एक ही कार्य को लेकर दबाव बनाना अनुचित होता है. हम एक कोचिंग संस्थान होने के नाते समय-समय पर बच्चों व परिजनों दोनों की काउंसलिंग करते हैं. परीक्षा में फेल होना अंत नहीं है इसके बाद भी तमाम ऑप्शन हैं.

बच्चों के अपराध के कारण को समझना होगा : सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता वर्षा सिंह कहती हैं, लखनऊ की घटना में कोई मोटिव क्लियर नजर नहीं आ रहा है. पिता परीक्षा की तैयारी का दबाव बना रहे थे तो हो सकता है कि उसी दबाव के चलते अक्षत मानसिक बीमारी का शिकार हो गया. कई मामले ऐसे देखे गए हैं जिसमें बच्चे दबाव व अकेलेपन के चलते मानसिक बीमारी का शिकार हो जाते हैं, जिसका नतीजा इस तरीके की घटनाएं होती हैं. इस ओर विचार करने की जरूरत है.

इन पांच तरीके से पहचानें बच्चों में तनाव.
इन पांच तरीके से पहचानें बच्चों में तनाव. (Photo Credit; ETV Bharat)

समझिए कंपटीशन का स्तर : Neet UG की परीक्षा में हर वर्ष अनुमानित 20 लाख से 24 लाख तक के छात्र रजिस्ट्रेशन करते हैं और परीक्षा में हिस्सा लेते हैं. 24 लाख छात्रों की अपेक्षा भारत में लगभग 130000 एमबीबीएस की सीटें हैं, जिनमें सरकारी और गैर सरकारी दोनों कॉलेज शामिल हैं. आंकड़ों की बात करें तो 2024 में 23 लाख से अधिक छात्रों एग्जाम दिया था. 2025 में यह आंकड़ा और बढ़ गया. सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की लगभग 70 हजार सीटें हैं. औसतन 20 बच्चों पर एक एमबीबीएस की सीट है.

प्रतिस्पर्धा बच्चों को देती है तनाव : मनोचिकित्सक डॉ. देवाशीष ने बताया कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब बच्चों की तुलना की जाती है. अभिभावकों को चाहिए कि वह दबाव न बनाएं. हर बच्चे के अंदर अपनी एक खूबी होती है, उसको पहचान कर परिवार को उसके लिए प्रेरित करना चाहिए. आजकल की सबसे बड़ी समस्या मोबाइल फोन है. लोग अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं, जिससे बच्चे अकेले हो जाते हैं. भावनात्मक लगाव ना होने के चलते कई बार बच्चे परिवार से दूर हो जाते हैं और गलत रास्ते पर भी जाने से नहीं कतराते हैं.

बच्चों के साथ कैसे रहें मा-बाप.
बच्चों के साथ कैसे रहें मा-बाप. (Photo Credit; ETV Bharat)

बच्चे भी हो रहे है तनाव का शिकार : डॉ. विवेक श्रीवास्तव ने बताया, किशोर में मानसिक तनाव की स्थिति बढ़ती जा रही है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में लगभग 5 करोड़ बच्चे मानसिक समस्याओं से गुजर रहे हैं. जिसका कारण प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव व प्रतिस्पर्धा है. हर साल इस दबाव के चलते सैकड़ों की संख्या में किशोर आत्महत्या कर रहे हैं.

बच्चों के अवसाद में जाने का एक बड़ा कारण मोबाइल का उपयोग है. जो बच्चे सात घंटे से अधिक फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं उनमें डिप्रेशन में जाने की संभावना 2 गुना तक बढ़ जाती है. मोबाइल के लगातार प्रयोग से बच्चों का माता-पिता से भावनात्मक लगाव कम हो जाता है, जो उन्हें आत्महत्या और गलत काम के लिए उकसाता है. अन्य बच्चों से तुलना तनाव का एक बड़ा कारण है.

बच्चों की काउंसलिंग की नहीं है कोई व्यवस्था : भले ही कोचिंग संस्थान विद्यार्थियों की काउंसलिंग कराने के दावे करते हों, लेकिन भारतीय एजुकेशन सिस्टम में ऐसी कोई व्यवस्था या गाइडलाइन नहीं है. लखनऊ डीएम विशाल जी अय्यर बताया, विद्यालयों में छात्रों के साथ बेहतर व्यवहार व परिजनों द्वारा बच्चों पर अतिरिक्त दबाव न डालने के लिए विभिन्न माध्यमों से जागरूक करने का काम किया जाता है. हालांकि, इस विषय में विद्यालयों को अनिवार्य रूप से पालन करने के लिए गाइडलाइन नहीं है.

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Last Updated : February 26, 2026 at 11:06 PM IST