बस्तर पंडुम 2026: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने की आयोजन की सराहना, आदिवासी संस्कृति को सहेजने और संवारने का बताया मंच
राष्ट्रपति ने मंच से कई मुद्दों पर बात रखी. आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा पर जोर दिया. कहा, सरकार के साथ-साथ समाज को आगे आना होगा.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : February 7, 2026 at 8:59 PM IST
जगदलपुर: शनिवार को संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम का उद्घाटन हुआ. शुभारंभ अवसर पर देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शामिल हुईं. इस दौरान उन्होंने बस्तर से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी बात रखी. साथ ही आदिवासी संस्कृति और बस्तर की जमकर तारीफ की. कहा कि छत्तीसगढ़ की आत्मा आदिवासी संस्कृति में बसती है. उन्होंने बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के जयघोष के साथ अपने संबोधन की शुरुआत की.
जनजातीय उत्थान के लिए सरकार के प्रयास
राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ ऐसा राज्य है, जहां सरकार आदिवासी संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और प्राचीन विरासतों को संरक्षित करने के लिए बस्तर पंडुम जैसे आयोजन कर रही है. यह आयोजन आदिवासी समाज की गौरवशाली संस्कृति को दर्शाता है. छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों के विकास के लिए समर्पित भाव से काम कर रही है. पीएम जनमन, प्रधानमंत्री जनजातीय गौरव उत्कर्ष अभियान और नियद नेल्लानार योजना के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों को विकास से जोड़ा जा रहा है.
छत्तीसगढ़ की प्राचीन परंपराओं की जड़ें आज भी मजबूत हैं और बस्तर पंडुम जनजातीय समुदाय की पहचान, गौरव और उनकी समृद्ध परंपरा को प्रोत्साहित करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच है.- द्रौपदी मुर्मू, राष्ट्रपति

माओवाद से विकास की ओर बढ़ता बस्तर
राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर क्षेत्र में अब सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है.माओवादी हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं, लोकतंत्र के प्रति विश्वास बढ़ा है और वर्षों से बंद स्कूल फिर से खुल रहे हैं. उन्होंने कहा कि सड़क, पुल, बिजली और पानी जैसी सुविधाएँ अब दुर्गम इलाकों तक पहुँच रही हैं. लंबे समय तक माओवाद से प्रभावित रहे बस्तर में अब शांति और विकास का नया सूर्योदय हो रहा है.

बस्तर पंडुम- आदिवासी पहचान और गौरव का मंच
राष्ट्रपति ने बताया कि बस्तर पंडुम में 54 हजार से अधिक आदिवासी कलाकारों ने पंजीयन कराया है. यह आदिवासी समाज के अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव को दर्शाता है. उन्होंने लोगों से अपनी संस्कृति और पारंपरिक विरासत को सहेजने और बस्तर की जनजातीय परंपराओं को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने की अपील की.

बस्तर पंडुम हमारी लोकसंस्कृति का उत्सव-राज्यपाल
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि बस्तर पंडुम कोई साधारण मेला नहीं, बल्कि हमारी लोकसंस्कृति का उत्सव है. गौर नृत्य, परघौनी नृत्य, मुरिया, धुरवा और लेजा नृत्य बस्तर की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को आदिवासी संस्कृति से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं.
इस तरह का महोत्सव हमारी आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनता है. यहां गोंड, मुरिया, माड़िया, हल्बा और भतरा, परजा समाज के लोग पीढ़ियों से अपनी मूल परंपराओं को सहेजते आए हैं.- रमेन डेका, राज्यपाल

ढोकरा शिल्प- बस्तर की पहचान
राज्यपाल ने कहा कि ढोकरा कला छत्तीसगढ़ की शान है. बस्तर में बनने वाली ढोकरा मूर्तियाँ देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं और यह जनजातीय शिल्पकारों की मेहनत और कौशल का प्रमाण हैं. यहां के लोग जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के तालमेल के साथ रहते हैं. यही बस्तर की सबसे बड़ी ताकत है. बस्तर पंडुम में गांव-गांव के कलाकार यहां आकर अपनी कला दिखाएंगे. जिससे न केवल उनकी पहचान बढ़ेगी. बल्कि उन्हें सम्मान और आजीविका का साधन भी प्राप्त होगा. हमारी लोककला भी तभी जिंदा रहेगी. जब कलाकार खुशहाल होंगे.
बस्तर में डर नहीं, अब भरोसा है- CM
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि राष्ट्रपति का बस्तर पंडुम में आना केवल औपचारिक उपस्थिति नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के लिए सम्मान और आशीर्वाद है. उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम आदिवासी समाज के जीवन, नृत्य-गीत, वेशभूषा, खान-पान और जीवन दर्शन का जीवंत चित्र है.
नक्सलवाद से मुक्ति की ओर बस्तर
मुख्यमंत्री ने कहा कि एक समय बस्तर नक्सलवाद और हिंसा के लिए जाना जाता था, लेकिन आज वहाँ विकास की रोशनी है. जहां कभी गोलियों की आवाज़ गूंजती थी, आज वहां स्कूलों की घंटी सुनाई देती है. उन्होंने बताया कि 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के समूल उन्मूलन का लक्ष्य तय किया गया है.
योजनाओं से बदली आदिवासी इलाकों की तस्वीर
मुख्यमंत्री ने कहा कि नियद नेल्लानार योजना, प्रधानमंत्री जनमन और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान से सड़कों, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है. वन उत्पादों के बेहतर दाम, चरण-पादुका योजना और वन धन केंद्रों से आदिवासी समाज आत्मनिर्भर बन रहा है.
गौर नृत्य ने मोहा मन
बस्तानार क्षेत्र के आदिवासी युवाओं द्वारा प्रस्तुत विश्व-प्रसिद्ध गौर नृत्य ने पूरे परिसर को मंत्रमुग्ध कर दिया. ढोल की थाप, घुंघरुओं की झनकार और पारंपरिक वेशभूषा ने बस्तर की आदिम संस्कृति को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया. यह नृत्य दंडामी माड़िया जनजाति की परंपराओं, साहस और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है.

