प्रयागराज में प्रतियोगी छात्रों की टूटतीं उम्मीदें; भट्टी जैसे तपते कमरों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कर रहे पढ़ाई
सरकारी नौकरी की आस में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों पर आधारित ईटीवी भारत की ग्राउंड रिपोर्ट पढ़ें.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : May 29, 2026 at 12:02 PM IST
|Updated : May 29, 2026 at 2:19 PM IST
प्रयागराज : देश के कोने-कोने से आकर प्रयागराज में सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले छात्रों के सपनों पर भीषण गर्मी, महंगाई और बुनियादी समस्याओं का साया है. इस भीषण तपिश में हर दिन औसतन 4 घंटे की अघोषित बिजली कटौती हो रही है. इसके अलावा महंगाई ने सारा बजट बिगाड़ रखा है. रसोई गैस और किराए के मकानों के बढ़े दामों ने बेहाल कर रखा है. अव्वल तो छात्रों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं. पेश है अक्षय कुमार मिश्रा की खास रिपोर्ट.
मात्र 15 दिन पहले एसएससी, सीजीएल (SSC CGL) की तैयारी करने प्रयागराज आए अरविन्द जैसे हजारों छात्र यहां के आर्थिक बोझ से डरे हुए हैं. घर से आने वाला पैसा बेहद सीमित है. जबकि शहर में 200 रुपये प्रति किलो के हिसाब से गैस मिल रही है. बाहर का खाना स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक नहीं होता है. खाने पर भी महंगाई की मार पड़ रही है. इसके अलावा भीषण गर्मी में किराए के कमरों में कूलर आदि चलाना बजट से बाहर हो रहा है. मकान मालिक भारी-भरकम बिजली का बिल थमा रहे हैं.
बेली गांव के रहने वाले रवि प्रजापति ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रयागराज में किराए का कमरा लिया है. रवि का कहना है कि घरवालों की उम्मीदें और सफल होने का दबाव हर वक्त पीछा करता रहता है, लेकिन यहां की अव्यवस्था हमारा हौसला तोड़ रही है. कोचिंग संस्थानों की भारी-भरकम फीस के अलावा बुनियादी सुविधाएं न होना परेशानी का सबब बना हुआ है. यहां गर्मी में बिजली की आंख-मिचौली और बारिश में जलभराव-बाढ़ समस्या बनती है.
साल 2022 से यूपीएससी (UPSC) की तैयारी कर रहे शिवम बताते हैं कि अब परीक्षाओं में केवल पारंपरिक किताबों के बजाय पीआईबी (PIB) और अखबारों की गहरी समझ मांगी जा रही है. इस कठिन पाठ्यक्रम की तैयारी के लिए प्रयागराज में डेरा डाल रखा है, लेकिन मौसम की मार और भट्टी जैसे तप रहे कमरों में पढ़ाई करना बेहद मुश्किल हो रहा है. बिजली कटौती की वजह से दिन किसी तरह पुस्तकालयों में बिताते हैं, लेकिन रात में अक्सर छत पर सोना पड़ रहा है.
छात्रों का कहना है कि जब चुनाव होते हैं, तभी जनप्रतिनिधि वोट की खातिर यहां आते हैं, लेकिन उसके बाद उन्हें ट्रैफिक जाम, बिजली कटौती और मकान मालिकों की मनमानी के बीच अकेले छोड़ दिया जाता है. बहरहाल जब तक अंधाधुंध पेड़ काटने का सिलसिला नहीं रुकेगा और हर व्यक्ति पेड़ लगाने का संकल्प नहीं लेगा, तब तक कंक्रीट के इस जंगल में हालात नहीं सुधरेंगे. देश का भविष्य तैयार करने वाली यह नगरी फिलहाल युवाओं को बुनियादी सहूलियतें देने में भी नाकाम साबित हो रही है.
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