उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण पर बढ़ा विवाद, कहीं भ्रम की राजनीति, तो कहीं शैक्षिक सुधार का दम
उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म कर दिया गया है. उसकी जगह धामी सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण गठित किया है

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : February 20, 2026 at 10:58 AM IST
किरण कांत शर्मा
देहरादून: उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को लेकर सियासी और सामाजिक बहस ने नया मोड़ ले लिया है. राज्य सरकार जहां इसे संवैधानिक अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में ठोस पहल बता रही है, वहीं राजनीतिक दल और संगठनों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है.
उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण पर सियासी खींचतान: इन सब के बीच उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी ने खुलकर कहा है कि प्राधिकरण को लेकर समाज में जानबूझकर भ्रम फैलाया जा रहा है. इसका मूल उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना और छात्रों को बेहतर अवसर देना है. मामला इसलिए भी अहम हो जाता है, क्योंकि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षणिक संस्थान लंबे समय से सामाजिक ताने बाने का हिस्सा रहे हैं. अब जब सरकार ने इन्हें संस्थागत ढांचे में और व्यवस्थित करने की पहल की है, तो इसे लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं.

क्या कहते हैं जानकार: वरिष्ठ पत्रकार सुनील दत्त पांडेय की मानें तो-
भारत के संविधान का अनुच्छेद 29 और 30 धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति की रक्षा और शैक्षणिक संस्थान स्थापित व संचालित करने का अधिकार देता है. इन्हीं प्रावधानों के अनुरूप विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग या प्राधिकरण गठित किए गए हैं. राष्ट्रीय स्तर पर भी एक वैधानिक निकाय काम कर रहा है, जो अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से जुड़े विवादों और मान्यता संबंधी मामलों की सुनवाई करता है. उत्तराखंड में प्राधिकरण की सक्रियता को इसी संवैधानिक व्यवस्था का विस्तार माना जा सकता है, लेकिन ये कैसे काम करेगा कितना कारगर साबित होता है, ये देखना वाला विषय है.
-सुनील दत्त पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार-
सीएम धामी ने ये कहा था: उत्तराखंड में कई बार शैक्षिक संस्थान विवादों में पड़ते रहे हैं. मौजूदा सरकार के दौरान ही ऐसी कई चर्चाएं सामने आई हैं, जिस वजह से प्रदेश के कई ऐसे शिक्षा संस्थान देश में चर्चा में रहे हैं. अब अगर प्राधिकरण निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से काम करता तो यह संस्थानों को अनावश्यक विवादों से राहत दिला सकता है और छात्रों के हितों की रक्षा सुनिश्चित कर सकता है. जब सीएम धामी ने इसका गठन करने पर बयान दिया था, तो पुष्कर सिंह धामी ने कहा था कि राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़े संस्थानों का डाटा संकलन, पंजीकरण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने और शैक्षणिक मानकों की समीक्षा जैसे कदम उठाए हैं.

संस्थान बंद करना नहीं, पारदर्शिता लाना है उद्देश्य: मदरसा शिक्षा बोर्ड के स्तर पर भी सत्यापन अभियान चलाया गया था, जिसमें कई संस्थानों की आधारभूत संरचना छात्र संख्या और पाठ्यक्रम की स्थिति का आकलन किया गया. सीएम के अनुसार-
इन प्रयासों का उद्देश्य किसी संस्था को बंद करना नहीं, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है. डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने, वित्तीय लेनदेन में स्पष्टता और आधुनिक विषयों को शामिल करने की दिशा में भी पहल की गई है. सरकार ये बात बार बार कह रही है कि कंप्यूटर शिक्षा, विज्ञान, गणित और कौशल विकास जैसे विषयों को प्रोत्साहन देने के लिए ही इस का गठन किया गया है.
-पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड-
मुफ्ती शमून कासमी का बयान- भ्रम फैलाना दुर्भाग्यपूर्ण: उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी ने कहा है कि अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को लेकर गलत धारणाएं फैलाना सही नहीं है. उनके अनुसार-

कुछ लोग अपने स्वार्थ के कारण समाज में शंकाएं पैदा कर रहे हैं. जबकि प्राधिकरण का मकसद शिक्षा को बेहतर बनाना और विद्यार्थियों को आधुनिक दौर के अनुरूप तैयार करना है. धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक विषयों का समावेश समय की मांग है. यदि छात्र तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा से जुड़ेंगे तो उनका भविष्य अधिक सुरक्षित होगा. प्राधिकरण के माध्यम से शैक्षणिक गुणवत्ता प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही को मजबूती मिलेगी.
-मुफ्ती शमून कासमी, अध्यक्ष, मदरसा शिक्षा बोर्ड, उत्तराखंड-
विपक्ष की आशंकाएं और राजनीतिक प्रतिक्रिया: दरअसल कांग्रेस लगातार ये आवाज उठा रही है कि अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता संविधान द्वारा संरक्षित है. इसमें किसी भी प्रकार का प्रशासनिक हस्तक्षेप, संवेदनशील विषय हो सकता है. कांग्रेस नेता और पूर्व सीएम हरीश रावत ने आरोप लगाया कि-

सरकार को निर्णय लेने से पहले व्यापक संवाद करना चाहिए था. सरकार जिस तरह से अल्संख्यकों के मामले में जल्दबाजी कर रही है, वो राज्य ही नहीं देश देख रहा है. अगर प्राधिकरण को लेकर लोगों के मन में शंकाएं हैं, तो उन्हें दूर करना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
-हरीश रावत, नेता कांग्रेस-
शिक्षा सुधार या सियासी मुद्दा: शिक्षाविद राजनीकान्त शुक्ला कहते हैं कि-
शिक्षा से जुड़े विषय अक्सर भावनात्मक और संवेदनशील होते हैं. अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मामला भी इसी श्रेणी में आता है. एक ओर सरकार इसे प्रशासनिक सुधार और शैक्षणिक के बेहतरी के रूप में देख रही है. वहीं विपक्ष इसे समुदाय विशेष के अधिकारों के संदर्भ में देख रहा है. यदि प्राधिकरण का काम छात्रों के हित में है और इससे शिक्षा की गुणवत्ता सुधरती है, तो इसका स्वागत होना चाहिए. शिक्षा को राजनीतिक विवाद का विषय बनाने से बचना चाहिए.
-राजनीकांत शुक्ला, शिक्षाविद-
आगे की चुनौतियां: अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वास बहाली की है. समुदाय के भीतर यदि आशंकाएं हैं, तो उन्हें संवाद के माध्यम से दूर करना होगा. सरकार को चाहिए कि वह नियमित रूप से रिपोर्ट सार्वजनिक करे. कार्यप्रणाली स्पष्ट रखे और सभी पक्षों को साथ लेकर चले. प्राधिकरण को केवल नियामक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि सहयोगी मंच के रूप में विकसित किया जाए.
क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण? उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म कर दिया गया है. उसकी जगह धामी सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Authority for Minority Education) गठित किया है. इसके माध्यम से सरकार, राज्य के मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना चाहती है. इसके तहत अल्पसंख्यक छात्रों को आधुनिक शिक्षा जिसमें विज्ञान, गणित और कंप्यूटर है इन्हें बढ़ावा देना है. इसके साथ यूएसएमईए का उद्देश्य शिक्षा में एकरूपता और सभी अल्पसंख्यकों को समान अवसर देना है. उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण सीएम धामी द्वारा फरवरी 2026 में गठित किया गया.
उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के पदाधिकारी: अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण में सरकार ने प्रोफेसर (रि.) सुरजीत सिंह गांधी, बीएसएम पीजी कॉलेज रुड़की को अध्यक्ष बनाया है. प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार जैन, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय (हरिद्वार), डॉ. सैय्यद अली हमीद (रि.) प्रोफेसर कुमाऊं विवि (अल्मोड़ा), प्रो. पेमा तेनजिन निवासी बागतोली, ग्वालदम (चमोली), प्रो. गुरमीत सिंह, केजीके पीजी कॉलेज लाइन पार (मुरादाबाद), डॉ. एल्बा मन्ड्रेले, सहायक अध्यापक स्व. चंद्र सिंह शाही राजकीय पीजी कॉलेज कपकोट (बागेश्वर), प्रो. रोबिना अमन विभागध्यक्ष एवं संयोजक रसायन विज्ञान सोबन सिंह विश्वविद्यालय (अल्मोड़ा), चंद्रशेखर भट्ट, सेवानिवृत्त सचिव, उत्तराखंड शासन और राजेंद्र सिंह बिष्ट, हिमालय ग्राम विकास समिति गंगोलीहाट (पिथौरागढ़) को सदस्य बनाया गया है.
इसके अलावा महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा उत्तराखंड और निदेशक राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद उत्तराखंड पदेन सदस्य होंगे. निदेशक अस्पसंख्यक कल्याण उत्तराखंड, इसके पदेन सदस्य सचिव होंगे.
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