Plastic Bag Free Day: उदयपुर की खूबसूरती पर 'सिंगल-यूज प्लास्टिक' का दाग, संकट में पिछोला और फतेहसागर!
उदयपुर की झीलें प्लास्टिक कचरे की चपेट में हैं. सिंगल-यूज प्लास्टिक आयड़ नदी होते हुए उदयसागर तक पहुंच रहा है. कपिल पारीक की स्पेशल रिपोर्ट.

Published : July 3, 2026 at 2:29 PM IST
उदयपुर: अपनी अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता, भव्य महलों और कांच की तरह चमकती झीलों के लिए दुनिया भर में मशहूर 'झीलों की नगरी' उदयपुर आज एक बड़े पर्यावरणीय संकट के मुहाने पर खड़ी है. देश-दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला यह खूबसूरत शहर अब 'सिंगल-यूज प्लास्टिक' के बढ़ते जाल से हांफ रहा है. आज 'अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस' के मौके पर यह मुद्दा सिर्फ चर्चा का विषय नहीं, बल्कि शहर के वजूद को बचाने की एक गंभीर चेतावनी बनकर उभरा है.
हर साल पर्यटकों से गुलजार रहने वाले उदयपुर की लाइफलाइन कही जाने वाली पिछोला, फतेहसागर और स्वरूपसागर जैसी ऐतिहासिक झीलें मानवीय लापरवाही का शिकार हो रही हैं. शहर के बाजारों और घरों से निकलने वाला प्लास्टिक बैग और ठोस कचरा, बारिश के पानी के साथ बहकर नालों के रास्ते पहले आयड़ नदी और फिर इन झीलों के सीने में समा रहा है. यह तैरता हुआ प्लास्टिक न सिर्फ झीलों की सदियों पुरानी खूबसूरती को लील रहा है, बल्कि पानी की गुणवत्ता को बिगाड़कर जलीय जीवों के जीवन पर भी काल बनकर मंडरा रहा है.
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सिंगल-यूज प्लास्टिक झीलों के लिए खतरा: झील प्रेमी अनिल मेहता बताते हैं कि बारिश शुरू होते ही शहर की नालियों और ड्रेनेज सिस्टम में फंसे प्लास्टिक बैग, बोतलें और अन्य कचरा तेज बहाव के साथ आयड़ नदी में पहुंच जाते हैं. नदी के कई हिस्सों में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक और ठोस कचरे के ढेर आसानी से दिखाई देते हैं. यही कचरा आगे बहकर उदयपुर की झीलों तक पहुंचता है. कई स्थानों पर झीलों के किनारों पर प्लास्टिक कचरे का जमाव साफ दिखाई देता है. पॉलीथिन न केवल झीलों की सुंदरता को बिगाड़ रही है, बल्कि नालियों को जाम कर जलभराव जैसी समस्याएं भी पैदा कर रही है, जिससे गंदा पानी झीलों में मिलकर प्रदूषण बढ़ा रहा है.

जलीय जीवों के लिए भी खतरा: पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. सुरेश शर्मा के अनुसार प्लास्टिक सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होती. समय के साथ यह छोटे-छोटे माइक्रोप्लास्टिक कणों में बदल जाती है, जो पानी में मिलकर मछलियों और अन्य जलीय जीवों के शरीर में पहुंच जाते हैं. यही माइक्रोप्लास्टिक खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्लास्टिक कचरे पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो झीलों का प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है.

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सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध: नगर निगम के पुलिस निरीक्षक मांगीलाल डांगी बताते हैं कि सरकार द्वारा सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लागू किया जा चुका है और नगर निगम समय-समय पर प्रतिबंधित पॉलीथिन के खिलाफ कार्रवाई भी करता है. इसके बावजूद कई बाजारों और दुकानों पर चोरी-छिपे प्लास्टिक बैग का उपयोग जारी है. अगस्त से अब तक नगर निगम ने 90 क्विंटल से ज्यादा सिंगल-यूज प्लास्टिक थैलियां जब्त की हैं. पर्यावरणविदों का कहना है कि केवल कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा, जब तक लोग स्वयं प्लास्टिक बैग लेने से इनकार नहीं करेंगे, दुकानदार वैकल्पिक बैग नहीं अपनाएंगे और कचरा खुले में फेंकने की आदत नहीं बदलेगी, तब तक आयड़ नदी और उदयपुर की झीलों को प्लास्टिक मुक्त बनाना मुश्किल रहेगा.

पर्यटन पर असर: उदयपुर की पहचान स्वच्छ झीलों से है. झील किनारे प्लास्टिक कचरा देखकर पर्यटकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और शहर की ब्रांड इमेज प्रभावित होती है. प्लास्टिक में फंसने या उसे भोजन समझकर निगलने से मछलियों, कछुओं और जलपक्षियों की जान पर खतरा बढ़ जाता है.
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आवारा पशुओं की समस्या: सड़क पर फेंकी गई पॉलीथिन में बचा भोजन खाते समय गाय और अन्य पशु पॉलीथिन भी निगल लेते हैं, जिससे वे गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं. नगर निगम को हर साल नालों और झीलों से प्लास्टिक कचरा हटाने पर अतिरिक्त संसाधन और धन खर्च करना पड़ता है.

झीलों को बचाने के लिए कदम: विशेषज्ञों का मानना है कि कपड़े और जूट के थैलों का अधिक उपयोग, घर से अपना थैला लेकर बाजार जाना, स्रोत स्तर पर कचरे का पृथक्करण, आयड़ नदी और नालों की नियमित सफाई तथा जनजागरूकता अभियान ही इस समस्या का स्थायी समाधान हैं. उदयपुर की झीलें केवल शहर की पहचान ही नहीं, बल्कि पर्यटन, रोजगार और आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर भी हैं. अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस केवल एक दिवस नहीं, बल्कि प्लास्टिक मुक्त आदतें अपनाकर आयड़ नदी और उदयपुर की झीलों को स्वच्छ एवं सुरक्षित रखने का संकल्प लेने का अवसर है.

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