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मां दंतेश्वरी का आशीर्वाद लेकर फागुन के रंग में डूबे बस्तरवासी, जानिए क्या है परंपरा

मां दंतेश्वरी के दरबार में होने वाली देव परिक्रमा में शामिल होने के लिए भक्तों की भारी भीड़ जुटती है.

PHAGUN STARTS IN DANTEWADA
जानिए क्या है हजारों साल पुरानी परंपरा (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : March 4, 2026 at 4:17 PM IST

6 Min Read
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मुकेश श्रीवास की रिपोर्ट

दंतेवाड़ा: मां दंतेश्वरी को बस्तर की आराध्य देवी माना जाता है. चाहे होली हो या दिवाली, मां का आशीर्वाद लेकर ही त्योहार की शुरूआत बस्तर में की जाती है. होली से पहले लगने वाले मड़ई मेले की शुरूआत भी मां की पूजा पाठ के बाद ही होती है. होली के मौके पर आज एक बार फिर बस्तर की आराध्य देवी के धाम से आशीर्वाद लेकर फागुन मेले की शुरूआत हुई. सदियों से चली आर रही इस परंपरा का आज भी पालन उसी विधि विधान से किया जा रहा है.


मां दंतेश्वरी के धाम से हुई फागुन मेले की शुरूआत

बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा तब सबसे अधिक जाग्रत होती है, जब फागुन की मस्ती में यहां की पारंपरिक होली धूमधाम से मनाई जाती है. विश्व प्रसिद्ध यह फागुन मेला न सिर्फ रंगों का पर्व है, बल्कि बस्तर की हजारों वर्ष पुरानी परंपराओं, स्थानीय मान्यताओं और देवी–देवताओं के अनूठे अनुष्ठानों का अद्भुत संगम भी रहा है.
हर साल की तरह इस बार भी 4 मार्च को मां दंतेश्वरी के धाम में परंपराओं के अनुरूप प्राकृतिक रंगों से होली का महापर्व मनाया गया. दंतेश्वरी मंदिर परिसर में सुबह से लेकर शाम तक धार्मिक अनुष्ठान, नृत्य और गीत संगीत का कार्यक्रम होगा. इसके साथ ही देव–परिक्रमा का आयोजन भी किया जाएगा, जो अपने आप में ऐतिहासिक होता है.

फागुन के रंग में डूबे बस्तरवासी (ETV Bharat)

पूजा के लिए दंतेश्वरी सरोवर से लाया जाता है शुद्ध पानी

ब्रह्म मुहूर्त की बेला में दंतेश्वरी सरोवर से पवित्र जल लाकर मां दंतेश्वरी की पूजा–अर्चना की गई. यह चरण फागुन अनुष्ठानों का सबसे पवित्र क्षण माना जाता है. इसके बाद सुबह 9 बजे मंदिर के पुजारियों और 12 लंकवार सेवकों ने विशेष बस्तरिय विधि से भैरवनाथ की तैयारी शुरू हुई. भैरवनाथ का साज श्रृंगार मां दंतेश्वरी की पालकी से उतरे पवित्र फूलों से किया गया. मान्यता है कि इन फूलों में देवी की दिव्य ऊर्जा समाहित होती है, जो भैरवनाथ के जागरण का प्रतीक बनती है


नृत्य–गान और प्राकृतिक रंगों के संग निकली भैरवनाथ की यात्रा

सज-धज कर तैयार हुए भैरवनाथ को मंदिर परिसर से बाहर ढोल–नगाड़ों, नृत्य और पारंपरिक गीतों के साथ निकाला गया. पलाश के फूलों और होलिका दहन की राख से बनाए गए प्राकृतिक रंग होली के मुख्य आकर्षण थे. परंपरा के अनुसार भैरवनाथ को शनि मंदिर तक ले जाया गया, जहां एक दिन पूर्व की गई होलिका दहन की राख से भक्तों ने तिलक किया और सति माता की पूजा की. इसके बाद वहां 7 परिक्रमा संपन्न कर भैरवनाथ को पुनः नृत्य–गीतों के साथ मुख्य मंदिर वापस लाया गया.


मंदिर परिसर में रंग–उत्सव और परंपराओं का अद्भुत संगम

मंदिर पहुंचकर भक्तों ने प्राकृतिक फूलों से बने रंगों से होली खेली. मंदिर के सभी देवी–देवताओं, पुजारियों, लंकवार सेवकों और आम श्रद्धालुओं ने 7 परिक्रमा कर क्षेत्र की सुख–शांति की कामना की. इसके बाद भैरव बाबा मंदिर के पवित्र पदचिह्नों के समीप भैरवनाथ के साथ फिर से पूजा–अर्चना कर स्नान कराया गया. यह अनुष्ठान पवित्रता और नवचेतना का प्रतीक माना जाता है.


सदियों पुरानी परंपरा,पलाश के फूलों और राख से बनाए जाते रंग

मंदिर के पुजारियों के अनुसार इस मेले की परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी उसी आस्था के साथ निभाई जा रही है. मां दंतेश्वरी की पालकी 9 दिनों तक नारायण मंदिर तक ले जाई जाती है और फिर वापस धाम लौटती है. 9वें दिन आवला मार समारोह के बाद रात में ताड़ के पत्तों से निर्मित होलिका दहन किया जाता है. फिर सुबह के वक्त मदन केसरी की पूजा के बाद होलिका की राख लाई जाती है और पलाश के फूलों को घिसकर प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते हैं. यही रंग पूरे मेले की पहचान हैं और इन्हीं से होली खेली जाती है.


बस्तर के राजा की सहभागिता और नगर भ्रमण

आज शाम को पारंपरिक नागर भ्रमण का आयोजन किया गया है, जिसमें बस्तर के राजा कमलचंद भांजा देव की विशेष उपस्थिति रहेगी. 1100 देवी–देवताओं की शोभायात्रा के साथ पूरे नगर की परिक्रमा की जाएगी. अगले दिन ससम्मान सभी देवी–देवताओं की विदाई संपन्न होगी.

जानकारी बताते हैं मिथक और विधियों का अनूठा महत्व

जानकार शैलेंद्र सिंह ठाकुर के अनुसार पंडाल मंदिर और पांचों पंडो मंदिरों में स्थानीय मिट्टी से तैयार विशेष लेप की पूजा की जाती है और उसी लेप का तिलक लगाकर होली का प्रारंभ होता है. होलिका दहन की राख से तिलक करना यहां के लोगों के लिए शुभ माना जाता है. ताड़ वृक्ष की शाखा को सरोवर में स्नान कराकर शुद्ध किया जाता है और सातवें दिन इसे होलिका स्थल पर अर्पित किया जाता है.दंतेश्वरी सरोवर से लाए गए जल से देवी का अभिषेक किया जाता है और पलाश के फूलों से बने रंग से सबसे पहले मां दंतेश्वरी को गुलाल अर्पित किया जाता है. इसके बाद मंदिर में विराजमान सभी देवी–देवताओं को तिलक लगा रंग–भंग की रस्म निभाई जाती है.


परंपरा, प्रकृति और आध्यात्म का अद्भुत संगम

बस्तर में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति–पूजा, लोक–आस्था, सामुदायिक एकता और देवी–भक्ति का अनोखा उत्सव है. प्राकृतिक रंगों, भूमि–पूजन, परिक्रमा, नृत्य–गान और हजारों वर्षों से चली आ रही मान्यताओं के कारण यह फागुन मेला विश्व प्रसिद्ध है. मां दंतेश्वरी के धाम में मनाई जाने वाली यह होली बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का जीवंत प्रतीक है, जो हर वर्ष फागुन के आगमन के साथ पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उत्साह से सराबोर कर देती है.

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