फल और सब्जियों में बढ़ते केमिकल और पेस्टिसाइड्स के उपयोग, कैसे पहचानें, क्या है दुष्परिणाम? 4 प्रकार के खतरे का निशान
इंटेंसिव हॉर्टिकल्चर मॉडल से बढ़ी पेस्टिसाइड्स की खपत, IGKV के कीट विज्ञान विभाग प्रमुख वैज्ञानिक डॉ गजेंद्र चंद्राकर से रितेश तंबोली की खास बातचीत.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : June 25, 2026 at 9:07 PM IST
रायपुर: आज के बदलते दौर में फल और सब्जियों में केमिकल और पेस्टिसाइड्स का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. सब्जियों को अधिक हरा-भरा दिखाने और फलों को जल्दी पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के रसायनों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. गजेंद्र चंद्राकर का कहना है कि इंटेंसिव हॉर्टिकल्चर (सघन बागवानी) मॉडल के आने के बाद पेस्टिसाइड्स की खपत में काफी वृद्धि हुई है.
पेस्टिसाइड्स और केमिकल्स के दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं? फल और सब्जियों में इनके उपयोग की पहचान कैसे की जा सकती है? इन सभी विषयों पर ईटीवी भारत ने डॉ. गजेंद्र चंद्राकर से विशेष बातचीत की.
| सवाल: फल और सब्जियों में पेस्टिसाइड्स का उपयोग क्यों किया जाता है? |
जवाब: जब से रसायन आधारित खेती शुरू हुई है, तब से कृषि रसायनों पर हमारी निर्भरता बढ़ गई है. जैसे-जैसे रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बढ़ा है, वैसे-वैसे फसलों में कीट और रोगों का प्रकोप भी बढ़ा है. इसी कारण कृषि में पेस्टिसाइड्स का उपयोग बढ़ा है. आज विभिन्न प्रकार के रसायनों का उपयोग किया जाता है, जैसे खरपतवारनाशी, कीटनाशक और अन्य पेस्टिसाइड्स. इनका इस्तेमाल कीटों, रोगों और अन्य हानिकारक जीवों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है.
| सवाल: फल और सब्जियों में पेस्टिसाइड्स का उपयोग हुआ है या नहीं, यह कैसे पहचानें? |
जवाब: सबसे पहले मैं यह बता दूं कि जो फल और सब्जी हैं. वह सबसे ज्यादा संवेदनशील विषय हैं. सब्जियों को हम लोग रोज उपयोग करते हैं. इसी तरह फलों का भी रोज उपयोग करते हैं. कई फल ऐसे हैं इसके छिलके निकाल कर उपयोग करते हैं. कई फलों को हम छीलकर उपयोग भी नहीं कर पाते. सब्जियों की बात करें तो ग्रीन सलाद के रूप में ककड़ी, खीरा, चुकंदर, गाजर इसका हम लोग उपयोग करते हैं. कई ऐसी चीज हैं जिसे हम तुरंत बाजार से लेकर आते हैं और उसे खाने में इस्तेमाल करते हैं. इसलिए फल और सब्जियों में पाई जाने वाली पेस्टिसाइड्स की मात्रा रिड्यूस जो है वह सबसे ज्यादा चिंताजनक है.
कोई भी पेस्टिसाइड का डिब्बा है. उसमें जो ट्राइंगल है वह चार प्रकार के खतरे का निशान बना रहता है. जो उनकी विषाक्तता (टॉक्सिसिटी) को दर्शाते हैं.
- लाल त्रिकोण- अत्यधिक जहरीला.
- पीला त्रिकोण- अधिक विषाक्त.
- नीला त्रिकोण- मध्यम विषाक्त.
- हरा त्रिकोण- कम विषाक्त या अपेक्षाकृत सुरक्षित.
भारत सरकार, सेंट्रल इंसेक्टिसाइड्स बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी (CIBRC) समेत कई रिपोर्ट्स के मुताबिक लाल और पीले त्रिकोण वाली दवाइयों का उपयोग सब्जियों में लगभग बंद करने की सिफारिश की गई है. सब्जियों में कीट और रोग नियंत्रण के लिए नीले और हरे त्रिकोण वाली दवाइयों के उपयोग को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सके.
| सवाल: सब्जी और फल में केमिकल की मौजूदगी का पता कैसे लगाया जा सकता है? |
जवाब: देखिए, सामान्य तौर पर इसकी जांच दो स्तर पर हो सकती है. पहला, किसी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला (लेबोरेटरी) में परीक्षण करवाकर यह पता लगाया जा सकता है कि फल या सब्जी में हानिकारक कीटनाशक या रसायन मौजूद हैं या नहीं. दूसरा, उपभोक्ता अपने स्तर पर भी कुछ संकेतों के आधार पर सतर्क रह सकते हैं. बाजार में जो फल या सब्जियां अत्यधिक चमकदार दिखाई देती हैं, उनके बारे में यह संभावना मानी जा सकती है कि उनमें हाल ही में किसी रसायन का उपयोग किया गया हो.
कीटनाशकों का उपयोग दो स्तरों पर होता है. पहला, किसान द्वारा खेत में फसल उत्पादन के दौरान. तेज धूप और बारिश के कारण खेत में उपयोग की गई दवाइयों का असर समय के साथ कम हो जाता है. दूसरा, व्यापारियों द्वारा फलों को जल्दी पकाने, अधिक हरा दिखाने या उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए रसायनों का उपयोग किया जाता है. यह सबसे अधिक चिंताजनक और घातक स्थिति है. किसी भी परिस्थिति में व्यापारिक स्तर पर होने वाली ऐसी मिलावट को रोकना चाहिए.
| सवाल: पेस्टिसाइड्स का हमारे स्वास्थ्य पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ सकता है? |
जवाब: पेस्टिसाइड्स का प्रभाव हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) पर पड़ता है. लंबे समय तक रसायनों के संपर्क में रहने से रोगों से लड़ने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो सकती है. कई मेडिकल रिपोर्ट्स में यह सामने आया है कि कीटनाशकों के कारण हार्मोनल असंतुलन की समस्या बढ़ सकती है. विशेष रूप से महिलाओं और छोटी बच्चियों में हार्मोन संबंधी समस्याएं देखने को मिलती हैं.
इसके अलावा कैंसर के मामलों में भी वृद्धि देखी जा रही है. अक्सर पंजाब का उदाहरण दिया जाता है, जहां रसायनों के अत्यधिक उपयोग के कारण स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं की चर्चा होती रही है. भूलने की बीमारी और अन्य रोगों के संभावित कारणों में भी पेस्टिसाइड्स को एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है.
| सवाल: क्या सभी प्रकार के फल और सब्जियों में पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल होता है? |
जवाब: नहीं, सभी फसलों में पेस्टिसाइड्स का उपयोग समान रूप से नहीं होता. उदाहरण के लिए, मूनगा (सहजन/ड्रमस्टिक) की खेती में अधिकांश किसान पेस्टिसाइड्स का उपयोग नहीं करते हैं. इसी प्रकार सीताफल जैसे कई फलों में भी सामान्यतः स्प्रे नहीं किया जाता. प्राकृतिक रूप से उगने वाले कई फलों में रसायनों का उपयोग बहुत कम या नहीं के बराबर होता है. हालांकि, इंटेंसिव हॉर्टिकल्चर मॉडल के आने के बाद पेस्टिसाइड्स की खपत बढ़ी है.
सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई बार किसान या उत्पादक वेटिंग पीरियड का पालन नहीं करते. वास्तव में, कीटनाशकों का उपयोग जितना नुकसानदायक नहीं है, उससे कहीं अधिक नुकसान तब होता है जब दवा के छिड़काव के बाद निर्धारित प्रतीक्षा अवधि का पालन नहीं किया जाता. यदि किसी दवा के उपयोग के बाद तीन दिन बाद फल तोड़ने की सलाह दी गई है, तो उसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए.
| सवाल: क्या पेस्टिसाइड्स का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों में दिखाई देता है? |
जवाब: हां, पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे कीटनाशकों, कृषि रसायनों और खाद्य पदार्थों में मिलावट के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं. उदाहरण के तौर पर, कई बार छोटे बच्चे खाली पेट अंगूर खाते हैं और उन्हें उल्टी की समस्या हो जाती है. फलों को पकाने या उनका आकार बढ़ाने के लिए उपयोग किए जाने वाले कुछ ग्रोथ रेगुलेटर्स बच्चों में सिर चकराना, बेचैनी और उल्टी जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं.
इसी प्रकार यदि दूध में ऑक्सीटोसिन जैसी मिलावट हो और बच्चे उसका सेवन करें, तो उनमें तत्काल प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं. बच्चों के शरीर के कई अंग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होते, इसलिए वे किसी भी प्रकार के रसायन के प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं.
इसी कारण अधिकांश उत्पादों पर बच्चों की पहुंच से दूर रखें लिखा होता है. बच्चों में कई सारे अंग डेवलप नहीं हुए रहते. यदि किसी बगीचे या खेत में कीटनाशकों का छिड़काव किया गया हो, तो बच्चों को वहां जाने से रोकना चाहिए, क्योंकि त्वचा, विशेषकर पैरों और हथेलियों के माध्यम से भी रसायनों का अवशोषण हो सकता है.

