बेलगड़िया टाउनशिप: सुरक्षित जिंदगी की शुरुआत, लेकिन संघर्ष अब भी जारी
बेलगड़िया-टाउनशिप में लोग बसाए जा रहे हैं. उनको सुरक्षित ठिकाना तो मिल गया, लेकिन बुनियादी जरूरतों का अभी आभाव है. नरेंद्र निषाद की रिपोर्ट

Published : May 2, 2026 at 3:35 PM IST
धनबादः बेलगड़िया टाउनशिप, जिसे उम्मीदों का शहर कहा जा रहा है, आज हजारों विस्थापित परिवारों के लिए नई शुरुआत का केंद्र बना हुआ है. यहां वे लोग बसाए जा रहे हैं, जिनकी जिंदगी कभी आग और भू-धंसान जैसी भयावह घटनाओं के साए में गुजर रही थी. लेकिन सुरक्षित ठिकाना मिलने के बावजूद, यहां के लोगों की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं. जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए जूझते ये परिवार अब एक नई तरह की लड़ाई लड़ रहे हैं. रोजगार, पानी, शिक्षा और मुआवजे की लड़ाई.
13 हजार से अधिक परिवारों को अभी बसाया जाएगा
बेलगड़िया टाउनशिप में अब तक करीब 2600 परिवारों को शिफ्ट किया जा चुका है. प्रशासन के अनुसार, अभी भी 81 ऐसी खतरनाक साइट हैं जहां के लोगों को विस्थापित किया जाना बाकी है. इसके अलावा लगभग 13 हजार 500 परिवार ऐसे हैं जिन्हें आने वाले समय में यहां बसाया जाना है. इनमें करीब 1250 रैयत परिवार भी शामिल हैं, जिनकी अपनी जमीन और अलग सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां हैं.
टाउनशिप में फिलहाल करीब 6 हजार आवास तैयार हैं, जिनमें से कई अब भी खाली पड़े हैं. हाल ही में कतरास क्षेत्र के सोनारडीह टंडाबाड़ी बस्ती से 140 प्रभावित परिवारों को यहां बसाया गया है. इसके अलावा केंदुआडीह, झरिया के लिलोरीपथरा, बस्ताकोला और बर्फकल जैसे संवेदनशील इलाकों से भी लोगों को यहां शिफ्ट करने की प्रक्रिया लगातार जारी है. प्रशासन इन क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रहा है, जहां खतरा सबसे ज्यादा है.
हादसे में कई घर पूरी तरह तबाह हो गए थे
फेज-6 में टंडाबाड़ी समेत कई इलाकों के लोगों को हाल ही में यहां बसाया गया है. ये वही लोग हैं जिन्होंने भू-धंसान की त्रासदी को बेहद करीब से देखा है. टंडाबाड़ी में हुए हादसे में तीन लोगों की जान चली गई थी और कई घर पूरी तरह तबाह हो गए थे.

शिफ्ट हुए लोग बताते हैं कि यहां आने के बाद उन्हें सबसे बड़ी राहत यह मिली है कि अब उनकी जान सुरक्षित है. टंडाबाड़ी में हर दिन एक डर के साथ गुजरता था, कब जमीन धंस जाए, कब घर गिर जाए, कुछ पता नहीं. लेकिन बेलगड़िया में वे कम से कम चैन की सांस ले पा रहे हैं.
दो वक्त की रोटी का सवाल
हालांकि, इस राहत के साथ-साथ एक नई चिंता भी जुड़ गई है, जीविका की. लोग बताते हैं कि टंडाबाड़ी में भले ही खतरा था, लेकिन किसी न किसी तरह दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो जाता था. यहां आने के बाद वह सहारा भी छिन गया है.
शिफ्ट हुए परिवारों की सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है. लोगों का कहना है कि वे जो थोड़ा बहुत सामान अपने साथ लेकर आए थे, अब वह भी खत्म होने की कगार पर है. खाने-पीने की चीजें धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं और उनके पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है.

यहां कोई रोजगार नहीं है
उन्होंने कहा कि टंडाबाड़ी में कुछ न कुछ काम मिल जाता था, जिससे घर चल जाता था. यहां आने के बाद कोई काम नहीं है. जो बचा था, वह भी खत्म हो रहा है. अब आगे कैसे गुजारा होगा, यही चिंता सताती रहती है.
महिलाओं की समस्याएं भी कम नहीं हैं. टाउनशिप में पानी की किल्लत एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है. कई घरों में नियमित पानी की सप्लाई नहीं हो रही है. कहीं पानी आता है तो कहीं नहीं. ऐसे में महिलाओं को चापानल से पानी भरकर दूसरी और तीसरी मंजिल तक ले जाना पड़ रहा है, जो बेहद कठिन काम है.
बुनियादी सुविधाएं का अभावः विस्थापित परिवार
महिलाओं ने यह भी बताया कि पानी की कमी के कारण उन्हें शौच के लिए बाहर जाना पड़ता है, जिससे सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों पर खतरा बढ़ जाता है. घर तो मिला है, लेकिन बुनियादी सुविधाएं अभी भी अधूरी हैं, यह पीड़ा हर घर में सुनाई देती है.
शिक्षा का मुद्दा भी यहां गंभीर रूप लेता जा रहा है. टंडाबाड़ी के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे फिलहाल पढ़ाई से वंचित हो गए हैं. अभिभावकों को यह तक जानकारी नहीं है कि यहां आसपास कोई स्कूल है या नहीं.
बच्चों के भविष्य को लेकर अभिभावक चिंतित हैं. उनका कहना है कि अगर जल्द ही शिक्षा की व्यवस्था नहीं हुई, तो बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो जाएगी. उन्होंने कहा कि हम यहां आ गए, लेकिन बच्चों का क्या होगा? स्कूल कहां है, हमें कुछ पता नहीं.
सब कुछ छोड़कर यहां आए हैंः विस्थापित परिवार
मुआवजे को लेकर भी लोगों में नाराजगी है. विस्थापित परिवारों का कहना है कि उन्हें अब तक कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली है. अगर मुआवजा मिल जाता, तो कम से कम शुरुआती दिनों में जीवन थोड़ा आसान हो सकता था. लोगों का कहना है कि वे सब कुछ छोड़कर यहां आए हैं, घर, जमीन, रोजगार, लेकिन अब तक उन्हें उस नुकसान का कोई प्रतिफल नहीं मिला है.
इस पूरे मामले पर जेआरडीए के रिहैबिलिटेशन एंड रिसेटलमेंट पदाधिकारी संजय कुमार का कहना है कि फिलहाल प्राथमिकता लोगों को सुरक्षित स्थान पर बसाने की थी, जो किया गया है. मुआवजा प्रक्रिया में है और इसमें थोड़ा समय लगेगा.
टेक्सटाइल मिल की स्थापना की योजना हैः संजय कुमार
रोजगार के सवाल पर उन्होंने बताया कि बेलगड़िया में जल्द ही टेक्सटाइल मिल की स्थापना की योजना है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा. इसके अलावा लोगों को मशरूम उत्पादन की ट्रेनिंग भी दी जा रही है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें.
शिक्षा को लेकर उन्होंने कहा कि टाउनशिप में जूनियर और मिडिल स्कूल दोनों उपलब्ध हैं और बच्चों के नामांकन के लिए जल्द ही पहल की जाएगी. वहीं पानी की समस्या को लेकर उन्होंने भरोसा दिलाया कि सप्लाई सिस्टम को दुरुस्त करने का काम जारी है और जल्द ही स्थिति में सुधार होगा. उन्होंने यह भी बताया कि बेलगड़िया में अभी भी करीब 6 हजार आवास खाली हैं, जिससे आने वाले समय में और अधिक परिवारों को यहां बसाया जा सकेगा.
पुनर्वास अभी अधूरा हैः विस्थापित परिवार
बेलगड़िया टाउनशिप आज उन हजारों लोगों के लिए उम्मीद का केंद्र जरूर बना है, जिन्होंने खतरे के बीच अपनी जिंदगी गुजारी. लेकिन यह भी सच है कि सिर्फ सुरक्षित छत दे देना ही पर्याप्त नहीं. जब तक इन लोगों को रोजगार, पानी, शिक्षा और मुआवजे जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं, तब तक उनका पुनर्वास अधूरा ही रहेगा.
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