जॉर्ज एवरेस्ट पार्क में रहेगी एंट्री फीस लेकिन सड़क पर नहीं वसूला जा सकता टोल, पर्यटन विभाग को भी राहत, याचिका खारिज
मसूरी जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट केस में नैनीताल हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद अंतरिम आदेश को अंतिम आदेश माना और याचिका खारिज कर दी है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : January 9, 2026 at 9:03 AM IST
मसूरी: बीती 6 जनवरी को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट से जुड़े एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक सड़क पर किसी भी प्रकार की टोल वसूली अवैध है. हाईकोर्ट ने 7 मार्च 2025 के अपने अंतरिम आदेश को ही अंतिम आदेश का रूप दिया. अब लोग बेरोकटोक जॉर्ज एवरेस्ट के ट्रैक रूट और कॉमन पाथवे पर जा सकते हैं. अब कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक सड़क का उपयोग करने के लिए शुल्क देने को बाध्य नहीं होगा.
इसके साथ ही मसूरी जॉर्ज एवरेस्ट को टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने के बाद खड़े हुए विवाद पर नैनीताल हाईकोर्ट इस फैसले से पर्यटन विभाग को भी बड़ी राहत मिली है. इस मामले में कोर्ट ने केवल टोल वसूली को अवैध मानते हुए प्रोजेक्ट पर उठ रहे बाकी सवालों को खारिज कर दिया. इस संबंध में नैनीताल हाईकोर्ट ने आदेश जारी करते हुए याचिका का निस्तारण ही नहीं, आगे इस मामले में किसी भी तरह के विवाद न चलाए जाने को लेकर आदेश जारी किए हैं.
6 जनवरी को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया है. यह याचिका स्थानीय निवासी विनिता नेगी ने दायर की थी. याचिका में कहा गया था कि पर्यटन विभाग द्वारा जॉर्ज एवरेस्ट में करोड़ों की संपति को एक निजी कंपनी को नियमों के विरुद्ध कम दाम से दिया गया. उस निजी कंपनी द्वारा यहां पर अवैध रूप से सड़क टोल वसूला जा रहा है. याचिका में कहा गया कि जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट के संचालन से जुड़े निजी ठेकेदार द्वारा कॉमन पार्क एस्टेट रोड पर टोल बैरियर लगाकर स्थानीय लोगों और पर्यटकों से शुल्क वसूला जा रहा है.

हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश को अंतिम रूप देते हुए कहा कि सार्वजनिक सड़क पर चलने के लिए कोई टोल नहीं वसूला जा सकता. जॉर्ज एवरेस्ट पार्क में प्रवेश शुल्क अलग विषय है, लेकिन सड़क पर बैरियर लगाकर पैसे लेना अनुचित है. जॉर्ज एवरेस्ट पार्क में एंट्री फीस के रूप में निर्धारित शुल्क वैध है और यह नियम और शर्तों के अनुरूप ही लिया जा रहा है. कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया है कि पार्क में प्रवेश शुल्क लेने का अधिकार पहले की तरह लागू रहेगा और इस पर किसी भी प्रकार की रोक नहीं लगाई गई है.
आठवें प्रतिवादी (निजी ऑपरेटर) को स्थानीय लोगों या आम जनता से टोल वसूलने से रोका जाता है. हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश पार्क में प्रवेश को पूरी तरह निःशुल्क घोषित नहीं करता, बल्कि केवल सड़क पर टोल वसूली पर रोक लगाता है.
इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि,
इस रिट याचिका पर आगे सुनवाई करने की जरूरत नहीं है. 17 मार्च 2025 के अंतरिम ऑर्डर को कंफर्म करके इसका निपटारा किया जा सकता है, जिसके तहत रेस्पोंडेंट को टूरिस्ट या लोकल लोगों पर कोई टोल फीस लगाने या वसूलने से रोका गया था, जो केवल उस सड़क का इस्तेमाल करना चाहते हैं.
कोर्ट ने ये भी नोट किया कि जिस परियोजना का ठेका वर्ष 2022 में दिया गया और 2023 में अनुबंध हुआ, उसके विरुद्ध याचिका 2025 में दायर की गई. इसके बावजूद, जनहित को ध्यान में रखते हुए अदालत ने मामले की सुनवाई की. याचिका में हेलिपैड, एयर सफारी, वन्यजीव अभयारण्य की निकटता, पर्यावरणीय मंजूरी और स्थानीय लोगों की भागीदारी जैसे मुद्दे भी उठाए गए थे. उनपर भी कोर्ट ने आरोपों को न्यायिक जांच में प्रमाणित नहीं पाया. सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया, साथ ही पहले दिए गए आदेश को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले का निस्तारण कर दिया.

सुनवाई के बाद निजी प्रतिवादी के वकील ने कोर्ट में कहा कि लगाए गए बैरियर केवल ट्रैफिक नियंत्रण के लिए थे, न कि टोल वसूली के लिए. कोर्ट ने कहा कि अंतिम आदेश के बाद इस दलील पर अलग से विचार की आवश्यकता नहीं है. इस फैसले से स्थानीय निवासियों और मसूरी आने वाले पर्यटकों को बड़ी राहत मिली है. अब कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक सड़क का उपयोग करने के लिए शुल्क देने को बाध्य नहीं होगा. हाईकोर्ट का संदेश साफ है कि पर्यटन विकास के नाम पर आम जनता के अधिकारों का हनन स्वीकार्य नहीं.
वहीं, हाईकोर्ट के फैसले पर उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने खुशी जाहिर की है. पर्यटन सचिव धीराज गर्ब्याल ने कहा कि यह विभाग के लिए अच्छी खबर है. इस प्रोजेक्ट से प्रदेश में पर्यटन और एडवेंचर को लगातार बढ़ावा मिला हैं और आगे भी मिलेगा.
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