दिल्ली-NCR में धूम धाम से किया गया होलिका दहन, विशेष संयोग के बीच की सुख-समृद्धि की कामना
इस दौरान जहां प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, वहीं त्योहार को लेकर बाजार में रौनक देखी गई.

Published : March 2, 2026 at 10:48 PM IST
नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर में सोमवार को 'होलिका दहन' का पर्व श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. सत्य पर अडिग भक्त प्रहलाद की विजय और अहंकार रूपी होलिका के अंत का यह प्रतीक पर्व इस बार ज्योतिषीय गणनाओं और खगोलीय घटनाओं के बीच विशेष संयोग लेकर आया. जहां एक ओर मोहल्लों में चौराहों पर सूखी लकड़ियों और उपलों (बड़कुले) के ढेर सजे दिखे, वहीं वहीं दूसरी ओर ग्रहण और भद्रा के साये के कारण इस बार पूजा के समय को लेकर लोगों में भारी उत्साह और जिज्ञासा बनी रही.
शुभ मुहूर्त और पंचांग का गणित: ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को है. पंडित जय प्रकाश के मुताबिक, दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में होलिका दहन का सबसे शुभ मुहूर्त शाम 6:39 बजे से रात 9 बजे तक रहा. पंडितों का कहना था कि 3 मार्च की पूरी रात भद्रा काल प्रभावी होने के कारण शास्त्रों के अनुसार दहन वर्जित था. त्योहार के मद्देनजर दिल्ली पुलिस और एनसीआर के जिला प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए. नोएडा और गाजियाबाद में संवेदनशील इलाकों में ड्रोन से निगरानी रखी गई. किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए दमकल विभाग की गाड़ियां मुख्य चौराहों पर तैनात की गई. शाम के वक्त भीड़भाड़ वाले इलाकों में रूट डायवर्जन लागू किया गया, ताकि लोगों को असुविधा न हो. अब 4 मार्च को रंगों वाली होली (धुलंडी) खेली जाएगी, जिसके लिए बाजारों में गुलाल और पिचकारियों की रौनक देखते ही बन रही है. प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से त्योहार मनाएं.
पर्यावरण के प्रति दिखी जागरूकता: इस बार एनसीआर की कई सोसायटियों में 'ग्रीन होली' का संकल्प लिया गया है. द्वारका और गुरुग्राम की बड़ी हाउसिंग सोसायटियों में लकड़ियों की जगह गाय के गोबर से बने उपलों का उपयोग अधिक किया जा रहा है, ताकि पेड़ों को कटने से बचाया जा सके. कई आरडब्ल्यूए ने सामूहिक दहन का आयोजन किया है, जिससे प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित रखा जा सके.
बुराई को जलाने का संकल्प: होलिका दहन की आग में लोगों ने प्रतीकात्मक रूप से अपनी नकारात्मकता और बुराइयों की आहुति दी. साथ ही गेहूं की नई बालियां, चना और अक्षत अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की. पंडित रमेश शास्त्री के मुताबिक "होलिका दहन केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपे अहंकार और द्वेष को जलाने का अवसर है. इस बार लोगों ने प्रकृति संरक्षण का भी संकल्प लिया."
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