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आश्रित कोटे में शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता साफ; हाईकोर्ट ने कहा- "वैध चुनौती के बिना शासनादेश असंवैधानिक नहीं"

यह आदेश न्यायमूर्ति एसडी सिंह एवं न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने मेरठ के अनिरुद्ध यादव की विशेष अपील पर दिया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Photo credit: ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 25, 2026 at 10:52 PM IST

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Updated : February 25, 2026 at 11:11 PM IST

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प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सहानुभूति के आधार पर मृतक आश्रित कोटे में सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्ति देने के एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी है. यह आदेश न्यायमूर्ति एसडी सिंह एवं न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने मेरठ के अनिरुद्ध यादव की विशेष अपील पर दिया है.

विशेष अपील पर बहस करते हुए अपीलार्थी के अधिवक्ता शिवम यादव एवं हिमांशु बंसल ने कहा कि चार सितंबर 2000 एवं 15 फरवरी 2013 के शासनादेशों को उनकी वैधता पर स्पष्ट और प्रत्यक्ष चुनौती दिए बिना असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता. खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि किसी भी वैधानिक नियम या शासनादेश को तब तक असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसकी विधिक वैधता को विधिवत चुनौती न दी गई हो.

खंडपीठ ने इसी आधार पर एकल पीठ के निर्णय के प्रभाव एवं क्रियान्वयन पर रोक लगा दी गई. इस अंतरिम आदेश के बाद उक्त शासनादेशों के तहत निर्धारित शैक्षिक अर्हता रखने वाले अभ्यर्थियों को उत्तर प्रदेश में सहानुभूति के आधार पर सहायक अध्यापक पद पर नियुक्ति के लिए विचार किए जाने का मार्ग पुनः प्रशस्त हो गया है.

प्रदेश सरकार ने उक्त शासनादेशों से मृतक आश्रित कोटे में बतौर शिक्षक नियुक्ति देने का प्रावधान कर रखा है यदि आवेदक योग्यताएं पूरी करता हो. एकल पीठ ने शासनादेशों को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिससे पात्र अभ्यर्थियों की मृतक आश्रित कोटे में शिक्षक के रूप में नियुक्तियां बाधित हो गई थीं.

"भरण-पोषण का अधिकार एक निरंतर चलने वाला अधिकार" : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को सतत अधिकार मानते हुए क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति खारिज कर दी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का अधिकार एक निरंतर चलने वाला अधिकार है.

अतः जिस स्थान पर पत्नी निवास कर रही है, वहीं की अदालत को वाद सुनने का अधिकार होगा. केवल इस आधार कि मूल कारण किसी अन्य स्थान से संबंधित है, पर न्यायालय के क्षेत्राधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता. यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने सीमा पांडेय की याचिका पर उसकी ओर से एडवोकेट गौरव द्विवेदी के ब्रीफ पर एडवोकेट प्रखर शुक्ल को सुनकर दिया है.

अधिवक्ता द्वय ने तर्क रखा कि सैन्यकर्मी की पत्नी याची को भारतीय सेना अधिनियम 1950 की धारा 90 के तहत पति के वेतन से भरण-पोषण के लिए कटौती का वैधानिक अधिकार प्राप्त है और संबंधित अधिकारी के समक्ष लंबित अभ्यावेदन पर समयबद्ध निर्णय आवश्यक है. कोर्ट ने प्रारंभिक क्षेत्राधिकार पर विपक्षी को आपत्ति को अस्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि संबंधित कमांडिंग ऑफिसर याची के अभ्यावेदन पर 60 दिन के भीतर विधि अनुसार निर्णय लें.

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Last Updated : February 25, 2026 at 11:11 PM IST