बिहार सरकार को HC से फटकार, निरस्त किया MACP संबंधी आदेश, गवर्नमेंट इंप्लॉई को सेवा में ठहराव से मिली राहत
सरकारी कर्मचारियों को पटना हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दी है. MACP का लाभ देने से इंकार करने संबंधी आदेश को निरस्त किया है. रिपोर्ट- आनंद

Published : September 2, 2026 at 6:52 PM IST
पटना : बिहार की पटना हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों को सेवा में ठहराव से राहत देने वाली संशोधित सुनिश्चित कैरियर प्रगति योजना (MACP) के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए बिहार सरकार को फटकार लगाई है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय लेखा परीक्षा पास करने की शर्त को इन-सिटू वित्तीय उन्नयन यानी एमएसीपी का लाभ देने के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि इसका उद्देश्य नियमित पदोन्नति नहीं, बल्कि कर्मचारियों के सेवा ठहराव को दूर करना है.
हाईकोर्ट ने लगाई बिहार सरकार को फटकार
जस्टिस कुमार मनीष की एकलपीठ ने इस मामले को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए 23 फरवरी, 2018 को स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा तीसरे एमएसीपी का लाभ देने से इनकार करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने राज्य सरकार के इस फैसले को गैर-कानूनी और टिकाऊ नहीं माना. कोर्ट ने पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि नियमित प्रोन्नति और एमएसीपी में अंतर है.
नियमित पदोन्नति के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता अथवा विभागीय लेखा परीक्षा पास करने जैसी शर्तें एसीपी/एमएसीपी के तहत दिए जाने वाले गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन पर स्वतः लागू नहीं होती हैं. एमएसीपी का उद्देश्य कर्मचारी को लंबे समय तक पदोन्नति नहीं मिलने की स्थिति में वित्तीय लाभ देना है. इसलिए नियमित पदोन्नति की पात्रता और एमएसीपी के तहत वित्तीय उन्नयन की शर्तों को एक समान नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि देरी के आधार पर भी राहत से इनकार नहीं किया जा सकता.
'ये लगातार जारी गलत कार्रवाई की श्रेणी में आता है'
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से याचिका में हुई देरी का मुद्दा उठाया गया था. कोर्ट ने राज्य सरकार के इस दलील को भी खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि वेतन के पुनर्निर्धारण से संबंधित अधिकार का उल्लंघन एक 'कंटीन्यूइंग रॉन्ग' (लगातार जारी गलत कार्रवाई) की श्रेणी में आता है.
इसका कारण यह है कि गलत वेतन निर्धारण के चलते कर्मचारी को लगातार वित्तीय नुकसान होता रहता है. कोर्ट ने यह भी माना कि इस तरह के मामले में किसी तीसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित नहीं होते हैं, इसलिए केवल देरी के आधार पर कर्मचारी को वैध वित्तीय लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता.
हाईकोर्ट ने स्क्रीनिंग कमेटी के 23 फरवरी, 2018 के आदेश को रद्द करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सेवानिवृत्त कर्मचारी को तीन महीने में उसके तीसरे एमएसीपी के लाभ देते हुए उसी आधार पर वेतन का पुनर्निर्धारण किया जाए और उसके परिणामस्वरूप मिलने वाली सभी बकाया राशि का भुगतान निर्धारित समय सीमा तीन महीना के अंदर किया जाए.
ये भी पढ़ें- पटना हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, बिहार सरकार की कार्रवाई को बताया गैरकानूनी

