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बिहार में शराबबंदी को लेकर NCAER रिपोर्ट पर एक्शन, HC के वकील ने 4 लेखकों को भेजा नोटिस

जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार की पहल पर पटना हाई कोर्ट के वकील ने एनसीएईआर के चार लेखकों को लीगल नोटिस भेजकर जवाब मांगा. रिपोर्ट- अविनाश

Liquor Ban in Bihar
जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : August 21, 2026 at 7:25 PM IST

5 Min Read
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पटना : जदयू विधान पार्षद नीरज कुमार ने एनसीएईआर के शराबबंदी को लेकर शोध पत्र पर सवाल उठाते हुए लीगल नोटिस भेजने की बात कही थी. अब पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता आनंद कुमार तिवारी ने नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के डायरेक्टर जनरल/गवर्निंग बॉडी और बिहार के विकास एवं शराबबंदी नीति को लेकर लिखे गए एक प्रारंभिक शोध-पत्र के चार लेखकों को कानूनी नोटिस भेजा है.

7 दिनों में मांगा गया जवाब : अधिवक्ता आनंद कुमार तिवारी द्वारा भेजी गई नोटिस में एनसीएईआर के डायरेक्टर जनरल/गवर्निंग बॉडी और संबंधित चारों लेखकों से नोटिस मिलने के 7 दिनों के भीतर तथ्यात्मक, स्पष्ट और संतोषजनक जवाब देने की मांग की गई है. यह नोटिस 'Macro Perspective of Bihar's Development: Achievements, Unfinished Agenda, and the Way Forward' शीर्षक से तैयार एक प्रारंभिक पेपर को लेकर भेजा गया है, जिसे इंडिया पॉलिसी फोरम 2026 के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है.

मीडिया के विभिन्न मंचों पर इसे व्यापक रूप से एनसीएईआर की स्टडी या रिपोर्ट के तौर पर पेश किया गया. पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता आनंद कुमार तिवारी की तरफ से भेजे गए नोटिस में ये कहा गया है कि जब इंडिया पॉलिसी फोरम की अपनी प्रक्रिया के अनुसार किसी पेपर को अंतिम रूप देने से पहले उस पर चर्चा होती है विशेषज्ञों की टिप्पणियां आती हैं और संपादकीय स्तर पर उसमें जरूरी संशोधन किए जाते हैं, तो फिर प्रारंभिक स्तर के इस पेपर को राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से प्रसारित करने से पहले उसके तथ्यों और निष्कर्षों की जांच किस स्तर पर की गई?

Liquor Ban in Bihar
भेजा गया लीगल नोटिस (ETV Bharat)

''एनसीएईआर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की वेबसाइट पर जब कोई शोध-पत्र सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाता है और उसके निष्कर्षों को राष्ट्रीय स्तर पर संस्थान की स्टडी या रिपोर्ट के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो संस्थान की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह यह स्पष्ट करे कि उसमें दिए गए तथ्य, आंकड़े और निष्कर्ष किस आधार पर हैं?''- आनंद कुमार तिवारी, अधिवक्ता, पटना हाईकोर्ट

इस पेपर को लिखने वाले डॉ. रत्ना सहाय, प्रो. संतोष गौतम, प्रो. निशीथ प्रकाश और डॉ. आकाश देव को भी हाईकोर्ट अधिवक्ता आनंद कुमार तिवारी की तरफ से कानूनी नोटिस भेजा गया है. यह मामला किसी की अकादमिक स्वतंत्रता पर सवाल उठाने या किसी अलग राय से असहमति का नहीं है. अकादमिक राय अलग हो सकती है और उस पर बहस भी हो सकती है, लेकिन जब किसी बात को तथ्य और शोध के निष्कर्ष के रूप में सार्वजनिक किया जाता है, तो उसके पीछे के आंकड़े और सबूत भी स्पष्ट होने चाहिए.

कई सवालों का जवाब देना होगा : नोटिस के माध्यम से लेखकों से कई महत्वपूर्ण सवालों पर जवाब मांगा गया है. खास तौर पर बिहार की शराबबंदी नीति को लेकर 'राज्य के राजस्व का 14 प्रतिशत' संबंधी दावे का वास्तविक अर्थ क्या है, इसकी गणना किस आधार पर की गई है और इसे किस संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है, इस पर स्पष्टता मांगी गई है. इसी तरह, दर्ज अपराध के आंकड़ों के आधार पर हिंसा को लेकर जो निष्कर्ष निकाले गए हैं, उनके पीछे क्या सांख्यिकीय और तथ्यात्मक आधार है, इसका भी जवाब मांगा गया है.

शोध-पत्र में शराबबंदी के कारण कथित तौर पर अवैध शराब या अन्य मादक पदार्थों की ओर लोगों के जाने से जुड़े निष्कर्षों पर भी सवाल उठाए गए हैं. लेखकों से पूछा गया है कि इस तरह के निष्कर्ष के समर्थन में बिहार से जुड़े ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य क्या हैं? इसके अलावा, अगर शराबबंदी नीति को बदलने या वापस लेने जैसी सिफारिश की गई है, तो उसके समर्थन में बिहार के संदर्भ में कोई सामाजिक लागत और लाभ का विस्तृत अध्ययन किया गया है या नहीं, इस पर भी स्पष्ट जवाब मांगा गया है.

बिहार में शराबबंदी केवल राजस्व का सवाल नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक नीति है. इसलिए इस पर होने वाली बहस पूरी तरह सही तथ्यों, सही आंकड़ों और ठोस साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए. किसी प्रारंभिक अकादमिक पेपर को इस तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए कि आम जनता उसे अंतिम और पूरी तरह प्रमाणित निष्कर्ष के रूप में समझने लगे.

हाईकोर्ट अधिवक्ता आनंद कुमार तिवारी की तरफ से भेजी गई नोटिस में यह कहा गया है कि यदि इस निर्धारित समय-सीमा के भीतर तथ्यात्मक और संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो आवश्यक प्राधिकरण और कानूनी सलाह के बाद विस्तृत आधिकारिक प्रतिवाद जारी किया जाएगा. साथ ही, जरूरत पड़ने पर संबंधित प्रकाशकों और मीडिया या अन्य प्लेटफॉर्मों से तथ्यों में सुधार या आवश्यक स्पष्टीकरण की मांग की जाएगी तथा कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपायों पर भी विचार किया जाएगा.

NCAER रिपोर्ट में क्या कहा गया था? : इसमें कहा गया था बिहार में शराबबंदी अपने लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाई है. इसके कारण प्रदेश के आंतरिक राजस्व स्रोत में 14 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है. अवैध शराब के कारोबार पर रोक लगाने और कानून लागू कराने में भी सरकार को खर्च करना पड़ता है. महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कमी का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिल रहा है. शराब के विकल्प के तौर पर दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की बात भी शोध में कही गई है.

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